विश्व जनसंख्या दिवस: नसबंदी में पुरुष पीछे, महिलाएं आगे, जानिए चौंकाने वाले आंकड़े

The CSR Journal Magazine

विश्व जनसंख्या दिवस: पुरुषों के मुकाबले 73% ज्यादा महिलाओं ने कराई है नसबंदी 

विश्व जनसंख्या दिवस पर जारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में परिवार नियोजन की पूरी जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं के कंधों पर ही आ टिकी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और विभिन्न राज्य स्वास्थ्य समितियों की रिपोर्ट के अनुसार, पुरुष नसबंदी (Vasectomy) की तुलना में महिला बंध्याकरण (Tubectomy) के आंकड़े चौंकाने वाले स्तर तक अधिक हैं। कई जिलों और राज्यों में तो यह अंतर 73% से भी कहीं ज्यादा आगे निकल चुका है।

महिलाओं की नसबंदी: आंकड़ों की कड़वाई

भारत में वर्तमान में केवल 0.5 प्रतिशत पुरुष नसबंदी कराते हैं, जबकि महिलाओं की संख्या इससे 73 गुना ज्यादा है। देश के विभिन्न राज्यों में महिलाओं की नसबंदी के आंकड़े भी इसी पैटर्न को दर्शाते हैं। भारत अब दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है, जहां 140 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। यह जनसंख्या सिर्फ एक संख्या नहीं बल्कि एक चुनौती भी है। अगर देश की युवा आबादी को सही दिशा में बढ़ाया जाए तो यह भारत की ताकत बन सकती है। लेकिन इसके लिए ना सिर्फ जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण जरूरी है, बल्कि परिवार नियोजन की जिम्मेदारी भी समान रूप से बांटी जानी चाहिए।

महिलाओं पर भारी परिवार नियोजन का बोझ

पिछले कुछ सालों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी हुई है, लेकिन कुल जनसंख्या में बढ़ोतरी जारी है। विश्व जनसंख्या दिवस का यह अवसर हमें जागरूक करने का है कि किस तरह से परिवार नियोजन और स्वास्थ्य जनित मुद्दों का महिलाओं पर दबाव बढ़ता जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में पुरुष नसबंदी का आंकड़ा केवल 0.5% है, जबकि महिलाओं में यह 36.5% है। इसका मतलब है कि स्थायी परिवार नियोजन का भार अभी भी महिलाओं पर है।

राज्यवार आंकड़े: चौंकाने वाली तस्वीर

राजस्थान के भरतपुर जिले में अद्भुत आंकड़े सामने आए हैं। मई 2026 तक केवल एक पुरुष ने नसबंदी कराई, जबकि 544 महिलाओं ने यह ऑपरेशन करवाया। पिछले पांच साल में यहां केवल 0.13% पुरुष और 99.87% महिलाएं इस प्रक्रिया का हिस्सा बनीं। वहीं, मुजफ्फरपुर में पुरुष नसबंदी की उपलब्धि शून्य रही है। ऐसे राज्यों की संख्या में कमी लाने के लिए सामाजिक सोच का बदलाव अत्यंत आवश्यक है।

तेलंगाना की उपलब्धियां

अगर बात करें कुछ राज्यों की, तो तेलंगाना ने पुरुष नसबंदी में अव्वल स्थान प्राप्त किया है, जहां 3.6% दंपतियों ने इस प्रक्रिया को अपनाया है। इसके बाद हिमाचल प्रदेश (2.3%), सिक्किम (1.8%), और छत्तीसगढ़ (1.4%) का नाम आता है। यह सभी राज्य राष्ट्रीय औसत 0.5% से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर भारी अंतर

राष्ट्रीय सर्वेक्षण के आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में लगभग 37.9% विवाहित महिलाएं नसबंदी का रास्ता चुनती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा मात्र 0.3% के आसपास सिमट कर रह गया है।। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में बीते चार सालों में नसबंदी कराने वाले प्रत्येक 1 पुरुष के मुकाबले करीब 27 महिलाओं का बंध्याकरण हुआ है।

पारिवारिक योजनाओं में धीमी प्रगति

हालांकि दूसरे राज्यों का प्रदर्शन कमजोर बना हुआ है। मिजोरम और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पुरुष नसबंदी का आंकड़ा 0.0% है, जबकि अन्य राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, गोवा, और उत्तर प्रदेश में भी यह काफी कम है। यह दर्शाता है कि पुरुष नसबंदी के प्रति झिझक खत्म नहीं हुई है।

पुरुषों के पीछे हटने के मुख्य कारण

पुरुषों की इस बेहद कम भागीदारी के पीछे चिकित्सीय कमियां नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक और मानसिक कारण जिम्मेदार हैं।  अधिकांश पुरुषों में यह गलत धारणा बैठी हुई है कि नसबंदी कराने से उनके शरीर में कमजोरी आ जाएगी या वे भारी काम नहीं कर पाएंगे। समाज में फैले मिथकों के कारण पुरुषों को लगता है कि इस प्रक्रिया से उनकी मर्दानगी या यौन क्षमता प्रभावित होगी, जो कि पूरी तरह निराधार है। परिवार नियोजन को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी मान लेना इस पितृसत्तात्मक समाज की असमानता की सबसे बड़ी जड़ है।

पुरुष नसबंदी क्यों है बेहतर विकल्प?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, महिला बंध्याकरण की तुलना में पुरुष नसबंदी (NSV – नो स्केलपेल वेसेक्टॉमी) तकनीकी रूप से बहुत ज्यादा सरल, सुरक्षित और कम समय लेने वाली प्रक्रिया है। इसके लिए किसी बड़े चीरे या टांके की जरूरत नहीं होती और अस्पताल में भर्ती होने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने और महिलाओं पर से इसका बोझ कम करने के लिए अब स्वास्थ्य विभाग पुरुषों की काउंसलिंग करने तथा जागरूकता बढ़ाने पर विशेष जोर दे रहा है।

बदलाव की राह: जागरूकता और समझदारी जरूरी

इस असमानता को खत्म करने के लिए जमीनी स्तर पर बड़े बदलावों की जरूरत है। स्वास्थ्य केंद्रों पर सिर्फ महिलाओं को नहीं, बल्कि उनके पतियों को भी परिवार नियोजन के फायदों और सुरक्षित तरीकों के बारे में समझाना होगा। गांवों और कस्बों में प्रभावशाली पुरुषों और स्थानीय नेताओं के जरिए जागरूकता अभियान चलाने होंगे ताकि लोग खुलकर इस पर बात कर सकें।

जिम्मेदारी का अहसास

समाज को यह स्वीकार करना होगा कि परिवार नियोजन किसी एक की नहीं, बल्कि पति और पत्नी दोनों की साझा जिम्मेदारी है। जब समाज में यह समझदारी आएगी कि पुरुष नसबंदी महिला ऑपरेशन की तुलना में कहीं अधिक सरल और सुरक्षित है, तभी आंकड़ों का यह बड़ा अंतर कम हो सकेगा।

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