अन्नदाता बनाम व्यवस्था: 4 साल में तीसरी बार दिल्ली की दहलीज पर खड़ा पंजाब

The CSR Journal Magazine

पंजाब के किसान: 4 साल में तीसरी बार दिल्ली कूच, टकराव की कहानी, किसानों का दिल्ली कूच जारी

देश के अन्नदाता और सरकार के बीच टकराव की एक नई और बेहद गंभीर पटकथा लिखी जा रही है। पंजाब के किसानों ने पिछले 4 वर्षों में तीसरी बार राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की ओर कूच (दिल्ली चलो) का बिगुल फूंक दिया है। इस बार टकराव की मुख्य वजह भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) और कृषि-डेयरी क्षेत्र का बढ़ता संकट है। अमृतसर, गुरदासपुर, पटियाला और ब्यास से चले हजारों किसानों के काफिलों को रोकने के लिए हरियाणा की पुलिस ने पंजाब से लगती सीमाओं, विशेषकर शंभू बॉर्डर और खनौरी बॉर्डर को कंक्रीट की दीवारों, नुकीले तारों और भारी सुरक्षा बलों के जरिए अभेद्य किले में तब्दील कर दिया है। सरहद पर धारा 163 (बीएनएस) लागू कर दी गई है और सुरक्षा बलों द्वारा शांतिपूर्ण मार्च को रोकने के लिए आंसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं, जिससे एक बार फिर देश की सबसे व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्गों पर तनाव चरम पर पहुंच गया है।

नया मोर्चा: भारत-अमेरिका ट्रेड डील के खिलाफ महाआक्रोश

इस बार का आंदोलन केवल पारंपरिक मांगों जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य केंद्र ‘देश बचाओ मोर्चा’ और ‘किसान मजदूर मोर्चा’ (KMM) के बैनर तले भारत-अमेरिका व्यापार सौदा (Trade Deal) बना हुआ है।

किसानों को किस बात का डर है?

किसान संगठनों का नेतृत्व कर रहे सरवन सिंह पंढेर और भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के प्रमुख गुरनाम सिंह चढ़ूनी का आरोप है कि केंद्र सरकार अमेरिकी दबाव में एक ऐसा द्विपक्षीय समझौता करने जा रही है, जो भारत की खाद्य संप्रभुता को सीधे तौर पर नष्ट कर देगा।

अमेरिकी सब्सिडी बनाम भारतीय किसान

अमेरिकी कृषि क्षेत्र अत्यधिक यंत्रीकृत है और वहां की सरकार अपने किसानों को भारी सब्सिडी देती है। यदि आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) में कटौती की जाती है, तो अमेरिकी अनाज, डेयरी उत्पाद, सोयाबीन तेल, और फल भारतीय बाजारों में बाढ़ की तरह आ जाएंगे।

बाजार का पतन

विदेशी कॉर्पोरेट उत्पादों के आने से देश के भीतर कृषि और डेयरी उत्पादों के दाम धड़ाम से गिर जाएंगे। भारत का औसत किसान महज 2 से 3 एकड़ भूमि का मालिक है, जो इन बड़ी अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुकाबले टिक नहीं पाएगा।

व्यापक आर्थिक असर

किसानों का दावा है कि इस गुप्त सौदे में कृषि और डेयरी के साथ-साथ डिजिटल व्यापार, ई-कॉमर्स और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) जैसे संवेदनशील क्षेत्र भी शामिल हैं, जो छोटे व्यापारियों और मजदूरों की आजीविका को भी लील जाएंगे।

चार साल की क्रोनोलॉजी: टकराव के तीन बड़े अध्याय

पंजाब और हरियाणा के किसानों का दिल्ली के साथ यह टकराव नया नहीं है। पिछले चार वर्षों (2020-2026) के इतिहास पर नजर डालें, तो यह अन्नदाताओं के धैर्य और व्यवस्था की सख्ती के बीच का एक अनवरत संघर्ष दिखाई देता है।

पहला दिल्ली कूच (नवंबर 2020)-तीन कृषि कानूनों के खिलाफ ऐतिहासिक जंग

यह आधुनिक भारत का सबसे बड़ा और लंबा किसान आंदोलन था। सितंबर 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब और हरियाणा के किसानों ने ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। नवंबर 2020 में किसानों ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर पुलिस की भारी बैरिकेडिंग, वॉटर कैनन और आंसू गैस का सामना किया। वे दिल्ली में प्रवेश नहीं पा सके, तो उन्होंने सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डरों को अपना घर बना लिया। 26 जनवरी 2021 को दिल्ली में आयोजित ट्रैक्टर रैली के दौरान लाल किले पर हिंसा हुई, जिसने आंदोलन को एक नया मोड़ दिया। एक साल से अधिक समय तक चले इस आंदोलन और 11 दौर की असफल वार्ताओं के बाद, आखिरकार 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा की।

दूसरा दिल्ली कूच (फरवरी 2024)-शंभू बॉर्डर पर महासंग्राम

पहले आंदोलन की समाप्ति के बाद भी MSP की कानूनी गारंटी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांगें पूरी नहीं हुई थीं। इसके लिए फरवरी 2024 में ‘किसान मजदूर मोर्चा’ और ‘संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक)’ ने दोबारा दिल्ली कूच की घोषणा की। इस बार हरियाणा सरकार ने सीमाओं पर कंक्रीट के बड़े-बड़े ब्लॉक, कंटेनर, लोहे की नुकीली कीलें और कंटीले तार लगाकर ऐसी किलेबंदी की जो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं जैसी प्रतीत हो रही थी। इतिहास में पहली बार प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आसमान से ड्रोन के जरिए आंसू गैस के गोले बरसाए गए। किसानों ने पुलिस पर पैलेट गन चलाने का आरोप लगाया, जिससे कई किसान गंभीर रूप से चोटिल हुए।

