नेपाल पहुंची उत्तराखंड की ट्राउट मछली; किसानों को मिला लाखों का मुनाफा

The CSR Journal Magazine

उत्तराखंड की ट्राउट मछलियों की 5 टन की खेप नेपाल पहुंची, किसानों में खुशी का माहौल

उत्तराखंड के मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए यह वाकई एक ऐतिहासिक और गर्व का क्षण है। राज्य गठन के बाद पहली बार 5 मीट्रिक टन रेनबो ट्राउट (Rainbow Trout) मछली की खेप सफलतापूर्वक नेपाल के अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच चुकी है।

पहली बार इंटरनेशनल मार्केट में पहुंची मछली

उत्तराखंड के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उत्तराखंड बनने के बाद पहली बार यहां पैदा हुई ट्राउट मछलियों का एक बड़ा खेप नेपाल में भेजा गया है। पिथौरागढ़ की तीन कोऑपरेटिव सोसायटियों ने राज्य सरकार के सहयोग से पांच मीट्रिक टन मछली का निर्यात किया। यह मछली एक नई पहचान बनाने के लिए काफी हद तक तैयार है।

किसानों की तकदीर बदलने वाला अवसर

इस निर्यात से किसानों में खुशी का माहौल है। स्थानीय किसानों को उम्मीद है कि इससे उनकी आय में वृद्धि होगी और वे आर्थिक रूप से सशक्त बनेंगे। मछली की डिमांड बढ़ने से खेती में एक नया मोड़ आ रहा है। उन्होंने बताया कि यह व्यापार उन्हें न केवल आजीविका का साधन देगा, बल्कि उनकी खेती के लिए भी एक सकारात्मक बदलाव लाएगा।

कहां तैयार हुई यह खेप?

यह प्रीमियम मछली उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के अत्यंत दुर्गम धारचूला और मुनस्यारी क्षेत्रों में तैयार की गई थी। इसे वहां की तीन स्थानीय मत्स्यजीवी सहकारी समितियों के माध्यम से उत्पादित किया गया।

किसानों को सीधा मुनाफा

इस पहली खेप के निर्यात से क्षेत्र के 33 स्थानीय मत्स्य पालकों को लगभग ₹23.50 लाख की सीधी आय हुई है। राज्य के मत्स्य विकास मंत्री सौरभ बहुगुणा के अनुसार, मत्स्य विभाग ने इस पहले कदम को बढ़ावा देने के लिए हार्वेस्टिंग, पैकेजिंग और ट्रांसपोर्टेशन के लिए ₹5.40 लाख की वित्तीय सहायता भी प्रदान की।

नेपाल का सफर

पहाड़ी इलाकों से मछलियों को सुरक्षित रखने के लिए एक कड़े ‘कोल्ड-चेन’ सिस्टम का इस्तेमाल किया गया। इन मछलियों को पहले प्रोसेसिंग (प्रसंस्करण) के लिए गुजरात के वेरावल भेजा गया, जिसके बाद 23 जून को इसे नेपाल के बाजार में डिलीवर किया गया।

राज्य सरकार का सहयोग

इस निर्यात के पीछे राज्य सरकार का महत्वपूर्ण सहयोग है। सरकार ने इन कोऑपरेटिव सोसायटियों को तकनीकी सहायता और मार्केटिंग में मदद की। यह सहायता मछली उत्पादन को बढ़ावा देने और किसानों की आय को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रही है। इसके फलस्वरूप, अब पहाड़ी इलाकों में मछली पालन का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है।

मछली पालन की नई विधियाँ

फिश फार्मिंग के क्षेत्र में नई तकनीकें भी अपनाई जा रही हैं। रेस्क्यू और हाइड्रोपोनिक्स जैसी विधियाँ अब उत्तराखंड के किसानों द्वारा इस्तेमाल की जा रही हैं। इन तकनीकों ने उत्पादन में वृद्धि की है और मछली की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाया है।

युवाओं के लिए रोजगार के अवसर

इस पनपते उद्योग के कारण स्थानीय युवाओं के लिए भी रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। कई युवा इस क्षेत्र में शामिल हो रहे हैं और ट्राउट मछलियों के पालन का प्रशिक्षण ले रहे हैं। इससे न केवल उनकी जीवनशैली में सुधार होगा, बल्कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा।

नेपाल से बेहतर कारोबार की संभावना

नेपाल के साथ व्यापार में बढ़ती दिलचस्पी से व्यापार के नए दरवाजे खुल रहे हैं। उत्तराखंड की ट्राउट मछली की गुणवत्ता ने नेपाल में काफी प्रशंसा हासिल की है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में मजबूती आएगी और अन्य उत्पादों के निर्यात के लिए भी रास्ते खुलेंगे। मत्स्य पालन के क्षेत्र में यह कदम उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ‘लोकल टू ग्लोबल‘ विजन को एक नई उड़ान देने वाला है।

30 टन का नया ऑर्डर

नेपाल में इस मछली की भारी मांग को देखते हुए उत्तराखंड को आने वाले महीनों के लिए 30 मीट्रिक टन का एक और बड़ा ऑर्डर मिलने जा रहा है। दुबई में आयोजित गल्फ फूड एक्सपो में बने संपर्कों के बाद, अब सरकार ट्राउट मछली को यूरोप, खाड़ी देशों (Middle East) और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों तक पहुंचाने की तैयारी कर रही है। राज्य में चलाई जा रही मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना और नवीन ट्राउट प्रोत्साहन योजना पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के लिए गेम-चेंजर साबित हो रही हैं।

स्थानीय अर्थव्यवस्था की नई दिशा

इस सफल निर्यात के बाद, अपेक्षा की जा रही है कि किसान और अधिक मछलियों की खेप तैयार करेंगे। प्रदेश के अधिक से अधिक किसान इस उद्योग की ओर आकर्षित होंगे, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को संजीवनी मिलेगी। ऐसे में, उत्तराखंड की मछली उत्पादकता की कहानी अब सिर्फ पहाड़ी राज्य तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपने परचम लहराएगी।

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