80 साल बाद भी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां जापान में, सुप्रीम कोर्ट में वापसी की मांग

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80 साल बाद भी रेंकोजी मंदिर में नेताजी की अस्थियां: सुप्रीम कोर्ट की दस्तक, आज़ादी के महानायक की ‘अस्थियों’ का निर्वासन

भारत की स्वतंत्रता क्रांति के सबसे प्रखर सूर्य, आजाद हिंद फौज (INA) के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु और उनके अवशेषों का रहस्य आज भी 80 से अधिक वर्षों के बाद भारतीय इतिहास और न्यायपालिका के गलियारों में गूंज रहा है। हाल ही में, 11 अगस्त 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को नोटिस जारी कर इस संवेदनशील विषय पर जवाब तलब किया है। यह कानूनी मोड़ नेताजी की इकलौती बेटी और उनकी कानूनी वारिस, 84 वर्षीय डॉ. अनीता बोस फाफ द्वारा दायर की गई एक रिट याचिका के बाद आया है, जिन्होंने जापान के टोक्यो स्थित रेंकोजी मंदिर में रखी नेताजी की अस्थियों को भारत वापस लाने (Repatriation) की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर भावना और संविधान का संगम

11 अगस्त 2026 को देश के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ के सामने जब यह मामला आया, तो कोर्ट रूम में इतिहास और वर्तमान एक साथ खड़े नजर आए। याचिकाकर्ता डॉ. अनीता बोस फाफ की ओर से देश के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी की। इस याचिका का मुख्य कानूनी आधार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life and Personal Liberty) को बनाया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि किसी भी व्यक्ति के अवशेषों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार करना और उसके परिवार को सम्मानजनक विदाई देना, गरिमापूर्ण जीवन और मृत्यु के अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा है।

28 सितंबर 2026 को सुनवाई

सिंघवी ने अदालत को बताया कि नेताजी की बेटी अब 84 वर्ष की हो चुकी हैं और ऑस्ट्रिया में रहती हैं। उनकी अंतिम इच्छा है कि वे अपने पिता के अवशेषों को भारत लाकर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार उनका अंतिम संस्कार कर सकें। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार ने दशकों से इस विषय पर कोई अंतिम, तार्किक और समयबद्ध निर्णय नहीं लिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र को नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई के लिए 28 सितंबर 2026 की तारीख तय की है।

पोते की याचिका खारिज होने से बेटी की सीधी लड़ाई तक

इस साल के शुरुआती महीनों में, यानी मार्च 2026 में, सर्वोच्च न्यायालय ने नेताजी के परपोते (भांजी के बेटे) और वरिष्ठ पत्रकार आशीष रे द्वारा दायर एक ऐसी ही जनहित याचिका (PIL) को सुनने से इनकार कर दिया था। उस समय CJI सूर्यकांत के नेतृत्व वाली पीठ ने टिप्पणी की थी कि अदालत नेताजी के प्रति देश की भावनाओं और उनके सर्वोच्च बलिदान का पूरा सम्मान करती है, लेकिन यदि अवशेषों को वापस लाने का कानूनी सवाल है, तो नेताजी के सीधे और वास्तविक कानूनी वारिस को सामने आना होगा। अदालत ने सख्त लहजे में कहा था, “कानूनी वारिस को खुद अदालत के सामने आना चाहिए। वह पर्दे के पीछे से नहीं लड़ सकतीं।” हालांकि उस सुनवाई में डॉ. अनीता बोस फाफ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअली जुड़ी हुई थीं और याचिका का समर्थन कर रही थीं, लेकिन अदालत ने तकनीकी आधार पर इसे खारिज करते हुए सीधे याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी थी। इसी का संज्ञान लेते हुए, डॉ. अनीता बोस ने इस बार खुद मुख्य याचिकाकर्ता के रूप में अदालत का रुख किया है, जिसके बाद कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करना उचित समझा।

इतिहास के झरोखे से: रेंकोजी मंदिर में 81 वर्षों का प्रवास

आधिकारिक और स्थापित ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ताइहोकू (ताइपे) में हुए एक विमान हादसे में नेताजी गंभीर रूप से झुलस गए थे और एक सैन्य अस्पताल में उनका निधन हो गया था। सितंबर 1945 की शुरुआत में उनके कथित अवशेषों और भस्म-कलश (Urn) को जापान की राजधानी टोक्यो ले जाया गया, जहाँ उन्हें टोक्यो के एक शांत आवासीय क्षेत्र में स्थित रेंकोजी मंदिर (Renkō-ji Temple) में सुरक्षित रखवा दिया गया। तब से लेकर आज तक, यानी पिछले 80 वर्षों से, रेंकोजी मंदिर के मुख्य पुजारियों की पीढ़ियां इस कलश की देखरेख और पूजा-अर्चना कर रही हैं। यह मंदिर भारतीय आगंतुकों, राजनयिकों और जापान के नागरिकों के लिए एक पवित्र स्थल बन चुका है। दिलचस्प बात यह है कि भारत के कई प्रधानमंत्रियों और राष्ट्राध्यक्षों ने अपनी जापान यात्रा के दौरान इस मंदिर में जाकर नेताजी की अस्थियों को श्रद्धांजलि अर्पित की है। यहां तक कि भारत सरकार इस कलश के रखरखाव और सुरक्षा के खर्च में भी वित्तीय योगदान देती है, जो यह दर्शाता है कि सरकार परोक्ष रूप से इन अवशेषों के महत्व को स्वीकार करती है।

