दुनिया के अमीर सेंट्रल बैंकों पर भारी भारतीय महिलाओं का लॉकर, देश की GDP से भी भारी

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भारतीय घरों में सोने का महा-भंडार: दुनिया के शीर्ष 10 सेंट्रल बैंकों से भी बड़ी वित्तीय शक्ति

यह भारतीय अर्थव्यवस्था का वह चमकता हुआ सच है, जो दुनिया के बड़े से बड़े अर्थशास्त्रियों को हैरत में डाल देता है। जब हम वैश्विक संपन्नता की बात करते हैं, तो अक्सर हमारी नजरें अमेरिका के फोर्ट नॉक्स, फेडरल रिजर्व या यूरोपीय देशों के केंद्रीय बैंकों के आधिकारिक स्वर्ण भंडारों पर टिकी होती हैं। लेकिन विश्व स्वर्ण परिषद (वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल – WGC) और विभिन्न वैश्विक वित्तीय संस्थानों की हालिया रिपोर्टों ने एक ऐसे तथ्य को रेखांकित किया है, जो भारत की घरेलू ताकत को दुनिया के सामने नए रूप में पेश करता है। रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय परिवारों (विशेषकर महिलाओं) और देश के धार्मिक संस्थानों के पास सामूहिक रूप से सोने का एक ऐसा ‘जायगेंटिक’ यानी विशाल भंडार है, जो दुनिया के शीर्ष 10 देशों के केंद्रीय बैंकों (सेंट्रल बैंकों) के कुल आधिकारिक स्वर्ण भंडार से भी कहीं अधिक है। यह केवल आभूषण या श्रृंगार का साधन नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीय परिवारों की वह ‘मौन वित्तीय शक्ति’ है, जो किसी भी संकट के समय देश की आर्थिक रीढ़ बनकर खड़ी हो जाती है।

आंकड़ों की चमक: फोर्ट नॉक्स से भी बड़ा है भारतीय महिलाओं का ‘लॉकर’

यदि आप दुनिया के सबसे बड़े सोने के भंडार वाले देशों की सूची देखेंगे, तो आधिकारिक तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) लगभग 8,133 टन सोने के भंडार के साथ पहले स्थान पर दिखाई देता है। इसके बाद जर्मनी, इटली, फ्रांस और रूस जैसे देशों का नाम आता है। लेकिन जब बात ‘निजी स्वर्ण भंडार’ (Private Gold Holding) की आती है, तो भारत के आम घरों के सामने दुनिया की ये महाशक्तियां बौनी नजर आने लगती हैं। विश्व स्वर्ण परिषद और मॉर्गन स्टेनली जैसी वैश्विक एजेंसियों के अनुमानों के मुताबिक, भारतीय परिवारों के पास वर्तमान में लगभग 25,000 से लेकर 34,600 टन तक सोना मौजूद है। यदि इसमें देश के बड़े और ऐतिहासिक मंदिरों तथा गुरुद्वारों के पास मौजूद सोने को भी शामिल कर लिया जाए, तो यह आंकड़ा लगभग 50,000 टन तक पहुंच जाता है। इस विशालकाय भंडार की भयावहता और ताकत को समझने के लिए इसकी तुलना दुनिया के सबसे अमीर केंद्रीय बैंकों से करके देखना जरूरी है।
अमेरिका बनाम भारतीय घर- अमेरिका के केंद्रीय बैंक के पास जहां 8,133 टन सोना है, वहीं भारतीय घरों में उससे चार गुना से भी अधिक सोना जमा है।
चीन बनाम भारतीय घर- चीन का आधिकारिक स्वर्ण भंडार करीब 2,306 टन है। इस लिहाज से भारतीय परिवारों के पास चीन के केंद्रीय बैंक से लगभग 15 गुना ज्यादा सोना है।

शीर्ष 10 बैंकों पर भारी

यदि अमेरिका, जर्मनी, इटली, फ्रांस, रूस, चीन, स्विट्जरलैंड, जापान, नीदरलैंड और भारत के अपने रिजर्व बैंक (RBI) सहित दुनिया के शीर्ष 10 केंद्रीय बैंकों के आधिकारिक भंडार को जोड़ भी दिया जाए, तो भी भारतीय घरों का निजी सोना उन सब पर भारी पड़ता है। अनुमान बताते हैं कि दुनिया भर में जमीन के ऊपर जितना भी सोना आज तक निकाला गया है, उसका लगभग 11% से 16% हिस्सा अकेले भारत के परिवारों की तिजोरियों और लॉकरों में सुरक्षित रखा हुआ है।

