बिहार में शराबबंदी के दस साल: महिला सुरक्षा के दावों के बीच फिर बढ़ा अपराधों का ग्राफ

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बिहार में शराबबंदी के दस साल बाद महिलाओं के खिलाफ अपराध फिर बढ़े, NCAER की रिपोर्ट ने उठाई शराबबंदी की धार!

बिहार में अप्रैल 2016 को जब नीतीश कुमार सरकार ने पूर्ण शराबबंदी कानून लागू किया था, तब इसका सबसे बड़ा आधार और प्रेरणा राज्य की ग्रामीण महिलाएं थीं। महिलाओं ने बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाकर शराब के कारण उजड़ते परिवारों, घरेलू हिंसा और आर्थिक तबाही से मुक्ति की गुहार लगाई थी। सरकार का भी यही मानना था कि शराब की उपलब्धता बंद होने से महिलाओं के खिलाफ होने वाले घरेलू और सामाजिक अपराधों में अभूतपूर्व कमी आएगी। लेकिन शराबबंदी के शुरुआती चार साल और उसके बाद के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) तथा हालिया शोध रिपोर्टों के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे नीति निर्माताओं को झकझोरने और इस कानून की व्यावहारिक प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त हैं। आंकड़े साफ तौर पर दर्शाते हैं कि शराबबंदी जैसे नीतिगत फैसले के बावजूद महिलाओं के सुरक्षित होने का जो दावा किया गया था, वह जमीनी हकीकत से कोसों दूर रह गया।

उम्मीदों का कानून और दस साल का सफर

शराबबंदी के शुरुआती महीनों में निश्चित रूप से कुछ सकारात्मक बदलाव देखे गए थे, जिनमें सड़क दुर्घटनाओं में कमी और सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली हुड़दंगबाजी पर अस्थायी रोक शामिल थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, शराब की वैध बिक्री की जगह एक विशाल और संगठित ‘अवैध शराब अर्थव्यवस्था’ (Illicit Liquor Economy) ने ले ली। कानून लागू होने के चार साल बाद, यानी साल 2020 तक, राज्य में महिलाओं की स्थिति में सुधार के बजाय एक नया और अधिक खतरनाक संकट खड़ा हो गया। राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में महिलाओं के खिलाफ होने वाले कुल गंभीर अपराधों में कमी आने के बजाय लगातार वृद्धि दर्ज की गई।

NCAER की ताजा रिपोर्ट

आर्थिक थिंक टैंक ‘नेशनल काउंसिल ऑफ Applied इकोनॉमिक रिसर्च’ (NCAER) द्वारा हाल ही में जारी एक महत्वपूर्ण शोध पत्र “मैक्रो परस्पेक्टिव ऑफ बिहार्स डेवलपमेंट: अचीवमेंट्स, अनफिनिश्ड एजेंडा, एंड द वे फॉरवर्ड” में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि बिहार में शराबबंदी अपने मुख्य सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रही है। अर्थशास्त्री रत्ना सहाय के नेतृत्व में तैयार इस रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि उपलब्ध साक्ष्य और NCRB के आंकड़े यह नहीं दर्शाते कि शराबबंदी के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कोई व्यापक कमी आई है, बल्कि इसके विपरीत कुल दर्ज अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है।

आंकड़ों का खौफनाक सच: क्या कहते हैं NCRB के दस्तावेज?

अगर हम शराबबंदी के चार साल पूरे होने के समय यानी वर्ष 2019 और 2020 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर बेहद चिंताजनक नजर आती है। बिहार में महिलाओं के खिलाफ दर्ज होने वाले कुल आपराधिक मामलों का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ा है। जहां एक ओर सरकार लगातार यह दावा करती रही कि घरेलू हिंसा के मामलों में कमी आई है, वहीं दूसरी ओर पुलिस थानों में दर्ज होने वाले मामलों की संख्या कुछ और ही कहानी बयां कर रही थी। NCRB और राज्य पुलिस के विश्लेषणों के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों में निम्नलिखित प्रवृत्तियां देखी गईं।

बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामले

आंकड़ों के अनुसार, राज्य में शराबबंदी के बावजूद बलात्कार और महिलाओं के शीलभंग के मामलों में कोई बड़ी गिरावट नहीं देखी गई। वर्ष 2019 में दर्ज बलात्कार के मामलों की तुलना में महामारी और लॉकडाउन वाले वर्ष 2020 में भी राज्य में बलात्कार के मामलों की संख्या में इजाफा देखा गया, जो बढ़कर 808 तक पहुंच गई। यह इस बात का प्रमाण है कि केवल शराब पर प्रतिबंध लगा देने से अपराधियों की मानसिकता को नियंत्रित नहीं किया जा सका।

अपहरण और जबरन शादियां (पकड़ुआ विवाह)

बिहार में महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के अपहरण के मामलों में भी शराबबंदी के बाद के वर्षों में भारी उछाल आया। वर्ष 2018 से 2022 के बीच महिलाओं के अपहरण के मामलों में 2,239 से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें वर्ष 2022 में वयस्क महिलाओं के अपहरण के मामले अपने उच्चतम स्तर (5,691) पर पहुंच गए थे।

घरेलू हिंसा और प्रताड़ना (IPC 498A)

यद्यपि कुछ सर्वेक्षणों में महिलाओं ने शुरुआत में घर में शांति की बात कही थी, लेकिन आधिकारिक आंकड़ों में पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा दी जाने वाली क्रूरता (धारा 498A) के तहत दर्ज मामलों की संख्या ऊंची बनी रही। इसके अलावा दहेज हत्या (304B) और दहेज निषेध अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में भी कोई खास कमी नहीं आई।

