अल नीनो प्रभाव: मॉनसूनी संकट पर एक्शन: जानिए क्या है सरकार का ‘कंटीजेंसी प्लान’ और क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप
इस साल मॉनसून की कमजोरी के चलते सरकार ने एक विशेष क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप का गठन किया है। यह कदम केंद्र सरकार द्वारा कम बारिश की स्थिति में फसलों को बचाने और किसानों को राहत देने के लिए उठाया गया है। भारतीय कृषि मंत्रालय ने देश के कृषि संकट से निपटने के लिए एक विशेष क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप (Crisis Management Group) का गठन किया है और देश के 240 संवेदनशील जिलों के लिए एक विशेष कंटीजेंसी प्लान (आकस्मिक योजना) तैयार किया है।
240 जिलों के लिए तैयार किया गया कंटीजेंसी प्लान
सूखे की स्थिति से निपटने के लिए 240 से अधिक जिलों के लिए एक कंटीजेंसी प्लान तैयार किया गया है। विशेष क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप मौसम की स्थिति, बुवाई, बीजों की उपलब्धता और जलाशयों के जलस्तर पर नजर रखेगा। इस कदम से सरकार सूखे की संभावित स्थिति से निपटने में सक्षम होगी। यह योजना किसानों को संभावित संकटों से बचाने के उद्देश्य से बनाई गई है। सभी जिले अपने-अपने स्तर पर इस योजना को लागू करेंगे।
कंटीजेंसी प्लान की मुख्य विशेषताएं
इस प्लान के तहत कम पानी में उगने वाली फसलों (जैसे मोटे अनाज, दालें और तिलहन) के बीजों की व्यवस्था, ऐसी फसलों को बढ़ावा देना जो कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं, उपलब्ध पानी का सही इस्तेमाल करने के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पर ज़ोर और ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई के लिए बिजली की आपूर्ति को प्राथमिकता देना है।
वैकल्पिक फसलें (Alternative Crops)
कमजोर मॉनसून की स्थिति में पारंपरिक और अधिक पानी चाहने वाली फसलों (जैसे धान) को बचाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए, सरकार का मुख्य ध्यान ऐसी वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने पर है जो कम पानी या सूखे जैसी स्थिति में भी बेहतर उत्पादन दे सकें। इसके तहत मोटे अनाज (जैसे बाजरा, ज्वार, रागी), दलहन (अरहर, मूंग, उड़द) और तिलहन की खेती को प्राथमिकता दी जा रही है। इन फसलों के प्रमाणित बीजों को किसानों तक समय पर पहुँचाने के लिए सरकार ने विशेष बीज बैंकों और सब्सिडी की व्यवस्था की है।
कम अवधि की किस्में (Short-Duration Varieties)
देरी से आने वाले या कमजोर मॉनसून के कारण बुआई का कीमती समय निकल जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई कम अवधि वाली फसलों (Short-Duration Varieties) के बीजों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ये फसलें सामान्य किस्मों की तुलना में बहुत कम दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। इससे न केवल फसल चक्र प्रभावित होने से बच जाता है, बल्कि किसान कम समय में अपनी पैदावार लेकर अगली फसल के लिए खेत तैयार कर सकते हैं।
सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)
कम बारिश के दौरान उपलब्ध जल संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। कंटीजेंसी प्लान के तहत पारंपरिक सिंचाई (जैसे बाढ़ सिंचाई) के बजाय आधुनिक तकनीकों पर पूरा ज़ोर दिया जा रहा है। इसके लिए ड्रिप (टपक सिंचाई) और स्प्रिंकलर (फव्वारा सिंचाई) प्रणालियों के उपयोग को अनिवार्य रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। यह तकनीक पानी की हर एक बूँद का सीधा इस्तेमाल पौधों की जड़ों तक करती है, जिससे पानी की बर्बादी रुकती है और सीमित पानी में भी पूरी फसल को जीवित रखा जा सकता है।
फीडर पावर सप्लाई (Feeder Power Supply)
सूखे की स्थिति में फसलों को बचाने के लिए ट्यूबवेल और पंपिंग सेट ही सिंचाई का एकमात्र सहारा बचते हैं। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की निर्बाध और पर्याप्त आपूर्ति सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। सरकार ने बिजली विभागों के साथ मिलकर ग्रामीण कृषि फीडरों को प्राथमिकता के आधार पर बिजली देने की योजना बनाई है। इसके तहत सिंचाई के मुख्य समय के दौरान ग्रामीण इलाकों में विशेष रूप से बिजली की सप्लाई बढ़ाई जाएगी ताकि किसान बिना किसी रुकावट के अपने खेतों की सिंचाई कर सकें।
मजबूत सूचना प्रणाली, जलाशयों की निगरानी
किसानों को समय-समय पर मॉनसून की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सरकार एक सूचना प्रणाली मजबूत कर रही है। इस प्रणाली के माध्यम से किसान मौसम की जानकारी प्राप्त करके अपनी फसल कैसे संभालें, इस पर निर्णय ले सकेंगे। जानकारी के अभाव में किसान संकट का सामना कर सकते हैं, इसलिए यह पहल अहम है।सरकार जलाशयों के जलस्तर की नियमित निगरानी भी करेगी। अगर जलाशयों का जल स्तर कम होता है, तो इससे सिंचाई में समस्या आ सकती है। इसके लिए योजना बनाकर उचित कदम उठाए जाएंगे।
कोऑपरेटिव सेक्टर का सहयोग
सरकार ने कोऑपरेटिव सेक्टर से भी मदद की अपील की है। यह महत्वपूर्ण है कि सभी संबंधित पक्ष एक साथ मिलकर काम करें ताकि किसानों को जरूरत पड़ने पर तेजी से सहायता मिल सके। इसमें मुख्य रूप से वे जिले शामिल किए गए हैं जहाँ ऐतिहासिक रूप से कम बारिश होती है या जहाँ सिंचाई के साधन सीमित हैं।उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के वर्षा-आधारित कृषि वाले क्षेत्र इस सूची में प्रमुखता से शामिल हैं।
दूरदर्शिता से ही मिलेगी राहत
सरकार का यह प्रयास कर रहा है कि भविष्य में संभावित सूखे और कमजोर मॉनसून के प्रभावों को एकत्रित योजना से रोका जा सके। सभी स्तरों पर सक्रियता और सहयोग से, किसानों को अधिकतम सुरक्षा मिल सकेगी। यह कदम उस दिशा में एक बड़ा प्रयास है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!