देश की GDP से भी बड़ी संपत्ति: $5 ट्रिलियन का साम्राज्य

इस सोने के भंडार की वित्तीय कीमत कितनी है? अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, हाल के वर्षों में वैश्विक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के कारण सोने की कीमतों में जो रिकॉर्ड तोड़ तेजी आई है, उसने भारतीय घरों की इस छिपी हुई संपत्ति के मूल्य को आसमान पर पहुंचा दिया है। वर्तमान मूल्यांकन के आधार पर, भारतीय परिवारों के पास मौजूद इस सोने की कुल कीमत लगभग $5 ट्रिलियन (यानी करीब 415 लाख करोड़ रुपये से 830 लाख करोड़ रुपये के बीच) आंकी गई है। इस आंकड़े की विशालता को समझने के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर नजर डालनी होगी।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की रिपोर्ट

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की नॉमिनल GDP वर्तमान में लगभग $4.125 ट्रिलियन के स्तर पर है। इसका सीधा और चौंकाने वाला अर्थ यह हुआ कि भारतीय घरों में रखा सोना देश की कुल सालाना जीडीपी से भी अधिक मूल्यवान हो चुका है। दुनिया के संदर्भ में बात करें, तो अमेरिका और चीन को छोड़कर दुनिया के लगभग किसी भी देश की कुल वार्षिक जीडीपी इतनी नहीं है, जितना मूल्यवान सोना भारतीय परिवारों ने अपने पास सहेज कर रखा है। उदाहरण के लिए, यह मूल्य पड़ोसी देश पाकिस्तान की जीडीपी से लगभग छह गुना बड़ा है और इटली या कनाडा जैसी उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की पूरी जीडीपी को भी पीछे छोड़ देता है।

संस्कृति, परंपरा और सुरक्षा का अनूठा त्रिकोण

आखिर भारतीयों में, और विशेष रूप से भारतीय महिलाओं में सोने के प्रति यह अगाध प्रेम क्यों है? इसके पीछे कोई आधुनिक कॉर्पोरेट हेज फंड रणनीति या संस्थागत निवेश का नियम नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी संस्कृति, धार्मिक विश्वास और दूरदर्शी बचत आदतों का परिणाम है।

‘स्त्रीधन’ और वित्तीय स्वायत्तता

भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से महिलाओं को संपत्ति के अधिकारों से वंचित रखा गया था, लेकिन ‘स्त्रीधन’ के रूप में शादी के समय मिलने वाले सोने के गहनों पर केवल महिला का अधिकार होता था। यह परंपरा आज भी जारी है। भारतीय माता-पिता अपनी बेटियों की शादी या जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों पर सोना उपहार में देते हैं। यह केवल एक सुंदर उपहार नहीं है, बल्कि महिला को एक अदृश्य वित्तीय स्वतंत्रता और सुरक्षा कवच प्रदान करने का जरिया है।

बिना किसी तीसरे पक्ष का जोखिम (No Counterparty Risk)

सोने की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी सरकार, बैंक या डिजिटल प्रणाली के भरोसे नहीं चलता। कागजी मुद्रा या डिजिटल संपत्तियां संकट के समय डूब सकती हैं, लेकिन भौतिक सोना हमेशा अपनी कीमत बनाए रखता है। इसे न तो कोई हैक कर सकता है और न ही कोई सरकार इसे आसानी से फ्रीज कर सकती है। यह पूर्ण रूप से विकेंद्रीकृत आर्थिक व्यवस्था है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है।

ग्रामीण भारत का भरोसा

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां आज भी औपचारिक बैंकिंग और शेयर बाजार (Equities/Mutual Funds) तक पहुंच सीमित है, वहां सोना ही सबसे विश्वसनीय बैंक है। ग्रामीण परिवार अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा सोने में निवेश करते हैं क्योंकि इसे संकट के समय तुरंत नकदी में बदला जा सकता है। दक्षिण भारत के राज्यों में यह प्रवृत्ति और भी अधिक देखी जाती है, जहां देश के अन्य हिस्सों की तुलना में सोने की औसत होल्डिंग बहुत ज्यादा है।

जब तिजोरी का सोना बन जाता है ‘बर्फ’

अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतीयद्यपि यह $5 ट्रिलियन का भंडार दिखने में बेहद आकर्षक और गर्व महसूस कराने वाला है, लेकिन देश के नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के लिए यह एक बड़ी चुनौती भी पेश करता है। बाजार के दिग्गजों और वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय घरों में रखा यह सोना अधिकांशतः ‘निष्क्रिय’ (Idle Asset) है। यह बैंकों के लॉकरों या घरों की तिजोरियों में बंद है, जिससे यह देश के आर्थिक चक्र में सक्रिय रूप से घूम नहीं पाता। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने इस कीमती धातु के आयात के लिए पिछले दशकों में अरबों डॉलर खर्च किए हैं। यह खर्च देश को मिलने वाले कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) से भी अधिक रहा है। जब लोग भौतिक सोना खरीदकर लॉकर में बंद कर देते हैं, तो वह पैसा अर्थव्यवस्था के औपचारिक चैनलों (formal channels) से बाहर हो जाता है, जिससे उद्योगों और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आवश्यक पूंजी की कमी होती है। यदि यह सोना देश की बैंकिंग प्रणाली में लौट आए, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई और अकल्पनीय गति दे सकता है।

गोल्ड लोन और वित्तीयकरण: बदल रही है सोच

हालांकि, पिछले कुछ समय से भारतीय परिवारों की इस सोच में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिल रहा है। सोने को केवल लॉकर में बंद रखने के बजाय, अब इसका उपयोग ‘एक्टिव कोलैटरल’ यानी जमानत के रूप में करके ऋण (Gold Loans) लेने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। आज भारत का गोल्ड लोन बाजार कई लाख करोड़ रुपये का हो चुका है। छोटे व्यवसायी (MSMEs), किसान और आम परिवार अपनी आकस्मिक जरूरतों, शिक्षा, या व्यवसाय के विस्तार के लिए इस सोने को गिरवी रखकर तुरंत पूंजी हासिल कर रहे हैं। इसके अलावा, शहरी आबादी के बीच अब भौतिक सोने के बजाय डिजिटल स्वर्ण उपकरण जैसे गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGBs) के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है, जो यह दर्शाता है कि भारतीय अब सोने को केवल आभूषण के रूप में नहीं, बल्कि एक उत्पादक वित्तीय परिसंपत्ति के रूप में देखने लगे हैं।

मोनेटाइजेशन की राह: 2047 तक महाशक्ति बनने का मंत्र

उद्योग मंडल एसोचैम (ASSOCHAM) की एक हालिया रिपोर्ट में एक बेहद दिलचस्प खाका खींचा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत सरकार और वित्तीय संस्थान अपनी नीतियों और आकर्षक योजनाओं के माध्यम से भारतीय परिवारों को इस बात के लिए प्रेरित कर सकें कि वे अपने कुल सोने के भंडार का केवल 2% हिस्सा हर साल औपचारिक बैंकिंग प्रणाली या ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम’ के तहत निवेश करें, तो इसके जादुई नतीजे हो सकते हैं। ऐसा होने पर वर्ष 2047 (जब भारत अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करेगा) तक देश के कुल घरेलू सोने का लगभग 40% हिस्सा औपचारिक वित्तीय प्रणाली का हिस्सा बन जाएगा। यह कदम भारत की जीडीपी में लगभग $7.5 ट्रिलियन का भारी-भरकम इजाफा कर सकता है। इसके परिणामस्वरूप, 2047 तक भारत की अर्थव्यवस्था का जो अनुमानित आकार लगभग $34 ट्रिलियन माना जा रहा है, वह बढ़कर $41.5 ट्रिलियन तक पहुंच सकता है।

भारतीय परिवारों की आर्थिक सुरक्षा की गारंटी

भारतीय घरों में छुपा सोने का यह जायगेंटिक भंडार इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक आर्थिक संकटों के बीच भी भारत का आम परिवार कितना आत्मनिर्भर और सुरक्षित है। यह सोना भारत की सांस्कृतिक विरासत का गौरव भी है और उसकी सबसे बड़ी छिपी हुई आर्थिक ढाल भी। चुनौती अब इस बात की है कि परंपरा और आधुनिक अर्थशास्त्र के बीच एक ऐसा बेहतरीन संतुलन बनाया जाए, जिससे घरों की तिजोरियों में रखा यह ‘सोना’ देश के विकास की धमनियों में दौड़ती ‘पूंजी’ बन सके। जिस दिन भारत अपने इस घरेलू खजाने का सही वित्तीयकरण करने में पूरी तरह सफल हो जाएगा, उस दिन उसे वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।

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