रक्षा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि: भारतीय सेना को मिले 106 घातक टर्बोजेट कामिकाज़े ड्रोन

The CSR Journal Magazine

भारतीय सेना को मिले 106 कामिकाजे ड्रोन:180 किमी की रेंज, 450kmph की रफ्तार, न जैमिंग का असर, न टारगेट से भटकेंगे

आधुनिक युद्ध कला में तकनीकी नवाचारों और मानव रहित प्रणालियों ने रणनीतिक संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व के हालिया संघर्षों ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य के युद्ध महंगे लड़ाकू विमानों से नहीं, बल्कि किफायती और सटीक मार करने वाले ड्रोनों से जीते जाएंगे। इसी दिशा में अपनी सैन्य तैयारियों को अभेद्य बनाते हुए, भारतीय सेना ने रक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। सेना ने आपातकालीन खरीद के तहत दिल्ली की कंपनी एसएमपीपी (SMPP) द्वारा निर्मित 106 ‘पीसकीपर’ (अग्निवेग) टर्बोजेट कामिकाज़े (आत्मघाती) ड्रोनों की पहली खेप को अपने बेड़े में शामिल किया है।

स्वदेशी रक्षा तकनीक का नया मील का पत्थर

भारतीय सेना की ताकत को बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, स्वदेशी रक्षा कंपनी SMPP ने सेना को 106 टर्बोजेट इंजन से चलने वाले ‘कामिकाजे’ ड्रोन सौंप दिए हैं। इन ड्रोन को ‘पीसकीपर (अग्निवेग)’ नाम दिया गया है, जो कि 180 किमी की दूरी तक हमला कर सकते हैं। इनकी रफ्तार 450 किलोमीटर प्रति घंटा है, जो कि पेरेग्रिन फाल्कन की रफ्तार से भी ज्यादा है। इतने शक्तिशाली ड्रोन का होना सेना के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

उच्च तकनीकी क्षमताएं

इन कामिकाजे ड्रोन की सबसे खास बात यह है कि इनके संचालन में न तो जैमिंग का असर होगा और न ही स्पूफिंग के माध्यम से इन्हें अपने टारगेट से भटकाया जा सकेगा। कंपनी ने जानकारी दी है कि 100 ऑपरेशनल और 6 ट्रेनिंग ड्रोन सेना को प्रदान किए गए हैं। यह डिलीवरी भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता को दर्शाती है और अनमैन्ड वारफेयर के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

रणनीतिक महत्व

यह पारंपरिक तोपखाने (Artillery) और लंबी दूरी की मिसाइलों के बीच के अंतर को भरता है। मिसाइलों के विपरीत, इन्हें उड़ान के दौरान भी बीच में रोका या इनका रास्ता बदला जा सकता है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह मूल रूप से बेलारूस की कंपनी ‘केबी इंडेला’ के साथ साझेदारी और ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) के तहत तैयार किया गया है। आने वाले समय में इसके जेट इंजन मोटर का निर्माण भी भारत में ही होगा।

स्वायत्त और सटीक हमले की क्षमता

पीसकीपर ड्रोन पूरी तरह से स्वायत्त प्रिसिजन स्ट्राइक मिशन का संचालन कर सकते हैं। मतलब, एक बार लक्ष्य निर्धारित हो जाने पर ये बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के अपने मिशन को पूरा कर सकते हैं। कामिकाजे ड्रोन उन लक्ष्यों पर हमला करते हैं और खुद भी नष्ट हो जाते हैं, जिसे ‘लॉइटरिंग म्यूनिशन’ भी कहा जाता है। यह तकनीक सेकेंड वर्ल्ड वार के कामिकाजे अटैक से प्रेरित है।

कम लागत और उच्च सटीकता

इन ड्रोनों की विशेषज्ञता यह है कि ये लक्ष्य के आसपास की नागरिक संरचनाओं को नुकसान पहुंचाए बिना बेहद सटीकता से हमला कर सकते हैं। अत्यधिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) वाले क्षेत्रों में भी यह तकनीक प्रभावी है। भारी जैमिंग और जीपीएस-स्पूफिंग (GPS-spoofing) के बावजूद, इसका सटीकता दायरा (CEP) 5 मीटर से भी कम है जिससे जानमाल का कम नुकसान होता है। ये टैंक, रडार, तोप और अन्य सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकते हैं। इस तरह के सटीक हमले से सैनिकों की जान भी सीधे खतरे में नहीं रहती।

जल्दी और प्रभावी टारगेटिंग

ट्रायल के दौरान अग्निवेग ने जैमिंग और स्पूफिंग वाले माहौल में 5 मीटर से कम का सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) हासिल किया है। सरल शब्दों में कहें तो यह ड्रोन अपने टारगेट को बेहद करीब जाकर हमला करने में सक्षम हैं। यह युद्ध में तेजी से निर्णय लेने और सटीकता को बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीक है।

भविष्य की सैन्य रणनीतियों में कामिकाजे ड्रोन का स्थान

450 किमी/घंटा की तूफानी रफ्तार और 180 किलोमीटर की लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम ये ड्रोन, भारतीय रक्षा पंक्ति को और अधिक आक्रामक, त्वरित और घातक बनाने के उद्देश्य से सेना को सौंपे गए हैं। यह कदम न केवल भारत की मारक क्षमता को बढ़ाता है, बल्कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (Atmanirbhar Bharat) की ओर एक बड़ा मील का पत्थर है। इस सफलता के बाद, भारतीय सेना की भविष्य की सैन्य रणनीतियों में कामिकाजे ड्रोन एक महत्वपूर्ण स्थान पाएंगे। इनकी उच्च रेंज और स्पीड के चलते, ये ड्रोन युद्ध के मैदान में एक नए आयाम की शुरुआत कर सकते हैं। बता दें कि इन ड्रोनों की तकनीक ने रक्षा क्षेत्र में एक नया क्रांति लाने का कार्य किया है।

डिजिटल ड्रोन युद्ध के लिए तैयार भारत

भारतीय सेना के बेड़े में टर्बोजेट-चालित कामिकाज़े ड्रोनों का शामिल होना समकालीन युद्ध तकनीकों के अनुकूल खुद को ढालने की भारत की दूरदर्शिता को दर्शाता है। ये ड्रोन पारंपरिक तोपखाने और महंगी क्रूज मिसाइलों के बीच की खाली कड़ी को भरते हैं, जिससे सेना को कम लागत में गहरी और अचूक मार करने की शक्ति मिलती है। अत्यधिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (जैमिंग और जीपीएस-स्पूफिंग) वाले क्षेत्रों में भी दुश्मन के बंकरों, रडार प्रणालियों और बख्तरबंद वाहनों को ध्वस्त करने की इसकी क्षमता भारतीय सीमाओं (विशेषकर लद्दाख और पूर्वोत्तर) पर सुरक्षा समीकरणों को मजबूत करेगी। हालांकि, केवल आयातित तकनीक या असेंबलिंग पर निर्भर रहने के बजाय, भारत को इसके जेट इंजन जैसे मुख्य कलपुर्जों के शत-प्रतिशत घरेलू विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित करना होगा। अंततः, निजी रक्षा कंपनियों (जैसे SMPP) और सेना के बीच का यह सफल समन्वय न केवल भारत की सामरिक शक्ति को बढ़ाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि देश भविष्य के किसी भी ‘डिजिटल’ या ‘ड्रोन युद्ध’ का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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