सतलुज बनाम माचिस-पंजाब में उग्रवाद के जन्म और कट्टरपंथ का Metaphor

The CSR Journal Magazine

पंजाब आतंकवाद की त्रासदी गायब : ‘सतलुज’ की इमोशनल कहानी पर उठे सवाल

किसी भी ऐतिहासिक मुद्दे को पूरी तरह समझने के लिए उसके मूल कारणों (Root Causes) को जानना बेहद जरूरी होता है। हनी त्रेहान निर्देशित फिल्म ‘सतलुज’ (पूर्व नाम: ‘पंजाब 95’) को लेकर फिल्म समीक्षकों और दर्शकों के बीच ठीक यही बहस चल रही है।इस विषय को संतुलित दृष्टिकोण से देखने के लिए दोनों पक्षों को समझना आवश्यक है।

सतलुज का मुद्दा

फिल्म ‘सतलुज’ में दलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा की भूमिका निभाई है, जो एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। यह फिल्म एक मुश्किल विषय को छूती है, लेकिन क्या यह पंजाब की समस्याओं को सही तरीके से उजागर कर पाती है? हनी त्रेहान की इस फिल्म में सिर्फ भावनाओं को उकेरा गया है, जबकि पंजाब में आतंकवाद कैसे फैला, इसका संदर्भ गायब है। जब 1996 में गुलजार की फिल्म ‘माचिस’ आई, तो वह न सिर्फ समाज के सवालों को उठाती है, बल्कि उसके आधार पर दर्शकों को सोचने पर मजबूर भी करती है।

भावनाओं की प्रस्तुति

‘सतलुज’ में भावनाओं को कड़ाई से चित्रित किया गया है, लेकिन यह कहानी के मूल तथ्यों को नजरअंदाज करती है। फिल्म में सिखों के प्रति पुलिस की क्रूरता को दिखाया गया है, लेकिन क्या इसके साथ-साथ उन कारणों की चर्चा भी होनी चाहिए थी, जिनकी वजह से यह स्थिति बनी? विषय की गहराई को समझे बिना केवल इमोशनल ब्लैकमेल करना एक बड़ा प्रश्न है। इस तरह की प्रस्तुति से निश्चित रूप से समाज में और भी कड़वाहट बढ़ती है।

ऐतिहासिक संतुलन की कमी का आरोप

समीक्षकों का मानना है कि फिल्म मुख्य रूप से 1990 के दशक में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के संघर्ष, लापता लोगों और पुलिस की न्यायेतर कार्रवाइयों पर केंद्रित है। यह उस मानवीय दर्द और संवेदनाओं को तो गहराई से उकेरित करती है, लेकिन इस बात को पृष्ठभूमि में छोड़ देती है कि पंजाब में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और उग्रवाद की शुरुआत कैसे हुई।

सच्चाई का दूसरा पहलू

यह तर्क भी मजबूत है कि उस दौर में पंजाब पुलिस और सुरक्षा बल एक बेहद कठिन छद्म युद्ध (Proxy War) और आतंकवाद से निपट रहे थे, जहां कई पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों को भी निशाना बनाया गया था। फिल्म में आतंकवाद के इस क्रूर चेहरे और उसके पनपने के कारणों को प्रमुखता न मिलने से इतिहास का केवल एक ही पक्ष सामने आ पाता है।

निर्देशक का पक्ष और सिनेमा की सीमाएं

निर्देशक हनी त्रेहान का कहना है कि यह फिल्म पूरे पंजाब के उग्रवाद के इतिहास पर बनाई गई कोई विस्तृत डॉक्यूमेंट्री नहीं है। यह विशुद्ध रूप से जसवंत सिंह खालरा की एक बायोग्राफी (जीवनी) है, जो उनके व्यक्तिगत जीवन, बैंक रिकॉर्ड्स और उनके मानवाधिकारों की लड़ाई के इर्द-गिर्द बुनी गई है। निर्माताओं के अनुसार, उन्होंने फिल्म को किसी राजनीतिक विवाद या अलगाववादी आंदोलन (जैसे खालिस्तान) का हिस्सा बनाने के बजाय केवल मानवीय संवेदनाओं और न्याय की लड़ाई तक सीमित रखने का सचेत प्रयास किया था।

