इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक त्रासदी: पाकिस्तान में अमीर-गरीब के बीच की खाई 27 साल के रिकॉर्ड स्तर पर

The CSR Journal Magazine

पाकिस्तान में भुखमरी और बेबसी: 6 साल में 2.7 करोड़ नए लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेले गए

पाकिस्तान आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल गरीबों की संख्या बढ़कर लगभग 7 करोड़ (70 मिलियन) हो गई है। वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगज़ेब द्वारा पेश की गई इस रिपोर्ट में सामने आया है कि पिछले छह वर्षों में 2.7 करोड़ नए लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं, जिससे पाकिस्तान में गंभीर आर्थिक संकट और कंगाली का सच खुलकर दुनिया के सामने आ गया है। पाकिस्तान में संघीय बजट पेश होने से पहले, गुरुवार को आर्थिक सर्वे 2025-26 को लॉन्च किया गया। यह सर्वे हर साल किया जाता है, जिसका लक्ष्य देश के आर्थिक हालात को जनता और संसद के समक्ष लाना होता है। लेकिन इस बार के सर्वे ने पाकिस्तान की जिंदगी की कठिनाइयों को स्पष्टता से उजागर किया है।

पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की खौफनाक तस्वीर

पाकिस्तान के योजना और विकास मंत्रालय द्वारा जारी किए गए पाकिस्तान आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के आधिकारिक आंकड़ों ने देश की अर्थव्यवस्था के ढहते बुनियादी ढांचे और गहरे सामाजिक संकट की एक खौफनाक तस्वीर पेश की है। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, पिछले छह वर्षों में निरंतर आर्थिक कुप्रबंधन, महंगाई और विनाशकारी आपदाओं के चलते पाकिस्तान की राष्ट्रीय गरीबी दर 21.9% से बढ़कर 28.9% (लगभग 29%) पर पहुंच गई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पाकिस्तान में कुल गरीबों की संख्या अब करीब 7 करोड़ (70 मिलियन) हो चुकी है, जिसमें से 2.7 करोड़ लोग पिछले छह साल के भीतर गरीबी रेखा के नीचे धकेले गए हैं।यह आंकड़ा देश के इतिहास में पिछले 11 वर्षों का सबसे उच्चतम स्तर है, जो यह स्पष्ट करता है कि पाकिस्तान की एक-तिहाई आबादी बुनियादी जरूरतों भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए पूरी तरह तरस रही है।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बढ़ती खाई

सर्वेक्षण के आंकड़े दर्शाते हैं कि आर्थिक मंदी की सबसे गहरी मार ग्रामीण इलाकों पर पड़ी है। ग्रामीण पाकिस्तान में गरीबी की दर 28.2% से बढ़कर 36.2% हो गई है, जिसका सीधा कारण कृषि क्षेत्र का कमजोर होना और ग्रामीण रोजगारों का खत्म होना है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में भी स्थिति चिंताजनक है। शहरों में गरीबी दर 11% से छलांग लगाकर 17.4% पर पहुंच चुकी है। पूंजी के असमान वितरण और वास्तविक आय में भारी गिरावट के कारण देश में आर्थिक असमानता (Gini Coefficient) 28.4 से बढ़कर 32.7 के स्तर पर पहुंच गई है, जो पिछले 27 वर्षों में सबसे अधिक है। रिपोर्ट यह साफ उजागर करती है कि जहां देश का आम नागरिक दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं अमीर और गरीब के बीच की खाई लगातार चौड़ी हो रही है।

बलूचिस्तान सबसे बदहाल

पाकिस्तान के चारों प्रमुख प्रांतों में गरीबी के अलग-अलग स्तर देखे गए हैं, लेकिन कोई भी सूबा इस मार से अछूता नहीं रहा है। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद बलूचिस्तान देश का सबसे उपेक्षित और बदहाल इलाका बना हुआ है। यहां गरीबी दर 41.8% से बढ़कर 47% हो गई है, यानी यहां की करीब आधी आबादी घोर कंगाली में जीवन यापन कर रही है। आतंकवाद और अस्थिरता से प्रभावित खैबर पख्तूनख्वा (KP) में गरीबी का ग्राफ 28.7% से बढ़कर 35.3% हो गया है। सिंध प्रांत में गरीबी दर बढ़कर 32.6% हो गई है। इसके अलावा, आय की असमानता (35.9%) के मामले में सिंध पूरे पाकिस्तान में शीर्ष पर है। औद्योगिक और कृषि रूप से मजबूत होने के कारण पंजाब 23.3% की दर के साथ इस संकट से सबसे कम प्रभावित प्रांत रहा है।

