नारायण के दरबार में करोड़ों का खेल: VIP दर्शन के नाम पर उगाही, आपस में भिड़े मंदिर समिति के दिग्गज

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बद्रीनाथ में VIP दर्शन शुल्क से 1.63 करोड़ की वसूली, नए विवादों का जन्म

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित भू-बैकुंठ श्री बद्रीनाथ धाम में मई-जून के पीक यात्रा सीजन के दौरान श्रद्धालुओं से वीआईपी दर्शन के नाम पर प्रति व्यक्ति ₹1,100 का अनधिकृत शुल्क वसूला गया। इस विशेष व्यवस्था के माध्यम से कुल ₹1.63 करोड़ की भारी-भरकम राशि एकत्र की गई। यह मामला तब एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक संकट में तब्दील हो गया जब बद्री-केदार मंदिर समिति (BKTC) के आंतरिक बोर्ड सदस्यों ने ही इस निर्णय की वैधानिकता पर सवाल उठाए। बिना बोर्ड अनुमोदन के शुल्क लगाने, चढ़ावे में वित्तीय हेराफेरी करने और वीआईपी मेहमानों के नाम पर फर्जी बिल बनाने जैसे गंभीर आरोपों ने मंदिर प्रबंधन की वित्तीय और संस्थागत पारदर्शिता को गंभीर रूप से कटघरे में खड़ा कर दिया है।

पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

वर्ष 2026 के मई और जून महीनों में बद्रीनाथ धाम में देश-विदेश से आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई। अत्यधिक भीड़ होने के कारण सामान्य दर्शनार्थियों को कतारों में कई घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा था।
ऐतिहासिक संदर्भ: श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अधिनियम, 1939 के तहत स्थापित नियमों के अनुसार, वीआईपी प्रोटोकॉल व्यवस्था हमेशा से पूरी तरह निःशुल्क और केवल राज्य के आधिकारिक मेहमानों, वृद्धों या विशिष्ट महानुभावों के लिए आरक्षित थी।
नियमों का उल्लंघन: 29 जून से मंदिर के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों ने बोर्ड की बिना किसी पूर्व सूचना या लिखित संकल्प के प्रति श्रद्धालु ₹1,100 लेकर एक ‘बैक डोर’ विशेष दर्शन व्यवस्था शुरू कर दी।
कुल संकलन: इस अनधिकृत प्रक्रिया के माध्यम से देखते ही देखते मात्र कुछ ही दिनों में ₹1.63 करोड़ की राशि श्रद्धालुओं से वसूल ली गई।

प्रशासनिक मतभेद और विरोधाभासी पक्ष

इस पूरे विवाद ने मंदिर समिति के भीतर चल रही गहरी प्रशासनिक खींचतान और अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया है। मुख्य रूप से दो विपरीत पक्ष सामने आए हैं-

मुख्य कार्याधिकारी (CEO) का आधिकारिक पक्ष

BKTC के मुख्य कार्याधिकारी सोहन सिंह रांगड़ ने इस शुल्क आधारित व्यवस्था का बचाव किया है। उनके तर्क निम्नलिखित हैं-
भीड़ नियंत्रण: यात्रा सीजन में अनियंत्रित तरीके से आने वाले वीआईपी और प्रोटोकॉल चाहने वाले लोगों की संख्या को सीमित करने के लिए आर्थिक अवरोध आवश्यक था।
दलालों पर नकेल: कुछ बाहरी तत्व और स्थानीय दलाल दिव्यांग या विशेष श्रेणियों का फर्जी फायदा उठाकर भोले-भाले श्रद्धालुओं से पैसे ऐंठ रहे थे। रसीद प्रणाली से इस पर रोक लगी।
वित्तीय पारदर्शिता: सीईओ का दावा है कि वसूले गए ₹1.63 करोड़ में से एक-एक पैसे की आधिकारिक रसीद काटी गई है और यह पूरी राशि सुरक्षित रूप से समिति के बैंक खाते में जमा है।

