Arunachal Pradesh: बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के ‘प्रोजेक्ट ब्रह्मांक’ ने मनाया 16वां स्थापना दिवस

The CSR Journal Magazine
16वें स्थापना दिवस के मौके पर, बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (BRO) के ‘प्रोजेक्ट ब्रह्मांक’ ने अरुणाचल प्रदेश के रानाघाट में अपनी उपलब्धियों को सेलिब्रेट किया। इस समारोह के दौरान मुख्यालय और टास्क फोर्स के विभिन्न स्थानों पर सामाजिक और कल्याणकारी गतिविधियाँ आयोजित की गईं। इन गतिविधियों में सैनिक सम्मेलन, संवाद और सामूहिक भोज शामिल थे, जो कर्मियों के बीच सौहार्द बढ़ाने का कार्य कर रहे थे।

सड़क और पुल निर्माण का महत्त्व

प्रोजेक्ट ब्रह्मांक ने पिछले 15 वर्षों में अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में सड़क और पुल बनाने का काम किया है। यह परियोजना सियांग, ईस्ट सियांग, वेस्ट सियांग, अपर सियांग और शि-योमी जिलों के अलावा असम के धेमाजी जिले के कुछ क्षेत्रों में कार्यरत है। इस दौरान, 811 किलोमीटर लंबी सड़कों और लगभग 86 पुलों के निर्माण एवं रखरखाव का काम किया गया है।

नए पुलों का निर्माण

वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान, प्रोजेक्ट ब्रह्मांक ने सियांग और सियोम घाटियों में 13 नए पुलों का निर्माण पूरा किया। इन पुलों की कुल लंबाई 390 मीटर है, जो क्षेत्र में यातायात को सुगम बनाने में मददगार साबित होगी। इसके अलावा, 61 किलोमीटर सड़कों की ब्लैकटॉपिंग भी की गई है। इस परियोजना ने हेलिपैड का विकास भी किया है जिससे स्थानीय लोगों और सेना को यात्रा करने में सुविधा मिली है।

कठिन परिस्थितियों में सफलता

29 जून 2011 को स्थापित होने के बाद से, प्रोजेक्ट ब्रह्मांक ने कठिन पहाड़ी इलाकों, भारी बारिश, और सीमित संसाधनों के बावजूद बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे दूर-दराज के गांवों में सड़क संपर्क को मजबूत किया गया है। यह सड़कें न केवल स्थानीय लोगों के लिए सहायक हैं, बल्कि सशस्त्र बलों के लिए भी आवश्यक हैं।

कार्यक्रमों का आयोजन

स्थापना दिवस समारोह के मौके पर, विभिन्न सामाजिक और कल्याणकारी गतिविधियों का आयोजन किया गया। समारोह में सैनिक सम्मेलन, जवानों के बीच संवाद और सामूहिक भोज जैसी गतिविधियों का उद्देश्य कर्मियों के बीच मिलनसारिता को बढ़ावा देना था। इस तरह के आयोजन न केवल मनोबल को उठाते हैं, बल्कि सामुदायिक भावना को भी मजबूत करते हैं।

आरंभ की गई इस परियोजना का महत्व

अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी सियांग जिले में 29 जून 2011 को शुरू हुई यह परियोजना 3 दिसंबर 2011 को पूरी तरह चालू हो गई थी। ऊबड़-खाबड़ भूभाग, लगातार बारिश और सीमित अवसंरचना जैसी कठिनाइयों के बावजूद, इस परियोजना ने सशस्त्र बलों को रणनीतिक और परिचालन संपर्क प्रदान किया है। इसके अलावा, यह दूरदराज के गांवों को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

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