हनी त्रेहान की सतलुज बनाम गुलजार की माचिस

गुलज़ार की कालजयी फिल्म ‘माचिस’ (1996) और हनी त्रेहान की ‘सतलुज’ (2026) दोनों ही पंजाब के काले दौर पर बात करती हैं, लेकिन दोनों का कैनवास और दृष्टिकोण बिल्कुल अलग है। जहां ‘सतलुज’ एक बायोग्राफी के रूप में मानवाधिकारों और न्याय की लड़ाई के केवल एक विशेष हिस्से को छूती है, वहीं ‘माचिस’ पंजाब की उस पूरी ‘त्रसदी की जड़ों’ तक ले जाती है। इन दोनों फिल्मों के बीच के मुख्य अंतर और ‘माचिस’ की गहराई को कुछ बिंदुओं से समझा जा सकता है।

‘माचिस’ क्यों आतंकवाद की जड़ों तक जाती है? निर्दोषों का कट्टरपंथ की ओर झुकाव

‘माचिस’ किसी जन्मजात अपराधी की कहानी नहीं है। गुलज़ार साहब ने बहुत ही बारीकी से दिखाया कि कैसे व्यवस्था की कमियां, पुलिसिया प्रताड़ना और राजनीतिक विफलताएं एक आम, हॉकी खेलने वाले सीधे-सादे लड़के (कृपाल सिंह उर्फ पाली) को उग्रवाद के रास्ते पर धकेल देती हैं।

‘माचिस’ का Metaphor

फिल्म का नाम ही अपने आप में एक बड़ा संदेश था। गुलज़ार का मानना था कि देश की युवा पीढ़ी माचिस की तीलियों की तरह होती है। अगर उनके साथ अन्याय होगा, तो वे आसानी से सुलग उठेंगी। फिल्म आतंकवाद के पनपने के पीछे के इसी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सच को उजागर करती है। ‘माचिस’ में कोई साफ ‘हीरो’ या ‘विलेन’ नहीं है। यह फिल्म पीड़ित और शोषक के बीच की धुंधली रेखा को दिखाती है, जहां सनातन (ओम पुरी) जैसे पात्रों के माध्यम से उग्रवादियों की विचारधारा और उनके भीतर की कड़वाहट को भी बिना किसी हिचकिचाहट के सामने रखा गया।

‘सतलुज’ और ‘माचिस’ में वैचारिक अंतर-शांति बनाम हथियार

‘सतलुज’ की कहानी जसवंत सिंह खालरा के शांतिपूर्ण और कानूनी संघर्ष पर आधारित है, जो व्यवस्था के भीतर रहकर न्याय ढूंढते हैं और अंततः खुद गायब कर दिए जाते हैं। इसके विपरीत, ‘माचिस’ की शुरुआत भी एक निर्दोष की गिरफ्तारी से होती है, लेकिन वहां न्याय की तलाश मुख्य किरदार को हथियार उठाने और उग्रवाद की ओर ले जाती है। ‘सतलुज’ का दायरा एक व्यक्ति विशेष की लड़ाई और मानवीय संवेदनाओं तक सिमटा हुआ है। वहीं, ‘माचिस’ उस दौर की पूरी राजनीतिक व्यवस्था, ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद की नाराजगी और भटके हुए युवाओं के पूरे तंत्र (अंडरग्राउंड सेल्स) को समग्रता में दिखाती है। गुलज़ार की ‘माचिस’ वाकई इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सिनेमा कैसे बिना किसी डर के इतिहास के एक बेहद जटिल और कड़वे सच का निष्पक्ष विश्लेषण कर सकता है।

परदे के पीछे की कहानी

पंजाब में 1980 और 1990 के दशक में पनपे उग्रवाद के पीछे कोई एक तात्कालिक कारण नहीं था। इसके पीछे राजनीतिक अवसरवादिता, सामाजिक-आर्थिक असंतोष और धार्मिक ध्रुवीकरण का एक बेहद जटिल ताना-बाना था, जिसने ‘माचिस’ की तीलियों को सुलगने का बारूद दिया।

अकालियों और कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता

1966 में भाषाई आधार पर नए पंजाब के गठन के बाद राज्य की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल एक मजबूत ताकत बनकर उभरा। केंद्र में तत्कालीन कांग्रेस सरकार पंजाब की क्षेत्रीय राजनीति पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहती थी। अकालियों को कमजोर करने के लिए कांग्रेस के कुछ धड़ों ने शुरू में जरनैल सिंह भिंडरांवाले जैसे कट्टरपंथी धार्मिक प्रचारक को राजनीतिक शह दी, जो बाद में भस्मासुर साबित हुआ।

