ऑफिस में 30 मिनट की नींद! Gen Z की अनोखी डिमांड ने चौंकाया फाउंडर, फिर बदल गया नौकरी का इंटरव्यू
नौकरी के इंटरव्यू में उम्मीदवार आमतौर पर अपनी योग्यता, अनुभव, वेतन, छुट्टियां, वर्क फ्रॉम होम या प्रमोशन की संभावनाओं को लेकर सवाल करता है। लेकिन अगर कोई उम्मीदवार इंटरव्यू में यह कह दे कि उसे हर दोपहर 30 मिनट सोने की अनुमति चाहिए, तो स्वाभाविक है कि सामने बैठा इंटरव्यू लेने वाला कुछ क्षण के लिए सोच में पड़ जाए। नोएडा के एक फाउंडर नितिन वर्मा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक Gen Z उम्मीदवार ने इंटरव्यू के दौरान साफ शब्दों में कहा कि उसे हर दोपहर करीब 30 मिनट की Nap चाहिए, क्योंकि इससे उसकी Productivity बेहतर होती है। इस मांग की खास बात सिर्फ यह नहीं थी कि उम्मीदवार ने सोने की अनुमति मांगी, बल्कि यह थी कि उसने अपनी जरूरत को पूरी सहजता और आत्मविश्वास के साथ सामने रखा।
शुरू हुई अनोखी बहस
पहली नजर में यह मांग किसी कॉरपोरेट ऑफिस में अनुशासन के खिलाफ लग सकती है। आखिर कंपनी कर्मचारी को काम करने के लिए नियुक्त करती है, सोने के लिए नहीं। लेकिन यही वह बिंदु है जहां से असली बहस शुरू होती है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “ऑफिस में कर्मचारी सो सकता है या नहीं?” सवाल यह होना चाहिए कि “अगर आधे घंटे की नींद के बाद कर्मचारी बाकी समय बेहतर प्रदर्शन करता है, तो क्या कंपनी को सिर्फ उस आधे घंटे को देखकर फैसला करना चाहिए?”
Gen Z की बदलती कार्य-दृष्टि
Gen Z के कार्यस्थल में प्रवेश के साथ कंपनियों के सामने केवल नई प्रतिभाएं नहीं आई हैं, बल्कि काम को देखने का एक नया नजरिया भी आया है। यह पीढ़ी कई मामलों में पारंपरिक कॉरपोरेट संस्कृति से अलग सवाल पूछती है। पुरानी कार्यसंस्कृति में कर्मचारी से अपेक्षा की जाती थी कि वह तय समय पर ऑफिस पहुंचे, निर्धारित समय तक काम करे और संगठन के नियमों के अनुसार चले। कर्मचारी की “अच्छी कार्यशैली” का मतलब अक्सर अनुशासन, समय की पाबंदी और लंबे समय तक काम करने की क्षमता माना जाता था।
नई पीढ़ी इस मॉडल पर सवाल उठाती है।
Gen Z के लिए कई बार काम के घंटे से ज्यादा महत्वपूर्ण काम का परिणाम, मानसिक संतुलन, Flexibility और व्यक्तिगत Productivity हो सकते हैं। यही कारण है कि आज कर्मचारी यह पूछने से भी नहीं हिचकते कि क्या काम करने का कोई बेहतर तरीका हो सकता है। नितिन वर्मा के सामने उम्मीदवार की Nap की मांग इसी बदलती मानसिकता का प्रतीक मानी जा सकती है।
क्या 30 मिनट की नींद वास्तव में Productivity बढ़ा सकती है?
यहां भावनाओं से अलग वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी जरूरी है। छोटी अवधि की दिन की नींद यानी Power Nap कई लोगों के लिए थकान कम करने, Alertness बढ़ाने और ध्यान केंद्रित करने में मददगार हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति को रोजाना 30 मिनट सोना ही चाहिए या इससे हर कर्मचारी की Productivity निश्चित रूप से बढ़ जाएगी। Nap का प्रभाव व्यक्ति की नींद की आदत, रात की नींद, काम की प्रकृति और स्वास्थ्य जैसे कई कारकों पर निर्भर कर सकता है। यानी उम्मीदवार की मांग को न तो तुरंत “आलस्य” कह देना उचित होगा और न ही यह मान लेना चाहिए कि हर ऑफिस में दोपहर की नींद Productivity का जादुई समाधान है।
व्यक्तिगत जरूरत और संगठनात्मक उत्पादकता के बीच संतुलन
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात उम्मीदवार की मांग से ज्यादा फाउंडर की प्रतिक्रिया है। बताया गया है कि पहली प्रतिक्रिया में उन्हें इंटरव्यू समाप्त करने का विचार आया। यह स्वाभाविक भी है। किसी स्टार्टअप या कंपनी के लिए हर कर्मचारी से अपेक्षा होती है कि वह टीम की गति के अनुरूप काम करे। यदि एक उम्मीदवार नौकरी शुरू होने से पहले ही अलग नियम की मांग करे, तो नियोक्ता के मन में कई सवाल उठ सकते हैं।
क्या वह भविष्य में और विशेष सुविधाएं मांगेगा?