उपाध्यक्ष एवं बोर्ड सदस्यों का आरोप

BKTC के उपाध्यक्ष ऋषि प्रसाद सती और बोर्ड सदस्य किशोर पंवार ने इस कदम को पूरी तरह अवैध और तानाशाही करार दिया है। उनके अनुसार 1939 के अधिनियम के तहत किसी भी नए लेवी चार्ज, पूजा शुल्क या दर्शन शुल्क को लागू करने का अनन्य अधिकार केवल मंदिर समिति के पूर्ण बोर्ड के पास है।
बैठक में छुपाया गया: हाल ही में हुई बोर्ड बैठक में केवल कुछ विशेष पूजा शुल्कों में वृद्धि का प्रस्ताव पास हुआ था, लेकिन ₹1,100 के इस वीआईपी टिकट का कोई जिक्र तक नहीं किया गया।
आपातकालीन मार्ग की अनदेखी: बोर्ड सदस्यों का तर्क है कि यदि भीड़ नियंत्रण के लिए यह शुल्क बेहद जरूरी था, तो प्रबंधन एक आपातकालीन ऑनलाइन बैठक बुलाकर इसकी कानूनी स्वीकृति ले सकता था, जो कि नहीं किया गया।

दान और चढ़ावे में हेराफेरी

सोशल मीडिया पर भैरव सेना और मंदिर के हक-हकूकधारियों द्वारा कुछ गंभीर वीडियो और शिकायतें साझा की गईं, जिसमें मंदिर के दानपात्रों और चढ़ावे की गिनती में चोरी का आरोप लगाया गया। प्रारंभिक विभागीय जांच में यह पाया गया कि मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के कार्यालय से जुड़े निलंबित निजी सचिव (Personal Assistant) प्रमोद नौटियाल इस अवैध नेटवर्क के मुख्य सूत्रधार थे।

सीसीटीवी कैमरों का रहस्यमयी प्रतिस्थापन

दान चोरी के आरोपों के सार्वजनिक होने के ठीक कुछ दिन पहले मंदिर परिसर के भीतर लगे सभी 32 सीसीटीवी कैमरों को अचानक बदल दिया गया था। यद्यपि प्रशासन ने इसे किसी दानीदाता द्वारा उच्च-रिज़ॉल्यूशन कैमरे भेंट किए जाने की सामान्य प्रक्रिया बताया है, परंतु जांच एजेंसियां इसे पुराने डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर (DVR) के साक्ष्यों को मिटाने या उनके साथ छेड़छाड़ करने के प्रयास के कोण से भी देख रही हैं।

VIP मेहमानों के फर्जी आतिथ्य बिल

इस विवाद की कड़ियों को खंगालने पर एक और गंभीर वित्तीय हेरफेर सामने आया है। मंदिर समिति के विश्राम गृहों और भोजनालयों में कई राजनेताओं, जनप्रतिनिधियों और काल्पनिक वीआईपी मेहमानों के ठहरने तथा खानपान के लाखों रुपये के संदिग्ध बिल पास कराए गए। जब यह मामला खुला, तो कई वर्तमान जनप्रतिनिधियों ने लिखित बयान जारी कर स्पष्ट किया कि वे कभी उन तारीखों पर वहां ठहरे ही नहीं और जब भी आए, उन्होंने अपना व्यक्तिगत खर्च खुद वहन किया।

कानूनी एवं प्रशासनिक कार्रवाई

मामले की संवेदनशीलता और करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़े होने के कारण उत्तराखंड शासन और पुलिस प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई शुरू की है। मुख्य आरोपी प्रमोद नौटियाल को प्रथम दृष्टया दोषी पाते हुए तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर उसका मुख्यालय जोशीमठ संबद्ध कर दिया गया है। मंदिर अधिकारी युद्धवीर पुष्पवान की तहरीर पर बद्रीनाथ थाने में आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 306 (विश्वासघात) और 316(5) (लोक सेवक द्वारा आपराधिक न्यासभंग) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