तीन आयोग, विरोधाभास और राजनीतिक हिचकिचाहट

नेताजी की मृत्यु और इन अस्थियों की प्रामाणिकता की जांच के लिए भारत सरकार ने समय-समय पर तीन मुख्य जांच समितियों और आयोगों का गठन किया।
शाहनवाज समिति (1956): इस समिति ने निष्कर्ष निकाला कि नेताजी की मृत्यु 1945 के विमान हादसे में ही हुई थी।
जस्टिस जी.डी. खोसला आयोग (1970): इस आयोग ने भी शाहनवाज समिति की रिपोर्ट का समर्थन किया और विमान दुर्घटना की थ्योरी को सही माना।
जस्टिस मुखर्जी आयोग (1999-2005): 2005 में सौंपी गई इस आयोग की रिपोर्ट ने इतिहास को हिलाकर रख दिया। मुखर्जी आयोग ने निष्कर्ष दिया कि नेताजी की मृत्यु उस कथित विमान हादसे में नहीं हुई थी और रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियां नेताजी की नहीं हैं।

मनमोहन सरकार ने खारिज की रिपोर्ट

तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने मुखर्जी आयोग के इन निष्कर्षों को खारिज कर दिया था। इसके बाद वर्ष 2017 में गृह मंत्रालय (MHA) ने एक RTI के जवाब में स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सरकार मानती है कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को ही हुई थी। लेकिन विरोधाभास यही है कि यदि सरकार मानती है कि वे अवशेष नेताजी के ही हैं, तो उन्हें आज तक आधिकारिक तौर पर भारत क्यों नहीं लाया गया? इसके पीछे सरकारों की राजनयिक हिचकिचाहट, ताइवान और जापान के साथ जुड़े कूटनीतिक प्रोटोकॉल और भारत के भीतर कुछ राजनीतिक गुटों का विरोध रहा है, जो विमान दुर्घटना की थ्योरी को सिरे से खारिज करते हैं।

DNA Testing की मांग और वैज्ञानिक अड़चनें

डॉ. अनीता बोस फाफ और नेताजी के एक अन्य प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस (जिन्होंने हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी इस संबंध में पत्र लिखा था) ने लगातार मांग की है कि रेंकोजी मंदिर की अस्थियों का आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से DNA टेस्ट कराया जाए। चंद्र कुमार बोस का तर्क है कि DNA टेस्ट से सभी प्रकार के रहस्यों और विवादों पर हमेशा के लिए विराम लग जाएगा, जिससे देश के सामने सच आ सकेगा। हालाँकि, इस खोजी रिपोर्ट के दौरान कुछ वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के हवाले से यह बात भी सामने आई है कि 80 वर्ष से अधिक पुराने और अत्यधिक तापमान पर संस्कारित किए गए अवशेषों से क्या आज के समय में उपयोग करने योग्य डीएनए (Usable DNA) निकाला जा सकता है? यह एक बड़ा तकनीकी प्रश्न है। इसके बावजूद, परिवार का मानना है कि आधुनिक तकनीक की मदद से एक प्रयास अवश्य किया जाना चाहिए।

क्या अब समाप्त होगा महानायक का वनवास?

यह मामला सिर्फ कुछ अवशेषों को एक देश से दूसरे देश लाने का नहीं है। यह भारत के स्वाभिमान, कूटनीतिक इच्छाशक्ति और एक बेटी के अपने पिता के प्रति अंतिम धार्मिक कर्तव्यों से जुड़ा भावनात्मक प्रश्न है। जापान सरकार और रेंकोजी मंदिर के पादरी कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि वे इन अवशेषों को ससम्मान भारत को सौंपने के लिए तैयार हैं, बशर्ते भारत सरकार इसके लिए कोई आधिकारिक और औपचारिक अनुरोध करे।

मोदी सरकार के पाले में गेंद

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब गेंद मोदी सरकार के पाले में है। क्या सरकार 28 सितंबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में कोई ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना प्रस्तुत करेगी? भारत के करोड़ों नागरिक और नेताजी के अनुयायी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले ‘नेताजी’ के अवशेषों को अपनी मातृभूमि की मिट्टी नसीब हो सके, ताकि इतिहास के इस अधूरे अध्याय को एक न्यायपूर्ण और गरिमापूर्ण अंत मिल सके।

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