विश्व बैंक वर्गीकरण में पड़ोसी देश श्रीलंका की बड़ी छलांग, अपर-मिडिल इनकम ग्रुप में वापसी

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श्रीलंका की उन्नति: वर्ल्ड बैंक की नई कैटेगरी श्रीलंका ने हासिल की नई उपलब्धि

वैश्विक अर्थव्यवस्था के मंच पर दक्षिण एशिया से एक बेहद चौंकाने वाली और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। विश्व बैंक (World Bank) द्वारा जारी देशों के वार्षिक आय वर्गीकरण (Country Income Classification) के नवीनतम आंकड़ों में भारत के पड़ोसी द्वीप देश श्रीलंका ने ‘अपर-मिडिल इनकम’ (उच्च-मध्यम आय) देश की श्रेणी में दोबारा प्रवेश कर लिया है। यह घटनाक्रम इसलिए विशेष है क्योंकि मात्र तीन साल पहले (2022 में) श्रीलंका इतिहास के अपने सबसे भीषण आर्थिक संकट, विदेशी मुद्रा के पूर्ण अभाव और संप्रभु ऋण डिफॉल्ट (Sovereign Debt Default) से जूझ रहा था।

आखिर भारत क्यों रह गया पीछे?

दूसरी ओर, दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली और आकार में पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद, भारत ‘लोअर-मिडिल इनकम’ (निम्न-मध्यम आय) की श्रेणी में ही बना हुआ है। भारत साल 2007 से लगातार इसी पायदान पर टिका है। विश्व बैंक का यह नया वर्गीकरण दुनिया भर की 218 अर्थव्यवस्थाओं के विश्लेषण पर आधारित है, जो आने वाले जून 2027 तक प्रभावी रहेगा। यह रिपोर्ट इस विरोधाभास के पीछे छिपे वास्तविक आर्थिक कारणों, विश्व बैंक के जटिल मूल्यांकन के नियमों और भारत की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिति का एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

श्रीलंका की वापसी: डिफॉल्ट से ‘अपर-मिडिल’ तक का सफर

विश्व बैंक ने श्रीलंका की इस तरक्की को “रिकवरी और जुझारूपन की एक असाधारण कहानी” (A story of recovery and resilience) करार दिया है। साल 2022 का दौर याद करें तो श्रीलंका में पेट्रोल-डीजल के लिए मील लंबी कतारें थीं, दवाइयों की किल्लत थी, आसमान छूती महंगाई थी और जनता के हिंसक विद्रोह के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा था। उस अभूतपूर्व मंदी के बाद श्रीलंका को लोअर-मिडिल इनकम ग्रुप में धकेल दिया गया था।

सुधार के मुख्य कारक

GDP में मजबूत बाउंस-बैक: कड़े आर्थिक सुधारों, वित्तीय अनुशासन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के बेलआउट पैकेज के बूते श्रीलंका की वास्तविक जीडीपी (Real GDP) ने वर्ष 2025 में 5 प्रतिशत की शानदार विकास दर दर्ज की है।
पर्यटन और वित्तीय सेवाओं का पुनरुद्धार: देश के विदेशी मुद्रा भंडार का मुख्य स्रोत ‘टूरिज्म इंडस्ट्री’ (पर्यटन क्षेत्र) 2024-2025 में पूरी तरह गुलजार हो गया। इसके साथ ही बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं में आए उछाल ने विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र को दोबारा गति दी।
संकीर्ण बढ़त: हालांकि, विश्व बैंक ने यह भी साफ किया है कि श्रीलंका ने इस श्रेणी (Threshold) को बहुत ही मामूली अंतर से पार किया है, लेकिन यह मनोवैज्ञानिक और नीतिगत स्तर पर देश के लिए एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय जीत है।

भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, फिर भी श्रेणी वही क्यों?

आम तौर पर लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो भारत 3.9 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की जीडीपी के साथ दुनिया की महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, वह श्रीलंका (जिसकी अर्थव्यवस्था भारत के किसी एक बड़े राज्य के बराबर भी नहीं है) से पीछे कैसे रह गया? आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण विश्व बैंक का पैमाना है। विश्व बैंक किसी देश की अर्थव्यवस्था का कुल आकार (Absolute GDP) नहीं देखता, बल्कि ‘प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय’ (GNI per Capita) के आधार पर मूल्यांकन करता है।

भारत के समक्ष चुनौतियाँ- विशाल जनसंख्या का प्रभाव

भारत की कुल राष्ट्रीय आय (Gross National Income) जब देश की 140 करोड़ से अधिक की विशाल आबादी में विभाजित होती है, तो प्रति व्यक्ति का हिस्सा काफी कम हो जाता है। इसके विपरीत, श्रीलंका की आबादी मात्र 2.2 करोड़ के आसपास है, जिससे वहां प्रति व्यक्ति आय का औसत तेजी से ऊपर भागता है।

GDP बनाम GNI का अंतर

जहां जीडीपी घरेलू सीमाओं के भीतर उत्पादन को मापती है, वहीं जीएनआई (GNI) में देश के नागरिकों और व्यवसायों द्वारा विदेशों से अर्जित आय भी शामिल होती है। भारत की प्रति व्यक्ति जीएनआई वर्तमान में लगभग $2,500 से $2,700 के बीच आंकी गई है। यह आंकड़ा लोअर-मिडिल ग्रुप की सीमा में तो बहुत मजबूत है, लेकिन अगली श्रेणी में जाने के लिए नाकाफी है।

आय का वितरण

भारत में आर्थिक असमानता (K-shaped Recovery और वेल्थ डिस्ट्रीब्यूशन) भी एक बड़ा कारण है, जिसके चलते औसत प्रति व्यक्ति आय का स्तर उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाता, जितनी तेजी से देश की कॉर्पोरेट जीडीपी बढ़ती है।

