खाड़ी की गर्मी में मजदूरी से बेहतर अग्निवीर बनना- नेपाल में युवाओं का फूटा गुस्सा

The CSR Journal Magazine

इंडियन आर्मी में अग्निवीर बनना गल्फ जाने से बेहतर- नेपाल की परेशानियों का बड़ा कारण

भारतीय सेना की अग्निपथ योजना के तहत ‘अग्निवीर’ बनना खाड़ी देशों (गल्फ) में मजदूरी करने से सैकड़ों गुना बेहतर है, और इस पर रोक लगाना ही आज नेपाल के युवाओं की सबसे बड़ी परेशानी और बेरोजगारी का कारण बन चुका है। यह दर्दनाक हकीकत हाल ही में नेपाल के प्रमुख पर्यटन शहर पोखरा की सड़कों पर तब गूंजी, जब हजारों नेपाली युवाओं, पूर्व गोरखा सैनिकों और उनके परिजनों ने मिलकर एक विशाल रैली निकाली। आंदोलनकारियों ने नेपाल सरकार के अड़ियल रुख के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए मांग की है कि उन्हें भारतीय सेना में अग्निवीर के रूप में शामिल होने की तुरंत अनुमति दी जाए। कोविड-19 महामारी के बाद से साल 2022 में भारत द्वारा शुरू की गई अग्निपथ योजना पर नेपाल सरकार ने रोक लगा दी थी, जिससे पिछले कई वर्षों से पारंपरिक गोरखा भर्ती पूरी तरह ठप पड़ी है।

खाड़ी की ५० डिग्री गर्मी से बेहतर भारतीय सेना की वर्दी; नेपाल में ‘अग्निवीर’ योजना बहाल करने के लिए सड़कों पर उतरे युवा

नेपाल के शांत और खूबसूरत शहर पोखरा में इस हफ्ते जबरदस्त आक्रोश देखने को मिला। ‘इंडियन एक्स-सर्विसमैन गोरखा ब्रिगेड नेपाल’ के बैनर तले आयोजित एक विशाल प्रदर्शन ने काठमांडू से लेकर दिल्ली तक के कूटनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। प्रदर्शनकारियों ने साफ शब्दों में अपनी सरकार को चेतावनी दी है कि भारत की अग्निपथ योजना का विरोध करके नेपाल सरकार ने अपने ही देश के युवाओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है। सरकार को सौंपे गए एक आधिकारिक ज्ञापन (मेमोरेंडम) में आंदोलनकारियों ने कड़े शब्दों में लिखा:”भारतीय सेना में अग्निवीर की नौकरी खाड़ी देशों (गल्फ) की ५० डिग्री सेल्सियस की झुलसाने वाली गर्मी में न्यूनतम वेतन पर बंधुआ मजदूरी करने से सैकड़ों गुना बेहतर है। ४ साल की सेवा के दौरान एक अग्निवीर तमाम सुविधाओं के साथ लगभग ४५ से ५० लाख नेपाली रुपये कमा लेता है, जो किसी भी गल्फ देश में असंभव है।”

परेशानियों की जड़: क्यों बंद हुई गोरखा भर्ती?

ऐतिहासिक रूप से, भारत और नेपाल के बीच १९४७ में एक त्रिपक्षीय समझौता (भारत, नेपाल और ब्रिटेन) हुआ था, जिसके तहत नेपाली युवाओं को भारतीय और ब्रिटिश सेना के गोरखा रेजिमेंट में नियमित भर्ती, समान वेतन और जीवनभर पेंशन की गारंटी दी जाती थी। साल २०२२ में जब भारत सरकार ने सेना में सुधार करते हुए अग्निपथ योजना पेश की—जिसमें ४ साल की सेवा के बाद केवल २५% जवानों को स्थायी करने और ७५% को एकमुश्त सेवा निधि पैकेज देकर बिना पेंशन के कार्यमुक्त करने का प्रावधान है—तो नेपाल की तत्कालीन सरकार ने इस पर आपत्ति जता दी। नेपाल सरकार का तर्क था कि यह लघु अवधि की सेवा १९४७ के समझौते की भावना के खिलाफ है। तब से लेकर आज २०२६ तक, नेपाल ने अपने नागरिकों को भारतीय सेना में भर्ती होने से रोक रखा है।

आंकड़ों की जुबानी: क्यों तड़प रहा है नेपाल का युवा?

