सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: DNA टेस्ट में पिता साबित न होने पर बच्चे के लिए भरण-पोषण की याचिका खारिज

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है। जिसमें मां द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा गया है कि यदि व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे भरण-पोषण देने का निर्देश नहीं दिया जा सकेगा। कोर्ट ने इस फैसले में यह भी बताया कि बच्चे का जन्म वैवाहिक स्थिति में हुआ था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पिता के रूप में जिम्मेदारी निभाई जाए।

पितृत्व निर्धारण के लिए किया गया DNA टेस्ट

इस मामले में बच्चों के भरण-पोषण की मांग को लेकर मां ने घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 के तहत याचिका दायर की थी। घटक पक्ष के पिता ने पितृत्व का निर्धारण करने के लिए डीएनए टेस्ट की मांग की। मजिस्ट्रेट ने इस पर सहमति दी और टेस्ट के परिणाम से स्पष्ट हुआ कि प्रतिवादी बच्चे का जैविक पिता नहीं है। इस आधार पर अदालत ने भरण-पोषण की मांग को खारिज किया।

दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय बरकरार

दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में ब्रेकिंग न्यूज की तरह फैसला लेते हुए कहा कि बच्चे के लिए अंतरिम भरण-पोषण का दायर किया गया दावा खारिज किया जाता है। यह स्पष्ट होने के बाद कि पिता कोई और हैं, कोर्ट ने पहले के आदेश को भी बिना किसी बदलाव के बरकरार रखा। इस दौरान अदालत ने चिंता जताई कि ऐसे मामलों का बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सरकार को दिए गए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि दिल्ली सरकार का महिला एवं बाल विकास विभाग बच्चे की स्थिति की जांच करे। इस जांच के लिए एक अधिकारी को बच्चे के घर भेजकर उसकी पढ़ाई, भोजन, स्वास्थ्य और जीवन की बुनियादी जरूरतों की उपलब्धता का आकलन करने के लिए कहा गया है। यदि कोई कमी पाई जाती है तो तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने का आदेश भी दिया गया है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम पर विचार

इस केस में, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 पर भी विचार किया। इस धारा के तहत यह माना जाता है कि शादी के दौरान जन्मा बच्चा वैध होता है जब तक कि यह साबित न हो कि पति और पत्नी के बीच नॉन-एक्सेस था। कोर्ट ने बेबुनियाद आरोपों से बचने के लिए इस पहलू को महत्वपूर्ण माना।

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