उच्च स्तरीय जांच

मुख्यमंत्री के निर्देश पर शासन ने गढ़वाल कमिश्नर की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया है। इस समिति को सभी वित्तीय दस्तावेजों, रसीद बुक, बैंक खातों और सीसीटीवी फुटेज की गहन स्क्रूटनी कर 15 दिनों के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपने का आदेश दिया गया है।

सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक प्रभाव

इस विवाद का प्रभाव केवल प्रशासनिक गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
पुजारियों एवं स्थानीय समाज का विरोध: बद्रीनाथ धाम के मुख्य रावल (प्रधान पुजारी), डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत और तीर्थ पुरोहितों ने इस सशुल्क दर्शन व्यवस्था का तीखा विरोध किया है। उनका मानना है कि भगवान नारायण के दरबार में धन के आधार पर वर्गीकरण करना सदियों पुरानी सनातन परंपराओं और ‘समभाव’ के सिद्धांत के खिलाफ है।
अयोध्या से तुलना और राजनीतिक युद्ध: उत्तराखंड में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर राज्य की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। राजनीतिक विश्लेषक इसकी तुलना उत्तर प्रदेश के अयोध्या राम मंदिर में हाल ही में सामने आए कथित दान विवाद से कर रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि धार्मिक ट्रस्टों में चहेतों और राजनीतिक नियुक्तियों के कारण ही इस प्रकार की संस्थागत लूट को बढ़ावा मिल रहा है।
श्रद्धालुओं के विश्वास को ठेस: चारधाम यात्रा भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। इस प्रकार के घोटालों से उन गरीब और मध्यमवर्गीय श्रद्धालुओं के मन में गहरी निराशा पैदा होती है जो जीवनभर की जमा-पूंजी जोड़कर भगवान के दर्शन के लिए हफ्तों कतारों में खड़े रहते हैं।

सुधारात्मक अनुशंसाएं

बद्रीनाथ धाम में ₹1.63 करोड़ का वीआईपी दर्शन शुल्क संकलन कोई सामान्य लिपिकीय त्रुटि नहीं बल्कि एक गंभीर संस्थागत चूक है। भले ही यह राशि बैंक खाते में जमा हो, परंतु बिना विधायी या बोर्ड अनुमोदन के जनता से धन वसूलना ‘जबरन वसूली’ की श्रेणी में आता है। भावी प्रबंधन को पारदर्शी बनाने के लिए निम्नलिखित सुधारों को तुरंत लागू किया जाना चाहिए।
पूर्णतः डिजिटल फोरेंसिक ऑडिट: पिछले तीन वर्षों के दौरान मंदिर समिति के खातों, रसीदों और वीआईपी आतिथ्य पर हुए खर्च का एक स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) फर्म से फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए।
अभिकेंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया: भविष्य में किसी भी प्रकार के शुल्क निर्धारण के लिए बोर्ड की सहमति को ऑनलाइन पोर्टल पर सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जाए, ताकि “अंधेरे में फैसले” लेने की प्रवृत्ति पर रोक लग सके।
तकनीकी निगरानी: दानपात्रों की गिनती वाले कक्षों में सीधे लाइव स्ट्रीमिंग या राज्य सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) के सर्वर से जुड़े क्लाउड कैमरों का उपयोग किया जाए, ताकि स्थानीय स्तर पर सीसीटीवी रिकॉर्डिंग गायब करने का जोखिम समाप्त हो सके।