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973)

अकाली दल ने केंद्र सरकार से पंजाब के लिए अधिक स्वायत्तता (Autonomy), चंडीगढ़ को पूरी तरह पंजाब को सौंपने और नदियों के पानी के न्यायसंगत बंटवारे जैसी मांगें रखीं। केंद्र सरकार द्वारा इन मांगों को लगातार नजरअंदाज करने से पंजाब के लोगों में यह भावना घर कर गई कि दिल्ली उनके साथ सौतेला व्यवहार कर रही है।

लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का विफल होना

1980 के दशक में अकालियों ने अपनी मांगों के लिए ‘धर्म युद्ध मोर्चा’ शुरू किया। आंदोलन के हिंसक होने पर निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त कर बार-बार राष्ट्रपति शासन थोपा गया, जिससे युवा पीढ़ी का लोकतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा उठ गया।

हरित क्रांति के अनपेक्षित परिणाम

1960 के दशक की हरित क्रांति (Green Revolution) ने पंजाब को समृद्ध तो बनाया, लेकिन 1980 के दशक तक आते-आते इसके सामाजिक नुकसान दिखने लगे। बड़े जमींदार और अमीर हो गए, जबकि छोटे किसान कर्ज के जाल में फंस गए। खेती के मशीनीकरण के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ी।

शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी

हरित क्रांति से आई संपन्नता के कारण पंजाब के युवाओं ने उच्च शिक्षा तो हासिल कर ली, लेकिन राज्य में औद्योगिकीकरण (Industrialization) न होने के कारण उनके पास नौकरियां नहीं थीं। यह दिशाहीन और निराश युवा वर्ग उग्रवादी संगठनों के लिए सबसे आसान शिकार (Recruits) बन गया।

सांस्कृतिक असुरक्षा की भावना

पश्चिमी प्रभाव, आधुनिकता और प्रवासियों के आगमन के कारण रूढ़िवादी सिख समाज को लगा कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान (सिख मर्यादा) खतरे में है। भिंडरांवाले ने युवाओं की इसी सांस्कृतिक असुरक्षा को भुनाया और उन्हें ‘शुद्ध धार्मिक पहचान’ की ओर मोड़ा।

ऑपरेशन ब्लू स्टार (जून 1984)

स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारों के साथ डेरा डाले उग्रवादियों को निकालने के लिए सेना की इस कार्रवाई ने आम सिखों की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई। अकाल तख्त का क्षतिग्रस्त होना सिख समुदाय के लिए एक गहरा मानसिक आघात था, जिसने तटस्थ सिखों को भी व्यवस्था के खिलाफ कर दिया।

नवंबर 1984 के सिख विरोधी दंगे

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में हजारों निर्दोष सिखों का कत्लेआम हुआ। इस हिंसा में शामिल राजनीतिक अपराधियों को सजा न मिलने से न्याय व्यवस्था पूरी तरह बेनकाब हो गई। इसने पंजाब के युवाओं को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि भारत में वे सुरक्षित नहीं हैं, जिसके बाद उग्रवाद चरम पर पहुंच गया।

पाकिस्तान की बाहरी दखलअंदाजी

पंजाब के इस आंतरिक असंतोष का फायदा उठाते हुए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (ISI) ने सीमा पार से हथियारों, ट्रेनिंग और पैसों की बाढ़ ला दी। इससे स्थानीय असंतोष एक सुनियोजित ‘छद्म युद्ध’ में बदल गया। यही वे ज़मीनी हालात थे जिन्हें गुलज़ार ने ‘माचिस की तीलियाँ’ कहा था—बारूद पहले से बिछा हुआ था, राजनीतिक विफलता और व्यवस्था के अन्याय ने उसमें चिंगारी का काम किया।

राजनीतिक भूचाल

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और उसके परिणामस्वरूप सिखों के खिलाफ हिंसा ने सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह प्रभावित किया। यह सब नौजवानों के जीवन और भविष्य को भी बुरी तरह प्रभावित करता है। ‘सतलुज’ में क्रूरता को दर्शाया गया है, लेकिन क्या यह अकेला ही समस्या का समाधान है? पंजाब के लिए यह समय किसी ठोस राजनीतिक संवाद और सुधार का है।

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