विश्व बैंक का नया वर्गीकरण पैमाना

विश्व बैंक प्रतिवर्ष 1 जुलाई को एटलस पद्धति (Atlas Method) का उपयोग करते हुए डॉलर की क्रय शक्ति और महंगाई (SDR Deflator) को समायोजित कर नया पैमाना तय करता है। इस वर्ष (वित्तीय वर्ष 2027 के लिए) जो श्रेणियां निर्धारित की गई हैं, वे इस प्रकार हैं-
आय श्रेणी – प्रति व्यक्ति GNI सीमा- शामिल प्रमुख देश
निम्न आय (Low-Income)- $1,175 या उससे कम- अफगानिस्तान, बुरुंडी, चाड
निम्न-मध्यम आय (Lower-Middle)- $1,176 से $4,635- भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नाइजीरिया
उच्च-मध्यम आय (Upper-Middle)- $4,636 से $14,375- श्रीलंका, चीन, वियतनाम, ब्राजील, थाईलैंड
उच्च आय (High-Income)- $1,4,375 से अधिक- अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी
इस वर्ष श्रीलंका के साथ-साथ वियतनाम, फिलीपींस और जॉर्डन को भी लोअर-मिडिल से अपग्रेड कर अपर-मिडिल इनकम श्रेणी में डाला गया है।

भारत के लोअर-मिडिल श्रेणी में रहने के लाभ

विश्व बैंक की इस रिपोर्ट को भारतीय अर्थव्यवस्था की ‘नाकामी’ के रूप में देखना पूरी तरह से गलत होगा। वास्तव में, इस वर्गीकरण के अपने नफा-नुकसान हैं। जब कोई देश निम्न-मध्यम आय श्रेणी में रहता है, तो उसे विश्व बैंक की वैश्विक संस्थाओं जैसे आईबीआरडी (IBRD) और आईडीए (IDA) से सस्ते ब्याज दरों पर कर्ज (Concessional Financing) और अंतरराष्ट्रीय विकास सहायता आसानी से मिलती है। जैसे ही कोई देश ‘अपर-मिडिल’ में जाता है, उसे मिलने वाली रियायतें और कम ब्याज वाले अंतरराष्ट्रीय लोन बंद या सीमित हो जाते हैं। श्रीलंका के सामने अब यह एक नई चुनौती होगी कि वह महंगी दरों पर वैश्विक बाजार से पूंजी कैसे जुटाता है।

भारत कब तक पहुंचेगा ‘अपर-मिडिल’ श्रेणी में?

SBI Research और नीति आयोग के विभिन्न आर्थिक मॉडलों के अनुमानों के अनुसार, भारत अपनी मौजूदा 6.5 से 7 प्रतिशत की निरंतर जीडीपी वृद्धि दर के दम पर साल 2030 तक अपर-मिडिल इनकम अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पार कर सकता है। इसके लिए भारत की प्रति व्यक्ति आय को मौजूदा स्तर से बढ़ाकर $4,636 से ऊपर ले जाना होगा, जो कि विनिर्माण क्षेत्र (Make in India) के विस्तार, रोजगार के नए अवसरों के सृजन और कृषि उत्पादकता में वृद्धि के बिना संभव नहीं होगा।

दक्षिण एशिया का बदलता भू-राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य

दक्षिण एशियाई क्षेत्र में पिछले तीन दशकों में बड़ा आर्थिक बदलाव आया है। 1987 में जहां इस क्षेत्र के शत-प्रतिशत देश ‘निम्न आय’ (Poverty Level) समूह में थे, वहीं आज मालदीव और श्रीलंका जैसे देश उच्च-मध्यम श्रेणी का हिस्सा हैं। भारत और बांग्लादेश तेजी से मध्यम आय के शीर्ष की ओर बढ़ रहे हैं। भारत के लिए श्रीलंका का यह सुधार एक रणनीतिक राहत भी है। भारत ने अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी पहले) नीति के तहत 2022 के संकट के समय श्रीलंका को लगभग 4 अरब डॉलर की ऋण सहायता, ईंधन और मानवीय मदद भेजी थी। श्रीलंका का आर्थिक रूप से मजबूत होना भारत के अपने व्यापार, सुरक्षा और समुद्री कॉरिडोर के लिहाज से भी एक बेहद सकारात्मक संकेत है।

श्रीलंका की सफलता से सीख

विश्व बैंक की यह ताजा रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि आर्थिक विकास का मतलब केवल बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां या ऊंची जीडीपी विकास दर नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध इस बात से है कि देश का आम नागरिक औसतन सालाना कितना कमा रहा है। श्रीलंका ने आबादी का लाभ उठाते हुए और त्वरित सुधार लागू कर अपनी खोई हुई साख वापस पा ली है। वहीं भारत अपनी विशाल जनसंख्या के कारण क्रमिक (Gradual) लेकिन बेहद ठोस और स्थिर प्रगति की राह पर है, जो आने वाले दशकों में उसे एक ‘विकसित राष्ट्र’ की श्रेणी की ओर ले जाएगी।

वर्ल्ड बैंक की भूमिका

वर्ल्ड बैंक के द्वारा निर्धारित श्रेणियाँ वैश्विक वित्तीय नीतियों और सहयोग को समझने में मदद करती हैं। यह विभिन्न देशों की आर्थिक स्थिति का आकलन करने का एक प्रभावशाली तरीका है। भारत को इन आंकड़ों का सही उपयोग कर अपनी नीतियों को इसी दिशा में विकसित करना चाहिए।

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