हीटवेव का नया खतरा बढ़ती जमीनी ओजोन से दिल और फेफड़े हो रहे बीमार, IIT खड़गपुर के अध्ययन में चेतावनी

The CSR Journal Magazine
देश में बढ़ती हीटवेव अब केवल तापमान बढ़ाने तक सीमित नहीं रही है। आईआईटी खड़गपुर और केरल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन में सामने आया है कि लू के दौरान जमीनी स्तर पर ओजोन की मात्रा भी तेजी से बढ़ती है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रही है। यह प्रदूषक दिल और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के जोखिम को बढ़ाता है और कई मामलों में मौत का कारण भी बन सकता है।

क्या है जमीनी स्तर की ओजोन और क्यों है खतरनाक?

आमतौर पर ओजोन को पृथ्वी की सुरक्षा करने वाली गैस माना जाता है, लेकिन यह धारणा केवल ऊपरी वायुमंडल में मौजूद ओजोन के लिए सही है। पृथ्वी से 15 से 50 किलोमीटर ऊपर स्थित ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से रक्षा करती है। इसके विपरीत, जमीन के करीब बनने वाली ओजोन एक खतरनाक वायु प्रदूषक है। क्लाइमेट विशेषज्ञ सुनंदा भोला के अनुसार, यह ओजोन सीधे उत्सर्जित नहीं होती, बल्कि नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) जैसे प्रदूषकों की सूर्य के प्रकाश में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रिया से बनती है। जब तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है, तो ये रासायनिक प्रतिक्रियाएं तेज हो जाती हैं, जिससे वातावरण में ओजोन का स्तर बढ़ने लगता है।

हीटवेव के दौरान बढ़ता है ओजोन का स्तर

अध्ययन के अनुसार जमीनी स्तर की ओजोन की सुरक्षित सीमा लगभग 30 पार्ट्स पर बिलियन (ppb) मानी जाती है। हालांकि भारत के कई हिस्सों, विशेषकर उत्तर-पश्चिमी राज्यों और गंगा के मैदानी क्षेत्रों में इसका सामान्य स्तर 50 से 55 ppb तक दर्ज किया जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि हीटवेव के दौरान यह स्तर और अधिक बढ़ जाता है। चिंता की बात यह है कि लू समाप्त होने के बाद भी ओजोन की बढ़ी हुई मात्रा तुरंत कम नहीं होती। यह औसतन तीन से चार दिनों तक वातावरण में बनी रहती है। इसका अर्थ है कि गर्मी की लहर खत्म होने के बाद भी लोगों का स्वास्थ्य जोखिम बना रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह अदृश्य प्रदूषण आम लोगों के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।

दिल, फेफड़ों और अन्य बीमारियों का बढ़ता खतरा

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि जमीनी स्तर की ओजोन के लंबे समय तक संपर्क में रहने से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), इस्केमिक हार्ट डिजीज (IHD), फेफड़ों का कैंसर और मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। यह गैस श्वसन तंत्र को प्रभावित करती है और फेफड़ों की कार्यक्षमता को कम कर सकती है।
द स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत में COPD से हुई लगभग 2.34 लाख मौतों में ओजोन प्रदूषण एक महत्वपूर्ण कारक माना गया। इससे स्पष्ट होता है कि वायु प्रदूषण का यह रूप सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए कितना गंभीर है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ेगा संकट, निगरानी बढ़ाने की सलाह

आईआईटी खड़गपुर और केरल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ते तापमान के कारण भविष्य में ऐसे क्षेत्रों का विस्तार होगा जहां ओजोन का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच सकता है। अध्ययन में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को सुझाव दिया गया है कि वे तापमान, वायु गुणवत्ता और अन्य पर्यावरणीय मानकों की तरह जमीनी स्तर की ओजोन की भी नियमित और सक्रिय निगरानी करें। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।

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