क्या बाकी कर्मचारी भी ऐसी मांग करेंगे?
क्या इससे टीम की कार्यक्षमता प्रभावित होगी?
क्या ऑफिस में अनुशासन बनाए रखना मुश्किल होगा?
लेकिन इसके बाद फाउंडर ने सवाल को दूसरे कोण से देखा। यदि कर्मचारी के परिणाम अच्छे हैं, तो क्या 30 मिनट की Nap वास्तव में इतनी बड़ी समस्या है? यहीं एक आधुनिक प्रबंधन दृष्टिकोण सामने आता है।
कर्मचारी का समय या कर्मचारी का परिणाम?
कॉरपोरेट दुनिया में लंबे समय से एक बहस चलती रही है- किसी कर्मचारी को उसके ऑफिस में बिताए गए समय से मापा जाए या उसके परिणामों से? मान लीजिए दो कर्मचारी हैं। पहला व्यक्ति सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक ऑफिस में रहता है, लेकिन उसका वास्तविक Productive Work छह घंटे का है। दूसरा कर्मचारी केवल आठ घंटे काम करता है, बीच में 30 मिनट आराम करता है और फिर भी पहले कर्मचारी से बेहतर परिणाम देता है, तो कंपनी के लिए बेहतर कर्मचारी कौन है? यही सवाल Gen Z की नई कार्यसंस्कृति उठा रही है।हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हर नौकरी को केवल Individual Productivity के आधार पर नहीं चलाया जा सकता। अस्पताल, ग्राहक सेवा, सुरक्षा, विनिर्माण, परिवहन, खुदरा और कई अन्य क्षेत्रों में कर्मचारी की उपलब्धता सीधे सेवा से जुड़ी होती है। यदि ग्राहक सेवा कर्मचारी दोपहर में सो रहा है और उसी दौरान ग्राहक सहायता चाहता है, तो कंपनी के लिए समस्या पैदा होगी। इसलिए “Nap culture” का मतलब हर कर्मचारी को जब चाहे सोने की छूट देना नहीं हो सकता।
ऑफिस में आराम और अनुशासन के बीच संतुलन
भविष्य का ऑफिस शायद ऐसा नहीं होगा जहां हर कर्मचारी को एक जैसी कार्यशैली अपनानी पड़े। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हर व्यक्तिगत पसंद को कंपनी की नीति बना दिया जाए। बेहतर मॉडल यह हो सकता है कि कंपनियां परिणाम आधारित Flexibility विकसित करें। जहां काम की प्रकृति अनुमति देती हो, वहां छोटे ब्रेक, शांत स्थान, Wellness Rooms या Flexible Schedules जैसे विकल्प दिए जा सकते हैं। दूसरी तरफ, जिन पदों पर लगातार उपलब्ध रहना जरूरी है, वहां ऐसी सुविधाओं की सीमा स्पष्ट होनी चाहिए। यानी नियम व्यक्ति की इच्छा से नहीं बल्कि काम की प्रकृति और संगठन की जरूरत से तय होने चाहिए।
क्या उम्मीदवार की बेबाकी उसकी ताकत थी?
इस मामले में उम्मीदवार की सबसे बड़ी विशेषता शायद उसकी Nap की मांग नहीं, बल्कि उसे रखने का आत्मविश्वास था। अधिकांश उम्मीदवार इंटरव्यू में अपनी कमजोरियां छिपाने की कोशिश करते हैं। वे वही बताते हैं जो इंटरव्यू लेने वाला सुनना चाहता है। लेकिन यह उम्मीदवार अपनी कार्यशैली को पहले ही स्पष्ट कर रहा था। एक नियोक्ता के लिए यह दो तरह से देखा जा सकता है।
पहला दृष्टिकोण कहेगा- यह उम्मीदवार शुरुआत से ही अपनी शर्तें रख रहा है।
दूसरा दृष्टिकोण कहेगा- यह उम्मीदवार ईमानदार है और अपनी Productivity को समझता है।
सही जवाब शायद दोनों के बीच है- बेबाकी अच्छी है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। यदि कोई कर्मचारी सुविधा मांगता है तो उसे यह भी साबित करना होगा कि वह सुविधा संगठन के परिणामों को नुकसान नहीं पहुंचा रही।
Gen Z को “आलसी पीढ़ी” कहना कितना उचित?
