पीएम मोदी ने हरियाणा में देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन को दिखाई हरी झंडी

The CSR Journal Magazine

आत्मनिर्भर भारत की नई रफ़्तार: जींद से सोनीपत के बीच शून्य-कार्बन रेल युग का आगाज़, हरित क्रांति की नई परिभाषा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ईंधन आधारित यात्री ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया, जो शून्य-कार्बन उत्सर्जन के साथ भारतीय रेलवे को वर्ष 2030 तक पूरी तरह ‘नेट-ज़ीरो’ बनाने की दिशा में सबसे बड़ा ऐतिहासिक कदम है। भारतीय रेलवे के इतिहास में आज का दिन एक स्वर्णिम और युगांतरकारी अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद जंक्शन रेलवे स्टेशन पर आयोजित एक भव्य समारोह में देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ईंधन आधारित यात्री ट्रेन (Hydrogen Fuel Cell Trainset) को हरी झंडी दिखाकर राष्ट्र को समर्पित कर दिया है। यह ट्रेन आधुनिक विज्ञान, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भर भारत की सामूहिक शक्ति का एक अद्वितीय उदाहरण है।

आत्मनिर्भर भारत का नया अध्याय

चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) द्वारा तैयार की गई यह 10-कोच वाली अत्याधुनिक ट्रेन आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत लिख रही है। इसमें स्थापित 1200 kW हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रोपल्शन सिस्टम इसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली और लंबे हाइड्रोजन यात्री ट्रेन सेटों में से एक बनाता है। इस ऐतिहासिक उद्घाटन के साथ ही भारत अब जर्मनी, चीन, जापान और अमेरिका जैसे उन गिने-चुने और विशिष्ट देशों की कतार में शामिल हो गया है जिनके पास वाणिज्यिक स्तर पर हाइड्रोजन रेल तकनीक का संचालन करने का सामर्थ्य है।

पर्यावरण संरक्षण और शून्य उत्सर्जन की अनूठी तकनीक

पारंपरिक डीजल इंजनों से इतर, यह हाइड्रोजन ट्रेन पर्यावरण को बिना किसी प्रकार का नुकसान पहुँचाए पटरियों पर दौड़ने के लिए डिज़ाइन की गई है। इस ट्रेन में प्रोपल्शन के लिए प्रयुक्त प्राथमिक ऊर्जा स्रोत एक प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन फ्यूल सेल (PEMFC) है।  यह फ्यूल सेल ऑनबोर्ड रखे हाइड्रोजन और वायुमंडल से ली गई ऑक्सीजन के बीच एक रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से सीधे बिजली का उत्पादन करता है। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे क्रांतिकारी पहलू यह है कि इसमें किसी भी प्रकार की ज़हरीली गैस या कार्बन का उत्सर्जन नहीं होता है।

Zero Emission सिद्धांत पर आधारित

ट्रेन के साइलेंसर से धुएं के बजाय उप-उत्पाद (By-product) के रूप में केवल शुद्ध पानी की भाप (जल वाष्प) और थोड़ी सी ऊष्मा उत्सर्जित होती है। इस प्रकार, यह तकनीक पूरी तरह से ‘ज़ीरो-एमिशन’ (शून्य उत्सर्जन) के सिद्धांत पर काम करती है। रेलवे मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस सिंगल रैक के संचालन से सालाना लगभग 11,000 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का उत्सर्जन कम होगा, जो पर्यावरण शोधन की दिशा में एक बहुत बड़ा योगदान है। इसके अलावा, पारंपरिक डीजल रेलगाड़ियों की तुलना में इसके इंजन में कोई भारी शोर या कंपन नहीं होता, जिससे यात्रियों को बेहद शांत और सुखद यात्रा का अनुभव मिलेगा।

रूट और समय सारणी

जींद से सोनीपत का सफरप्रारंभिक चरण में इस स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन को एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हरियाणा के जींद-सोनीपत रेल खंड पर संचालित किया जा रहा है। इस पूरे रूट की कुल लंबाई लगभग 89 किलोमीटर है। यह ट्रेन रोजाना जींद और सोनीपत के बीच दो फेरे (राउंड ट्रिप्स) पूरे करेगी, जिससे दिल्ली-एनसीआर और ग्रामीण हरियाणा के हजारों दैनिक यात्रियों को सीधा लाभ मिलेगा। यह मार्ग पूरी तरह से गैर-विद्युतीकृत या आंशिक रूप से जुड़े क्षेत्रों में हाइड्रोजन तकनीक की परिचालन क्षमता, विश्वसनीयता और सुरक्षा मानकों को परखने के लिए चुना गया है।

