20 साल का इंतजार खत्म होने की उम्मीद! दृष्टिबाधित लोगों के सोसायटी को मिलेगा अपना आशियाना

The CSR Journal Magazine
मालाड-मालवणी क्रमांक 8 स्थित दृष्टिबाधित व्यक्तियों की सोसायटी के पुनर्वास का करीब दो दशक पुराना मामला अब समाधान की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है। MHADA Vice President and CEO Sanjeev Jaiswal ने सोसायटी के पदाधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा कर पुनर्वास में आ रही प्रमुख अड़चन को दूर करने के लिए तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। बैठक में सामने आया कि पुराने Development Control Regulations के तहत लगाए गए Rehabilitation & Resettlement (R&R) Reservation के कारण भूखंड का विकास लंबे समय से अटका हुआ था। इस आरक्षण के चलते जमीन पर प्रस्तावित विकास और पुनर्वास की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही थी।

Rehabilitation & Resettlement आरक्षण बना था बड़ी बाधा

अब MHADA की ओर से इस आरक्षण को हटाने की दिशा में तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। इससे लंबे समय से अपने घर की प्रतीक्षा कर रहे दृष्टिबाधित लोगों के पुनर्वास का रास्ता साफ होने की उम्मीद जगी है। मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार महाराष्ट्र पुलिस को-ऑपरेटिव हाउसिंग फेडरेशन को भूखंड के विकास के लिए आवश्यक सहयोग देने का आश्वासन दिया गया है। इससे परियोजना को आगे बढ़ाने में आने वाली प्रशासनिक और नियामकीय अड़चनों को दूर करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

दो दशक से आशियाने का इंतजार

मालाड-मालवणी की इस सोसायटी से जुड़े दृष्टिबाधित लोग लंबे समय से अपने पुनर्वास और स्थायी आवास की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वर्षों तक मामला अलग-अलग प्रक्रियाओं और आरक्षण की अड़चनों में उलझा रहा। अब MHADA की ओर से समस्या की जड़ तक पहुंचकर कार्रवाई के निर्देश दिए जाने से लाभार्थियों में उम्मीद बढ़ी है।

विकास का रास्ता खुलने की उम्मीद

इस पहल को केवल एक जमीन के विकास से जुड़ा फैसला नहीं, बल्कि लंबे समय से इंतजार कर रहे दृष्टिबाधित नागरिकों के लिए Housing Rehabilitation की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि R&R Reservation हटाने की प्रक्रिया तय नियमों के तहत पूरी होती है, तो भूखंड के विकास और पुनर्वास परियोजना को गति मिल सकती है। संजीव जायसवाल की पहल से अब उन परिवारों को अपने घर का सपना पूरा होने की उम्मीद है, जो करीब 20 वर्षों से पुनर्वास की राह देख रहे हैं।
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