नेपाल में घरेलू स्तर पर रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं। देश की करीब १८% से अधिक आबादी आजीविका की तलाश में विदेशों में भटक रही है। जब से भारतीय सेना का रास्ता बंद हुआ है, तब से नेपाल के युवाओं के पास खाड़ी देशों (जैसे कतर, सऊदी अरब, यूएई) या मलेशिया जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

वेतन और सुरक्षा का अंतर

खाड़ी देशों में नेपाली श्रमिकों को बेहद खतरनाक और अमानवीय परिस्थितियों में न्यूनतम वेतन पर काम करना पड़ता है, जहाँ कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं होती। इसके विपरीत, ४ साल के लिए भी भारतीय सेना का हिस्सा बनने पर उन्हें एक प्रतिष्ठित जीवन, बेहतरीन चिकित्सा सुविधाएं, सैन्य प्रशिक्षण और अंत में एक बड़ी वित्तीय राशि मिलती है, जिससे वे नेपाल लौटकर अपना कोई व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।

परंपरा और सम्मान का ह्रास

सुगौली संधि (१८१६) के बाद से पिछले २०७ से अधिक वर्षों से नेपाली युवा भारतीय सेना की शान रहे हैं। पूर्व सैन्य अधिकारियों का कहना है कि भर्ती पर रोक लगाकर नेपाल सरकार ने न केवल आर्थिक अवसर छीने हैं, बल्कि गोरखाओं की उस ऐतिहासिक पहचान और विरासत को भी दांव पर लगा दिया है, जो पीढ़ियों से चली आ रही थी।

भारत का स्पष्ट रुख: “कोई अलग नियम नहीं होगा”

इस गतिरोध पर भारत सरकार और भारतीय रक्षा मंत्रालय का रुख हमेशा से पूरी तरह स्पष्ट रहा है। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान सहित कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि भारतीय सेना में अब सैनिकों के स्तर पर सभी नई भर्तियां केवल और केवल अग्निपथ योजना के माध्यम से ही की जा रही हैं। भारत ने दो-टूक शब्दों में साफ कर दिया है कि नेपाली नागरिकों के लिए कोई अलग या विशेष व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती। भारतीय सेना में जो सुविधाएं और नियम भारतीय नागरिकों पर लागू होते हैं, वही नेपाली गोरखाओं पर भी लागू होंगे। ऐसे में अब पूरी गेंद नेपाल सरकार के पाले में है कि वह अपने राजनीतिक अहंकार को छोड़कर व्यावहारिक रुख अपनाए।

क्या होगा नेपाल पर इसका सामाजिक और आर्थिक असर?

सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यदि नेपाल सरकार ने जल्द ही इस गतिरोध को नहीं सुलझाया, तो इसके बेहद गंभीर परिणाम होंगे।  नेपाल में भारतीय सेना के लगभग १.२५ लाख से अधिक पेंशनभोगी पूर्व सैनिक रहते हैं, जिनके जरिए हर साल करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा पेंशन के रूप में नेपाल की अर्थव्यवस्था में आती है। भर्ती पूरी तरह बंद रहने से भविष्य में यह आर्थिक मदद सूख जाएगी। रोजगार के अभाव में तड़प रहे नेपाल के कई युवाओं के भटकने और अवैध रूप से विदेशी युद्धक्षेत्रों (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध) में भाड़े के सैनिकों के रूप में शामिल होने की खबरें भी लगातार आती रही हैं, जो नेपाल की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। पोखरा के जिला प्रशासन को सौंपे गए ज्ञापन के बाद अब देश भर के युवाओं की नजरें काठमांडू में बैठी सरकार पर टिकी हैं। क्या नेपाल सरकार अपने युवाओं को खाड़ी के रेगिस्तानों में तपने के लिए छोड़ देगी या भारतीय सेना की वीर वर्दी पहनने का उनका सपना दोबारा बहाल करेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

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