मुंबई की जीवनरेखा मानी जाने वाली Western Railway अब लोकल ट्रेनों में लाइसेंसधारी हॉकर्स (फेरीवालों) को अनुमति देने पर विचार कर रही है। यह प्रस्ताव Central Railway के हालिया फैसले के बाद सामने आया है, जहां सीमित रूट पर हॉकर्स को अनुमति देने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस कदम का उद्देश्य रेलवे की गैर-भाड़ा (non-fare) आय बढ़ाना बताया जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही यात्रियों की सुरक्षा, भीड़भाड़ और स्वच्छता को लेकर गंभीर चिंताएं भी उठने लगी हैं।
सेंट्रल रेलवे ने उठाया पहला कदम
सेंट्रल रेलवे ने Chhatrapati Shivaji Maharaj Terminus (CSMT) से कल्याण के बीच लोकल ट्रेनों में हॉकर्स को अनुमति देने के लिए एक ठेका जारी किया है। इस कॉन्ट्रैक्ट की कीमत लगभग 1.32 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। योजना के तहत केवल लाइसेंसधारी हॉकर्स को निर्धारित नियमों के साथ ट्रेन में सामान बेचने की अनुमति दी जाएगी। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि यह पहल न सिर्फ अवैध फेरीवालों को नियंत्रित करेगी बल्कि रेलवे को अतिरिक्त राजस्व भी देगी। साथ ही, हॉकर्स को औपचारिक व्यवस्था में लाने से उनके काम को भी वैध पहचान मिलेगी।
वेस्टर्न रेलवे भी कर रहा है विचार
अब वेस्टर्न रेलवे भी इसी मॉडल को अपनाने की संभावना पर विचार कर रहा है। यदि यह योजना लागू होती है, तो चर्चगेट से विरार और अन्य व्यस्त रूटों पर भी हॉकर्स की एंट्री हो सकती है। अधिकारियों के अनुसार, अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी पक्षों से सुझाव और आपत्तियां ली जाएंगी।
यात्रियों और संगठनों की चिंता
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर मुंबई के लाखों दैनिक यात्रियों और विभिन्न कम्यूटर संगठनों में चिंता बढ़ गई है। उनका कहना है कि मुंबई लोकल पहले से ही दुनिया की सबसे भीड़भाड़ वाली ट्रांसपोर्ट प्रणालियों में से एक है, जहां पीक आवर्स में यात्रियों को खड़े होने तक की जगह मुश्किल से मिलती है।कम्यूटर यूनियनों का तर्क है कि ट्रेनों में हॉकर्स की अनुमति देने से भीड़ और बढ़ेगी, यात्रियों की आवाजाही में बाधा आएगी, दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है, स्वच्छता और हाइजीन पर असर पड़ेगा! यात्री संगठनों ने रेलवे से मांग की है कि वह पहले सुरक्षा, अधिक ट्रेनों की उपलब्धता और लंबित इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को पूरा करने पर ध्यान दे, न कि केवल राजस्व बढ़ाने पर।
‘जमीनी हकीकत को मान्यता’ या ‘नई समस्या’?
कुछ यात्रियों का मानना है कि लोकल ट्रेनों में पहले से ही अनौपचारिक रूप से हॉकिंग होती है। ऐसे में इसे लाइसेंस देकर नियंत्रित करना एक व्यावहारिक कदम हो सकता है। इससे अवैध गतिविधियों पर रोक लगेगी और व्यवस्था में सुधार आ सकता है।वहीं, दूसरी ओर कई लोग इसे “पहले से मौजूद समस्या को और बढ़ाने” वाला कदम मानते हैं। उनका कहना है कि अगर सही तरीके से नियम लागू नहीं किए गए, तो यह पहल यात्रियों के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है।
क्या हो सकता है आगे?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेलवे इस योजना को लागू करना चाहता है, तो उसे सख्त दिशानिर्देश बनाने होंगे। जैसे:
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हॉकर्स की संख्या सीमित करना
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केवल नॉन-पीक आवर्स में अनुमति देना
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सुरक्षा और स्वच्छता के कड़े मानक लागू करना
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यात्रियों की सुविधा को प्राथमिकता देना

