IVF और ART सेवाओं को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम: राष्ट्रीय महिला आयोग ने गठित की उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति
देश में तेजी से बढ़ रही इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) और असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) सेवाओं के बीच महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा और नैतिक चिकित्सा व्यवस्था को और मजबूत करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। आयोग ने IVF क्लीनिकों, एआरटी केंद्रों तथा गामेट (शुक्राणु एवं अंडाणु) बैंकों के नियमन की व्यापक समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति (High-Level Expert Committee) का गठन किया है। इस समिति का उद्देश्य वर्तमान कानूनी और नियामक व्यवस्था का गहन मूल्यांकन करना, मौजूदा चुनौतियों की पहचान करना तथा ऐसी सिफारिशें तैयार करना है जिनसे देशभर में महिलाओं को सुरक्षित, पारदर्शी, नैतिक और जवाबदेह प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें।
क्यों जरूरी पड़ी विशेषज्ञ समिति?
पिछले कुछ वर्षों में भारत में बांझपन (Infertility) के मामलों में वृद्धि हुई है, जिसके कारण IVF और अन्य प्रजनन उपचारों की मांग तेजी से बढ़ी है। इसके साथ ही निजी क्षेत्र में बड़ी संख्या में IVF क्लीनिक और एआरटी केंद्र स्थापित हुए हैं। हालांकि इस क्षेत्र के विस्तार के साथ कई प्रकार की शिकायतें भी सामने आई हैं, जिनमें शामिल हैं—
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उपचार की वास्तविक सफलता दर को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना।
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मरीजों से अत्यधिक शुल्क वसूलना।
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पर्याप्त जानकारी दिए बिना उपचार शुरू करना।
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महिलाओं की गोपनीयता और अधिकारों का उल्लंघन।
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गामेट और भ्रूण (Embryo) के प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी।
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रिकॉर्ड संधारण और जैविक ट्रेसबिलिटी से जुड़े प्रश्न।
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अनियमित या गैर-पंजीकृत संस्थानों द्वारा सेवाएं देना।
इन परिस्थितियों को देखते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग ने व्यापक समीक्षा की आवश्यकता महसूस की।
समिति किन कानूनों की समीक्षा करेगी?
विशेषज्ञ समिति निम्न प्रमुख कानूनों और नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन की समीक्षा करेगी—
असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) अधिनियम, 2021
यह कानून देश में IVF क्लीनिकों, एआरटी केंद्रों तथा गामेट बैंकों के पंजीकरण, संचालन, रिकॉर्ड प्रबंधन और नियमन के लिए बनाया गया था। इसका उद्देश्य मरीजों के अधिकारों की रक्षा करना तथा उपचार प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है।
सरोगेसी (रेगुलेशन) अधिनियम, 2021
इस कानून के माध्यम से व्यावसायिक सरोगेसी पर रोक लगाई गई तथा केवल निर्धारित शर्तों के अंतर्गत परोपकारी (Altruistic) सरोगेसी की अनुमति दी गई। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं का शोषण रोकना और सरोगेसी प्रक्रिया को कानूनी दायरे में लाना है।
वर्ष 2026 के संशोधन नियम (Amendment Rules)
समिति यह भी अध्ययन करेगी कि 2026 में लागू संशोधित नियमों का व्यवहारिक प्रभाव क्या रहा है तथा इनके क्रियान्वयन में किन सुधारों की आवश्यकता है।
समिति किन प्रमुख मुद्दों पर करेगी काम?
राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा गठित समिति कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी सिफारिशें देगी।
IVF क्लीनिकों और एआरटी केंद्रों की निगरानी मजबूत करना
समिति यह सुनिश्चित करने के उपाय सुझाएगी कि देशभर में संचालित सभी आईवीएफ क्लीनिक और एआरटी केंद्र निर्धारित मानकों का पालन करें। नियमित निरीक्षण, लाइसेंसिंग प्रणाली और जवाबदेही बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की सुरक्षा
समिति इस बात पर विशेष जोर देगी कि प्रत्येक महिला को—
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सम्मानजनक व्यवहार मिले।
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उपचार से पहले पूरी जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
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स्वतंत्र और सूचित सहमति (Informed Consent) ली जाए।
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व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता सुनिश्चित हो।
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उपचार के दौरान किसी भी प्रकार के दबाव या भेदभाव का सामना न करना पड़े।
अनैतिक गतिविधियों पर रोक
समिति उन सभी प्रथाओं की पहचान करेगी जो महिलाओं या दंपतियों के हितों के विरुद्ध हैं। इसमें शामिल हो सकते हैं—
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झूठे विज्ञापन।
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सफलता दर के भ्रामक दावे।
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आर्थिक शोषण।
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अवैध गामेट लेन-देन।
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रिकॉर्ड में अनियमितताएं।
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चिकित्सा प्रोटोकॉल का उल्लंघन।
एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (SOP)
देशभर के सभी IVF केंद्रों के लिए एक समान Standard Operating Procedures (SOPs) तथा क्लीनिकल प्रोटोकॉल तैयार करने की सिफारिश की जाएगी, जिससे प्रत्येक मरीज को गुणवत्तापूर्ण और समान स्तर की चिकित्सा सुविधा प्राप्त हो सके।
जैविक ट्रेसबिलिटी और मरीज सुरक्षा
विशेषज्ञ समिति इस बात पर भी विचार करेगी कि गामेट, भ्रूण तथा अन्य जैविक नमूनों का रिकॉर्ड किस प्रकार सुरक्षित, पारदर्शी और ट्रेस करने योग्य बनाया जाए ताकि किसी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना समाप्त हो सके।
मरीजों को क्या मिलेगा लाभ?
यदि समिति की सिफारिशें प्रभावी रूप से लागू होती हैं तो—
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उपचार प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी।
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मरीजों को उपचार से पहले पूरी जानकारी मिलेगी।
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अत्यधिक शुल्क वसूली पर नियंत्रण संभव होगा।
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महिलाओं की गोपनीयता और गरिमा की बेहतर सुरक्षा होगी।
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उपचार की गुणवत्ता में सुधार आएगा।
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क्लीनिकों की जवाबदेही बढ़ेगी।
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धोखाधड़ी और अनियमितताओं में कमी आएगी।
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पूरे देश में एक समान गुणवत्ता मानक लागू हो सकेंगे।
IVF और एआरटी क्या हैं?
IVF (In Vitro Fertilization) एक ऐसी आधुनिक चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु का निषेचन प्रयोगशाला में कराया जाता है। इसके बाद विकसित भ्रूण को महिला के गर्भाशय में स्थापित किया जाता है। असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) में आईवीएफ के अलावा कई अन्य आधुनिक तकनीकें भी शामिल होती हैं, जिनका उपयोग बांझपन के उपचार में किया जाता है।
महिलाओं के अधिकारों पर विशेष जोर
राष्ट्रीय महिला आयोग का मानना है कि प्रजनन स्वास्थ्य केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि महिलाओं के मौलिक अधिकार, सम्मान और गरिमा से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए उपचार के दौरान महिलाओं की इच्छा, गोपनीयता, मानसिक स्वास्थ्य, कानूनी सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
विशेषज्ञों की संभावित भूमिका
समिति में चिकित्सा विशेषज्ञों, कानूनी विशेषज्ञों, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, जैव-नैतिकता (Bioethics) विशेषज्ञों तथा नीति-निर्माताओं की भागीदारी से व्यापक सुझाव तैयार किए जाने की उम्मीद है। यह समिति देशभर में लागू व्यवस्था का अध्ययन कर व्यवहारिक और प्रभावी सुधारों का रोडमैप तैयार करेगी।
स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ेगी जवाबदेही
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल केवल कानूनों की समीक्षा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि स्वास्थ्य संस्थानों की जवाबदेही, पारदर्शिता और गुणवत्ता नियंत्रण को भी मजबूत करेगी। इससे मरीजों का विश्वास बढ़ेगा और प्रजनन उपचार सेवाओं में नैतिक मानकों का बेहतर पालन सुनिश्चित किया जा सकेगा।
महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की सुरक्षा को बड़ा कदम
राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा गठित उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति भारत में IVF और ART सेवाओं के नियमन को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य केवल कानूनों की समीक्षा करना नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की रक्षा, उपचार प्रणाली में पारदर्शिता, क्लीनिकों की जवाबदेही, मरीजों की सुरक्षा तथा नैतिक चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करना है। यदि समिति की सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो देश में प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय, मानकीकृत और महिला-केंद्रित बन सकेंगी।
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