चढ़ावा चोरी पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: भ्रष्टाचार रोकने के लिए मृत्युदंड पर विचार जरूरी

The CSR Journal Magazine
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन ने हाल ही में अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। उनका कहना है कि यह घटना समाज के भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गई है और इसे देखकर लगता है कि आम भारतीय इसका आदान-प्रदान सहजता से करने लगा है। उनके मुताबिक, यह मामला अब सब्र का बांध टूटने जैसा हो गया है।

सरकार को बदलाव की जरूरत

जस्टिस श्रीधरन ने सुझाव दिया कि सरकार को भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन करके ऐसे जघन्य अपराधों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान करना चाहिए। उनका कहना है कि अगर इस तरह के मामलों पर सख्ती नहीं बरती गई, तो आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं।

ईमानदारी का संकट

जस्टिस ने कहा कि चढ़ावा चोरी जैसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि हमारे समाज में गरीब लोगों की मेहनत को किस तरह सहजता से लूटा जा रहा है। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय ईमानदारी का सबसे निचला स्तर है। यदि ऐसे मामलों को नजरअंदाज किया गया तो यह व्यवस्थित भ्रष्टाचार को और प्रोत्साहित करेगा।

ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट

उन्होंने जिक्र किया कि ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 182 देशों में 91वें पायदान पर है। यह स्थिति किसी भी भारतीय के लिए शर्मिंदगी की बात होनी चाहिए, लेकिन अफसोस है कि अधिकांश लोग इसे सामान्य मानते हैं।

बुलडोजर न्याय पर टिप्पणियां

जस्टिस श्रीधरन ने अपनी 51 पेज की खंडित राय में बुलडोजर न्याय पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि किसी अपराध के तुरंत बाद मकान ध्वस्त करना वास्तविकता से आंखें मूंदने के समान है। यह सिर्फ समाज की खून की प्यास को शांत करने का तरीका है, लेकिन इससे किसी भी समस्या का समाधान नहीं होगा।

अनधिकृत निर्माण की समस्या

उन्होंने यह भी कहा कि अनधिकृत मकान बनाने की सुविधा बेईमान अधिकारियों की वजह से होती है, जो बिल्डरों से रिश्वत लेते हैं। इस तरह के निर्माण को रोकने के लिए अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए, ताकि गरीबों का शोषण न हो सके।

समाज का बदलता चेहरा

जस्टिस श्रीधरन ने यह चिंता भी जताई कि आम नागरिक अब भ्रटाचार को एक सामान्य बात मानने लगा है। जब तक लोग खुद को इसके खिलाफ नहीं खड़ा करेंगे, तब तक स्थिति नहीं बदलेगी। यह समय की मांग है कि जनता और सरकार, दोनों को मिलकर इस मुद्दे को गंभीरता से लेना होगा।

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