यात्रा के प्रमुख पड़ाव

अपनी यात्रा के दौरान यह ट्रेन गोहाना होते हुए गुजरेगी और मार्ग में पड़ने वाले सभी 12 मध्यवर्ती स्टेशनों और हॉल्ट्स पर रुकेगी, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख स्टेशन शामिल हैं-
जींद सिटी (Jind City), पांडू पिंडारा जंक्शन (Pandu Pindara Junction), ललित खेड़ा हॉल्ट (Lalit Khera Halt), भंभेवा (Bhambhewa), ईसापुर खेड़ी हॉल्ट (Isapur Kheri Halt), बुटाना हॉल्ट (Butana Halt), खंडराई हॉल्ट (Khandrai Halt), रभड़ा हॉल्ट (Rabrah Halt), लाठ हॉल्ट (Lath), मोहाना (Mohana), बरवासनी हॉल्ट (Barwasni Halt), सोनीपत न्यू (Sonipat New)।

बेजोड़ गति, क्षमता और तकनीकी विनिर्देश

रेलवे अनुसंधान, डिजाइन और मानक संगठन (RDSO) द्वारा तैयार किए गए कड़े मानकों के आधार पर निर्मित यह ट्रेन गति और क्षमता के मामले में भी पारंपरिक ट्रेनों को कड़ी टक्कर देती है। हालांकि इस ट्रेन का इंजन और संरचना 110 किमी/घंटा की अधिकतम गति से दौड़ने के लिए पूरी तरह सक्षम है, लेकिन सुरक्षा और शुरुआती परिचालन अनुभवों को देखते हुए इसे इस रूट पर 75 किमी/घंटा की नियंत्रित गति से चलाया जाएगा। वैश्विक स्तर पर चल रही अधिकांश हाइड्रोजन ट्रेनें महज 2 से 4 कोच की होती हैं।  इसके विपरीत, भारतीय रेलवे की यह ट्रेन 10 कोच के विशाल विन्यास के साथ तैयार की गई है, जिसमें 2 ड्राइविंग पावर कार (DPC) और 8 ट्रेलर पैसेंजर कोच शामिल हैं। इस भव्य ट्रेन में एक समय में 2,600 से अधिक यात्री आसानी से सफर कर सकते हैं, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी क्षमता वाली हाइड्रोजन ट्रेनों की श्रेणी में स्थापित करता है। औसत और पीक पावर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इसमें एक उन्नत लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरी बैंक भी लगाया गया है, जो फ्यूल सेल के साथ मिलकर ट्रेन को सुचारू और निरंतर ऊर्जा प्रदान करता है।

देश का पहला एकीकृत हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग इकोसिस्टम

हाइड्रोजन ट्रेन को सफलतापूर्वक चलाने के लिए केवल ट्रेन का निर्माण ही काफी नहीं था, बल्कि उसके ईंधन की निरंतर आपूर्ति के लिए एक सुरक्षित बुनियादी ढांचा तैयार करना भी एक बड़ी चुनौती थी। भारतीय रेलवे ने इस चुनौती को पार करते हुए हरियाणा के जींद में देश का सबसे बड़ा और पहला एकीकृत रेलवे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन स्थापित किया है। इस अत्याधुनिक प्लांट में ‘इलेक्ट्रोलेसिस’ (जल अपघटन) विधि के माध्यम से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करके शुद्ध ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन किया जा रहा है। उत्पादित हाइड्रोजन को विशाल टैंकों में सुरक्षित रूप से एकत्र किया जाता है और उच्च दबाव वाले कम्प्रेसर के जरिए इसे 500 बार (bar) तक संकुचित किया जाता है। ट्रेन में रीफ्यूलिंग के दौरान इस गैस को 350 बार के दबाव पर दो स्वतंत्र डिस्पेंसरों की मदद से ट्रेन की दोनों ड्राइविंग पावर कारों में एक साथ भरा जाता है, जिससे ट्रेन का ‘टर्नअराउंड समय’ (ईंधन भरने में लगने वाला समय) बेहद कम हो जाता है। इस रिफ्यूलिंग सेंटर की कुल भंडारण क्षमता लगभग 3,000 किलोग्राम कंप्रेस्ड हाइड्रोजन की है। इस पूरे बुनियादी ढांचे को पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) द्वारा कड़े परीक्षणों के बाद पूर्ण व्यावसायिक लाइसेंस प्रदान किया गया है।