समानांतर अवैध तंत्र और हिंसा का नया स्वरूप

शराबबंदी के चार साल बाद महिलाओं के खिलाफ हिंसा फिर बढ़ने का सबसे बड़ा कारण शराब का पूरी तरह से बंद न होना बल्कि उसका ‘अंडरग्राउंड’ हो जाना था। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के आंकड़े, जो मुख्य रूप से वर्ष 2019 से फरवरी 2020 के बीच एकत्र किए गए थे, यह खुलासा करते हैं कि बिहार में पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद पुरुषों द्वारा शराब का उपभोग पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। स्थानीय स्तर पर जहरीली और घटिया शराब का निर्माण बड़े पैमाने पर शुरू हो गया। इस समानांतर व्यवस्था ने महिलाओं के जीवन को दोहरे संकट में डाल दिया।

आर्थिक शोषण और अत्यधिक तनाव

शराबबंदी से पहले जो शराब आसानी से और कम कीमत पर उपलब्ध थी, वह अब काले बाजार में दोगुनी या तिगुनी कीमतों पर मिलने लगी। इसके कारण शराबी पुरुषों ने घर के पैसों की अधिक चोरी शुरू कर दी, बच्चों की पढ़ाई के पैसे और राशन के पैसे अवैध शराब पर खर्च होने लगे। जब घर की महिलाओं ने इस आर्थिक बर्बादी का विरोध किया, तो उनके खिलाफ घरेलू हिंसा और अधिक हिंसक एवं क्रूर हो गई।

सिंथेटिक ड्रग्स और नशीले पदार्थों का बढ़ता चलन

शराब न मिलने या महंगी होने के कारण राज्य के युवाओं और पुरुषों के एक बड़े वर्ग ने गांजा, अफीम, प्रतिबंधित कफ सिरप (कोडीन आधारित) और अन्य घातक रसायनों का नशा करना शुरू कर दिया। चिकित्सा विशेषज्ञों और नशामुक्ति केंद्रों के आंकड़ों के मुताबिक, इन नशीले पदार्थों के सेवन से पुरुषों में मानसिक विकृतियां और आक्रामकता शराब की तुलना में कहीं अधिक पाई गई, जिसका सीधा खामियाजा घर की महिलाओं और बच्चियों को भुगतना पड़ा।

प्रशासनिक ध्यान का भटकना और कानून-व्यवस्था की विफलता

इस सामाजिक कानून का एक और दुखद पहलू यह रहा कि राज्य की पूरी प्रशासनिक और पुलिस मशीनरी केवल शराब पकड़ने, तस्करों के पीछे भागने और शराब पीने वालों को जेल भेजने में व्यस्त हो गई। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2016 से लेकर अब तक लगभग 17 लाख से अधिक लोगों को शराबबंदी कानून के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है। इस अत्यधिक काम के बोझ के कारण पुलिस थानों में सामान्य कानून-व्यवस्था, महिलाओं से जुड़े गंभीर अपराधों की त्वरित जांच, और गश्त (Patrolling) जैसी आवश्यक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुईं। जब पुलिस का मुख्य मूल्यांकन इस आधार पर होने लगा कि उसने कितनी लीटर शराब जब्त की, तो महिलाओं के खिलाफ होने वाले छेड़छाड़, घरेलू प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों पर पुलिसिया कार्रवाई सुस्त पड़ गई। थानों में शिकायत लेकर जाने वाली महिलाओं को समय पर न्याय नहीं मिला क्योंकि पुलिस बल का एक बड़ा हिस्सा मद्य निषेध अभियानों में तैनात था।

विशेषज्ञों की राय: केवल प्रतिबंध समाधान नहीं

समाजशास्त्रियों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि व्यवहार को नियंत्रित करने वाले कानून (Behavioral Regulations) समाज में तब तक पूरी तरह सफल नहीं हो सकते जब तक कि उनके साथ व्यापक सामाजिक सुधार और संस्थागत मजबूती न हो। केवल कागजों पर शराब को प्रतिबंधित कर देने से पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के प्रति गहरी जड़ें जमाए बैठी हिंसक मानसिकता को नहीं बदला जा सकता। NCAER की रिपोर्ट में भी सरकार को यह सुझाव दिया गया है कि बिहार जैसे पिछड़े और घनी आबादी वाले राज्य को अपने वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक शक्ति को शराबबंदी जैसे असफल प्रयोगों में झोंकने के बजाय महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण, शिक्षा, रोजगार, और सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर लगाना चाहिए। शराबबंदी के कारण राज्य को हर साल लगभग 14 से 15 प्रतिशत के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है, जो पैसा महिलाओं की सुरक्षा, विशेष महिला पुलिस थानों की स्थापना, और फास्ट-ट्रैक अदालतों के गठन में इस्तेमाल हो सकता था।

शराबबंदी नीति की समीक्षा का समय

बिहार में शराबबंदी के दस साल बाद का यह कड़वा सच इस बात का गवाह है कि कोई भी कानून अपने नेक इरादों के बावजूद तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि उसका क्रियान्वयन व्यावहारिक न हो। महिलाओं के नाम पर शुरू की गई इस नीति ने अंततः महिलाओं को ही एक नए तरह के असुरक्षित माहौल और संगठित अपराध के चक्रव्यूह में धकेल दिया है। आंकड़ों की इस गवाही के बाद अब समय आ गया है कि सरकार इस नीति की समीक्षा करे और केवल प्रतिबंध के चश्मे से देखने के बजाय महिला सुरक्षा के लिए एक ठोस, व्यापक और बहुआयामी रणनीति तैयार करे।

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