कंगाली और पतन के प्रमुख कारण

पाकिस्तान के इस गंभीर मानवीय संकट और आर्थिक पतन के पीछे कई दीर्घकालिक और तात्कालिक कारक जिम्मेदार रहे हैं-
आसमान छूती महंगाई और मुद्रा अवमूल्यन: पिछले तीन वर्षों में पाकिस्तान ने इतिहास की सबसे भयानक महंगाई का सामना किया है। डॉलर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपये के रिकॉर्ड अवमूल्यन ने आयात को बेहद महंगा कर दिया, जिससे खाने-पीने की वस्तुओं, दवाओं और ईंधन की कीमतों में आग लग गई।
IMF की कड़ी शर्तें और कड़े सुधार: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से बेलआउट पैकेज हासिल करने के लिए सरकार को कड़े नीतिगत फैसले लेने पड़े। बिजली और गैस पर मिलने वाली सब्सिडी खत्म कर दी गई और आम जनता पर भारी टैक्स थोप दिए गए, जिसने मध्यम और निम्न वर्ग की कमर तोड़ दी।
प्राकृतिक आपदाएं (2022 की बाढ़): साल 2022 में आई विनाशकारी बाढ़ ने पाकिस्तान के बुनियादी ढांचे और कृषि योग्य भूमि को भारी नुकसान पहुंचाया, जिससे $30 बिलियन से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ और लाखों ग्रामीण परिवार रातोंरात बेघर और कंगाल हो गए।
नीतियों में निरंतरता का अभाव: पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता के कारण दीर्घकालिक आर्थिक नीतियां जमीन पर नहीं उतर सकीं, जिससे विदेशी निवेश ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।

सरकार की प्रतिक्रिया

सरकारी अधिकारियों ने माना है कि यह स्थिति गंभीर है, लेकिन सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि वह जमीनी स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन करे ताकि गरीब वर्ग को राहत मिल सके। पाकिस्तान को अब आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। यथार्थवादी नीतियां और ठोस कार्ययोजनाओं की जरूरत है ताकि यह स्थिति सुधारी जा सके। इसके लिए सभी न्यूट्रल और ईमानदार कार्रवाईयों की आवश्यकता है।

छोटे और मध्यम व्यवसायों का संकट

पाकिस्तान में छोटे और मध्यम उद्यम, जो देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, अत्यधिक प्रभावित हुए हैं। इनके बंद होने से रोजगार के अवसर घट गए हैं और अव्यवस्था बढ़ी है। ऐसे में सरकार को इन व्यवसायों को समर्थन देने की जरूरत है। पाकिस्तान की आर्थिक संकट केवल आज की बात नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव भविष्य में भी देखने को मिलेगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, और विकास के क्षेत्र में ठहराव से हालात और खराब होंगे। ऐसे में आवश्यक है कि संबंधित सभी पक्ष एकजुट होकर इस समस्या का समाधान करने के प्रयास करें।

उम्मीदें बनी रहेंगी

इस आर्थिक सर्वे ने पाकिस्तान की गरीबी की सचाई को उजागर किया है। लेकिन उम्मीद की किरण इस बात में है कि यदि सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं, तो स्थिति में परिवर्तन संभव है। यही समय है जब सरकार और जनता मिलकर इस संकट का सामना कर सकते हैं। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक सरकार अपने कर दायरे को बढ़ाने, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और सार्वजनिक उपक्रमों में कड़े सुधार करने जैसे कदम नहीं उठाती, तब तक देश को इस ‘आईसीयू’ (ICU) जैसी स्थिति से बाहर निकालना असंभव होगा। केवल कागजों पर व्यापक आर्थिक स्थिरता दिखाने से जमीनी हकीकत नहीं बदलेगी; इसके लिए आम जनता के पास रोजगार के अवसर और क्रय शक्ति का होना अनिवार्य है।

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