सुरक्षा मानकों पर विशेष ध्यान

वैश्विक एजेंसियों की मुहरचूंकि हाइड्रोजन एक अत्यधिक ज्वलनशील और हल्की गैस है, इसलिए इस ट्रेन और रिफ्यूलिंग स्टेशन के निर्माण में सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया गया है। पूरी प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत NFPA-2 (नेशनल फायर प्रोटेक्शन एसोसिएशन) और ISO 19880 श्रृंखला के सुरक्षा मानकों के तहत डिजाइन किया गया है। ट्रेन के भीतर और रिफ्यूलिंग स्टेशन पर चौबीसों घंटे निगरानी रखने वाले अत्याधुनिक लीक डिटेक्टर्स और ऑटोमैटिक शट-ऑफ वाल्व लगाए गए हैं। यदि प्रणाली में कहीं भी हाइड्रोजन का आंशिक रिसाव भी होता है, तो सुरक्षा सेंसर तुरंत सक्रिय होकर ईंधन की आपूर्ति को रोक देंगे। इस पूरी तकनीक और परिचालन व्यवस्था का एक स्वतंत्र तीसरे पक्ष (Third-party) द्वारा कड़ा सुरक्षा मूल्यांकन जर्मनी की प्रसिद्ध तकनीकी निरीक्षण और प्रमाणन एजेंसी TÜV SÜD द्वारा किया गया है, जिसने इसके शत-प्रतिशत सुरक्षित होने का प्रमाणपत्र जारी किया है।

आम जनता के लिए तोहफा-प्लेटफॉर्म टिकट से भी सस्ता किराया

इस स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन की एक और सबसे बड़ी खूबी जो आम जनता के बीच भारी चर्चा का विषय बनी हुई है, वह है इसका बेहद किफायती और लोक-कल्याणकारी किराया ढांचा। पर्यावरण-अनुकूल और अत्याधुनिक वीआईपी सुविधाओं से लैस होने के बावजूद रेलवे ने इसके टिकट की शुरुआती कीमत मात्र ₹5 तय की है, जबकि अधिकतम किराया केवल ₹25 रखा गया है। यह किराया वर्तमान समय में कई रेलवे स्टेशनों पर मिलने वाले प्लेटफॉर्म टिकट (जो कि ₹10 तक होता है) से भी आधा है। सरकार का उद्देश्य इस सस्ती दर के जरिए समाज के हर वर्ग, विशेषकर गरीब और मध्यम वर्ग के दैनिक यात्रियों को इस हरित क्रांति का सीधा भागीदार बनाना है, ताकि वे बिना किसी आर्थिक बोझ के देश की सबसे आधुनिक और स्वच्छ परिवहन प्रणाली का लाभ उठा सकें।

‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ और भविष्य का रोडमैप

जींद से सोनीपत के बीच शुरू हुआ यह सफर भारतीय रेलवे के एक बहुत बड़े और महत्वाकांक्षी ब्लूप्रिंट का केवल पहला कदम है।  रेल मंत्रालय ने देश के सांस्कृतिक और प्राकृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ (Hydrogen for Heritage) मिशन की शुरुआत की है। इस दूरदर्शी परियोजना के अंतर्गत भारतीय रेलवे की योजना आने वाले समय में देश के विभिन्न पर्वतीय और ऐतिहासिक धरोहर मार्गों पर ऐसी ही 35 और हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की है। इन लक्षित मार्गों में मुख्य रूप से कालका-शिमला रेलवे, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, नीलगिरी माउंटेन रेलवे, कांगड़ा घाटी रेलवे और माथेरान हिल रेलवे जैसे संवेद्य और पर्यटन प्रधान रूट शामिल हैं, जहां डीजल इंजनों के धुएं से वहां के इकोसिस्टम को भारी नुकसान पहुंचता है। इन रूट्स पर हाइड्रोजन ट्रेनों के आ जाने से भारत वैश्विक स्तर पर इको-टूरिज्म का एक नया रोल मॉडल बनकर उभरेगा।

आत्मनिर्भर भारत और नेट-जीरो 2030 का विजन

समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह हाइड्रोजन ट्रेन ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प का एक जीता-जागता प्रतीक है। भारतीय इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और रेलवे बोर्ड के अथक प्रयासों से तैयार यह तकनीक यह साबित करती है कि भारत अब केवल वैश्विक तकनीकों का अनुकरण नहीं कर रहा, बल्कि दुनिया को पर्यावरण संरक्षण के नए रास्ते भी दिखा रहा है। भारतीय रेलवे ने पहले ही अपने ब्रॉड गेज नेटवर्क का 99% से अधिक विद्युतीकरण पूरा करके दुनिया का सबसे बड़ा हरित रेलवे नेटवर्क बनने का गौरव हासिल कर लिया है। अब गैर-विद्युतीकृत और दूरदराज के क्षेत्रों के लिए हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक को अपनाकर रेलवे अपने वर्ष 2030 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जक (Net-Zero Carbon Emitter) बनने के राष्ट्रीय लक्ष्य की ओर बेहद तेजी से कदम बढ़ा रहा है। आज का यह दिन निश्चित रूप से भारत की अवसंरचनात्मक क्रांति और पर्यावरण के प्रति उसकी वैश्विक प्रतिबद्धता के मेल का एक ऐतिहासिक शिखर है, जो आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, शांत और प्रदूषण मुक्त भविष्य सौंपने का वादा करता है।

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