शुभकरण की मौत

21 फरवरी 2024 को खनौरी बॉर्डर पर झड़प के दौरान 21 वर्षीय युवा किसान शुभकरण सिंह की गोली लगने से मौत हो गई। इस घटना ने आंदोलन को अत्यधिक संवेदनशील बना दिया। शंभू बॉर्डर करीब 13 महीने (401 दिन) तक पूरी तरह बंद रहा। व्यापार और उद्योगों को भारी नुकसान हुआ, जिसके बाद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सख्त आदेश पर 20 मार्च 2025 को इस हाईवे को आम जनता के लिए दोबारा खुलवाया जा सका। इस दौरान नवंबर 2024 में किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के आमरण अनशन ने भी देश का ध्यान खींचा।

तीसरा दिल्ली कूच (जुलाई 2026)-ट्रेड डील के खिलाफ आर-पार की लड़ाई

जुलाई 2026 की यह ताजा तस्वीरें बता रही हैं कि घाव अभी भी हरे हैं। भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते को देश के किसानों के लिए ‘फांसी का फंदा’ बताते हुए किसान संगठन फिर सड़कों पर हैं। दिल्ली के किसान घाट पर प्रस्तावित एक दिवसीय विशाल महापंचायत में शामिल होने जा रहे किसानों को रोकने के लिए प्रशासन ने एक बार फिर ठीक वही सख्त तरीके अपनाए हैं जो 2024 में देखे गए थे।

सीमाओं की किलेबंदी और आम जनता की मुश्किलें

इस समय पंजाब और हरियाणा को जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग-44 (NH-44) पूरी तरह ठप पड़ा है। अंबाला प्रशासन ने शंभू बॉर्डर के पुलों पर भारी कंक्रीट स्ट्रक्चर खड़े कर दिए हैं। अंबाला और आसपास के जिलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 163 लगा दी गई है, जिसके तहत पांच या उससे अधिक व्यक्तियों के इकट्ठा होने पर पाबंदी है।

इंटरनेट और ट्रैफिक डायवर्जन

कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए कुछ संवेदनशील इलाकों में मोबाइल इंटरनेट पर नजर रखी जा रही है और दिल्ली-जालंधर राजमार्ग पर चलने वाले वाहनों को लंबे वैकल्पिक रास्तों से भेजा जा रहा है। महापंचायत से ठीक एक दिन पहले सोमवार को किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी को दिल्ली जाते समय हरियाणा पुलिस ने हिरासत में ले लिया, जिससे किसानों का गुस्सा और भड़क गया है।

राजनीतिक घमासान और सरकार का रुख

किसानों के इस नए आंदोलन ने देश की राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया है, खासकर पंजाब में जहां आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक समीकरण बेहद संवेदनशील हैं। सरवन सिंह पंढेर ने साफ किया, “हम दिल्ली में कोई हिंसा या टकराव करने नहीं आ रहे हैं। हम लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने राजधानी जा रहे हैं, लेकिन सरकार ने सीमाओं पर जो कंक्रीट की दीवारें उठाई हैं, वह देश के नागरिकों के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार है।”

भाजपा और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया

पंजाब भाजपा के प्रवक्ताओं का कहना है कि विपक्ष और कुछ किसान नेता जानबूझकर भ्रम फैला रहे हैं। सरकार का तर्क है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अभी कोई अंतिम ब्यौरा या आधिकारिक हस्ताक्षर नहीं हुए हैं, ऐसे में बिना किसी ठोस आधार के प्रदर्शन करना केवल पंजाब के माहौल को खराब करने और राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश है।

विपक्ष का रुख

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) समेत तमाम विपक्षी दलों ने किसानों के शांतिपूर्ण मार्च को बलपूर्वक रोकने की निंदा की है और मांग की है कि कृषि क्षेत्र को किसी भी वैश्विक कॉर्पोरेट संधि से पूरी तरह बाहर रखा जाए।

क्या संवाद से निकलेगा समाधान?

पिछले चार सालों की यह तीसरी बड़ी तकरार यह साबित करती है कि देश की कृषि नीतियों और ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले किसानों के बीच विश्वास की एक बड़ी कमी है। जब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में पारदर्शिता जैसे बुनियादी सवालों का स्थायी और संस्थागत समाधान नहीं खोजा जाता, तब तक दिल्ली की दहलीज और पंजाब की सरहदों के बीच यह टकराव रुकने वाला नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता की सुविधा के लिए यह बेहद जरूरी है कि केंद्र सरकार और किसान संगठन जिद छोड़कर मेज पर आएं और एक साझा नीतिगत रास्ता तलाशें।

किसानों के आंदोलन का साया

पिछले चार साल में किसान आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई, इंटरनेट बंदी, राजनीतिक टकराव और कई विवाद सामने आए हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि किसान अपनी मांगों को लेकर आगे किस प्रकार की रणनीति बनाते हैं और क्या वो दिल्ली पहुंच पाएंगे।

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