बद्रीनाथ-केदारनाथ धाम मंदिर समिति में छिड़ा विवाद

बद्रीनाथ धाम में वीआईपी दर्शन शुल्क से जुड़े ₹1.63 करोड़ के इस विवाद ने बद्री-केदार मंदिर समिति (BKTC) के आंतरिक मतभेदों और गुटबाजी को पूरी तरह सतह पर ला दिया है। समिति के शीर्ष पदाधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच इस मुद्दे पर खुलेआम तलवारें खिंच गई हैं। समिति के भीतर उभरे इस तीखे मतभेद के मुख्य आयाम निम्नलिखित हैं। उपाध्यक्ष बनाम मुख्य कार्याधिकारी (CEO)इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा टकराव नीति बनाम प्रशासन का है।

उपाध्यक्ष का आक्रामक रुख

BKTC के उपाध्यक्ष ऋषि प्रसाद सती ने सीधे तौर पर इस शुल्क व्यवस्था को अवैध घोषित कर दिया है। उनका साफ कहना है कि बोर्ड की बैठकों में इस प्रकार के किसी भी वीआईपी टिकट या शुल्क का प्रस्ताव कभी पेश ही नहीं किया गया। उन्होंने अधिकारियों पर तानाशाही रवैया अपनाने और बोर्ड को अंधेरे में रखने का गंभीर आरोप लगाया है।

सीईओ का प्रशासनिक बचाव

दूसरी ओर, समिति के मुख्य कार्याधिकारी (CEO) सोहन सिंह रांगड़ प्रशासनिक स्तर पर इस व्यवस्था को सही ठहरा रहे हैं। उनका तर्क है कि यह निर्णय किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि यात्रा सीजन में बेकाबू होती भीड़ को नियंत्रित करने और दलालों पर लगाम लगाने के लिए लिया गया था।

बोर्ड सदस्य बनाम अध्यक्ष कार्यालय

समिति के निर्वाचित और मनोनीत बोर्ड सदस्यों का गुस्सा सीधे तौर पर अध्यक्ष के करीबियों और उनके कामकाज के तरीके पर फूट रहा है।
अध्यक्ष के पीए पर कार्रवाई से आक्रोश: मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के निजी सचिव (PA) प्रमोद नौटियाल का नाम इस विवाद में मुख्य आरोपी के रूप में आने और उनके निलंबन के बाद बोर्ड के कई सदस्य असहज हैं।
समानान्तर सत्ता चलाने का आरोप: बोर्ड सदस्यों (जैसे किशोर पंवार) का आरोप है कि समिति के कुछ चुनिंदा अधिकारी और अध्यक्ष के करीबी कर्मचारी मिलकर एक समानान्तर व्यवस्था चला रहे थे, जो कि बोर्ड के अधिकारों का सीधा हनन है।

हक-हकूकधारी (तीर्थ पुरोहित) बनाम मंदिर प्रबंधन

मंदिर समिति के भीतर चल रहे इस घमासान में स्थानीय धार्मिक समाज और डिमरी पंचायत ने भी अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन: स्थानीय पुजारियों और हक-हकूकधारियों का मानना है कि अधिकारियों ने बिना बोर्ड और धार्मिक प्रतिनिधियों की सलाह के भगवान के दरबार में “पैसा लेकर पहले दर्शन” की जो व्यवस्था शुरू की, उसने बद्रीनाथ धाम की सदियों पुरानी सनातन परंपरा और मर्यादा को ठेस पहुंचाई है।
अधिकारियों को हटाने की मांग: मतभेदों के चलते अब स्थानीय स्तर पर उन प्रशासनिक अधिकारियों के इस्तीफे या तबादले की मांग उठने लगी है जो इस निर्णय में शामिल थे। इस आंतरिक खींचतान और उजागर होते मतभेदों को देखते हुए ही उत्तराखंड शासन को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि समिति के भीतर का यह विवाद सरकार की छवि को भी नुकसान पहुंचा रहा था। गढ़वाल कमिश्नर की अगुवाई में चल रही उच्च स्तरीय जांच अब इस बात का भी पता लगा रही है कि इस फाइल को आगे बढ़ाने के लिए समिति के किन-किन अधिकारियों ने मौखिक या लिखित सहमति दी थी।

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