Gen Z को लेकर अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि युवा कर्मचारी कम काम करना चाहते हैं, ज्यादा सुविधाएं चाहते हैं और पारंपरिक अनुशासन से बचना चाहते हैं। लेकिन ऐसी सामान्यीकृत धारणा खतरनाक है। हर पीढ़ी की तरह Gen Z में भी अलग-अलग तरह के लोग हैं। कुछ अत्यधिक महत्वाकांक्षी हैं, कुछ Work-Life Balance को प्राथमिकता देते हैं और कुछ पारंपरिक कॉरपोरेट मॉडल में ही सहज हैं। वास्तविक बदलाव यह है कि युवा कर्मचारी अब नौकरी को केवल वेतन के बदले समय बेचने के रूप में नहीं देखना चाहते। वे पूछ रहे हैं-
मैं कितना बेहतर काम कर सकता हूं?
मेरी Productivity किस तरीके से बढ़ सकती है?
क्या कंपनी मेरे काम के परिणाम को महत्व देगी या केवल मेरी कुर्सी पर मौजूदगी को?
यह सवाल केवल Gen Z का नहीं, आने वाले समय की पूरी Workforce का सवाल बन सकता है।
कंपनियों के लिए भी सबक
इस घटना से कंपनियों को भी सीख लेनी चाहिए। उम्मीदवारों की हर असामान्य मांग स्वीकार करना जरूरी नहीं है, लेकिन हर असामान्य मांग को तुरंत खारिज कर देना भी समझदारी नहीं। नियोक्ता को पूछना चाहिए-
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क्या इस मांग का वैज्ञानिक या व्यावहारिक आधार है?
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क्या इससे Productivity बढ़ सकती है?
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क्या टीम के दूसरे सदस्यों पर इसका असर पड़ेगा?
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क्या इसे सभी कर्मचारियों के लिए समान नियम बनाया जा सकता है?
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क्या काम की प्रकृति ऐसी सुविधा की अनुमति देती है?
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और सबसे महत्वपूर्ण- क्या कर्मचारी अपने प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेने को तैयार है?
यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक हों तो कंपनी को पुराने नियमों से बाहर निकलकर प्रयोग करने में कोई नुकसान नहीं।
लेकिन कर्मचारी की जिम्मेदारी भी कम नहीं
यह बहस केवल कंपनियों से लचीलापन मांगने तक सीमित नहीं रह सकती। कर्मचारियों को भी समझना होगा कि Flexibility अधिकार के साथ जिम्मेदारी लेकर आती है। अगर कंपनी किसी कर्मचारी को 30 मिनट की nap की अनुमति देती है, तो कर्मचारी से यह अपेक्षा भी होगी कि वह अपने काम के लक्ष्य पूरे करे, टीम के काम में बाधा न डाले और सुविधा का दुरुपयोग न करे। यानी भविष्य का Workplace शायद “कम काम” नहीं बल्कि “स्मार्ट तरीके से काम” की ओर बढ़ सकता है।
असली मुद्दा नींद नहीं, सोच है
नोएडा के इस इंटरव्यू की कहानी इसलिए चर्चा के योग्य है क्योंकि यह हमें 30 मिनट की नींद से कहीं बड़ा सवाल पूछने के लिए मजबूर करती है।
क्या कर्मचारी की कुर्सी पर मौजूदगी ही उसकी productivity का प्रमाण है?
क्या लंबे समय तक काम करना हमेशा बेहतर काम करने के बराबर है?
क्या ऑफिस में आराम के छोटे अंतराल को अनुशासनहीनता माना जाना चाहिए?
और क्या युवा पीढ़ी द्वारा रखी गई हर अलग मांग को “Gen Z की सनक” कहकर खारिज कर देना उचित है?
इन सवालों का जवाब शायद “हां” या “नहीं” में नहीं है। कंपनियों को यह स्वीकार करना होगा कि काम करने का तरीका बदल रहा है। वहीं कर्मचारियों को भी समझना होगा कि आधुनिक Workplace में Flexibility तभी टिकेगी, जब उसके साथ Measurable Performance और Accountability होगी। इसलिए उस उम्मीदवार की 30 मिनट की Nap को केवल “ऑफिस में सोने की मांग” के रूप में देखना इस कहानी को छोटा कर देना होगा। असल कहानी यह है कि एक युवा उम्मीदवार ने नियोक्ता से पूछा- अगर मैं आराम के 30 मिनट के बाद बेहतर परिणाम दूं, तो क्या आप मेरे काम को मेरी कुर्सी पर बिताए समय से ज्यादा महत्व देंगे? और शायद यही सवाल आने वाले कॉरपोरेट भारत की कार्यसंस्कृति को सबसे ज्यादा बदलने वाला है।
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