आयुष्मान कार्ड से पैसे ऐंठने का खेल: सहमति पत्र पर फर्जी दस्तखत कर महिला को जबरन डाल दिया स्टेंट

The CSR Journal Magazine

फ्रैक्चर का इलाज कराने पहुंची महिला का डॉक्टर ने कर दिया दिल का ऑपरेशन! हुई मौत, जानें पूरा मामला

हरियाणा के पानीपत से चिकित्सा जगत को झकझोर देने वाला एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ एक निजी अस्पताल में सड़क हादसे में घायल महिला के पैर के फ्रैक्चर का इलाज करने के बजाय डॉक्टरों ने उसके दिल का ऑपरेशन (एंजियोप्लास्टी) कर स्टेंट डाल दिया, जिससे महिला की मौत हो गई। मृतका के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर बिना सहमति के ऑपरेशन करने, फर्जी हस्ताक्षर (जाली दस्तखत) करने और आयुष्मान कार्ड का गलत इस्तेमाल कर पैसे ऐंठने के बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। इस सनसनीखेज घटना के बाद परिजनों ने अस्पताल में जमकर हंगामा किया, जिसके बाद पुलिस ने अस्पताल के डॉक्टरों के खिलाफ धोखाधड़ी और लापरवाही से मौत का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

 इलाज में घोर लापरवाही या मेडिकल घोटाला?

यह पूरी दर्दनाक दास्तान 42 वर्षीय महिला गुड्डी देवी की है। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात (ग्राम काशीपुर, रसूलाबाद) के निवासी कुलदीप इन दिनों पानीपत के रमेश नगर में अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। कुलदीप ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में बताया कि उनकी माँ गुड्डी देवी एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गई थीं। इस हादसे में उनके पैर की हड्डी टूट (फ्रैक्चर) गई थी। परिजनों ने बेहतर इलाज की उम्मीद में उन्हें पानीपत के जीटी रोड स्थित प्रसिद्ध निजी अस्पताल ‘पार्क अस्पताल’ में भर्ती कराया। दाखिले के वक्त डॉक्टरों ने परिवार को ढांढस बंधाया था कि मामला केवल पैर की हड्डी का है, छोटा सा उपचार या सर्जरी होगी और महिला जल्द ही अपने पैरों पर खड़ी होकर सकुशल घर लौट आएंगी।

पैर का फ्रैक्चर और अचानक दिल का ऑपरेशन

घटनाक्रम में मोड़ अगले ही दिन आया, जिसने पूरे परिवार को उजाड़ कर रख दिया। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टरों ने उन्हें बिना कोई पूर्व सूचना दिए या बिना किसी परामर्श के गुड्डी देवी को सीधे कैथ लैब (OT) में शिफ्ट कर दिया। जब माँ को ऑपरेशन थिएटर से बाहर लाया गया, तो परिवार यह जानकर सन्न रह गया कि डॉक्टरों ने पैर का इलाज करने के बजाय उनके दिल का ऑपरेशन कर दिया है और दिल की नसों में स्टेंट डाल दिया है।मृतका के बेटे कुलदीप ने बताया, “मेरी माँ को कभी दिल की कोई बीमारी या तकलीफ नहीं थी। वह अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी हमसे फोन पर बिल्कुल सामान्य रूप से बात कर रही थीं और सिर्फ पैर के दर्द की शिकायत कर रही थीं।” परिजनों का सीधा आरोप है कि अस्पताल ने केवल और केवल आयुष्मान भारत योजना के तहत सरकारी फंड से पैसे ऐंठने के चक्कर में महिला के दिल का जबरन ऑपरेशन कर दिया।

फर्जी हस्ताक्षर और डराने-धमकाने का खेल

इस संदिग्ध ऑपरेशन के कुछ ही समय बाद महिला की तबीयत बिगड़ने लगी और आखिरकार इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। महिला की मौत की खबर मिलते ही परिजनों का गुस्सा फूट पड़ा। जब उन्होंने डॉक्टरों से बिना पूछे हार्ट सर्जरी करने का कारण पूछा और दस्तावेज मांगे, तो अस्पताल के काले कारनामे उजागर होने लगे।परिजनों ने देखा कि दिल के ऑपरेशन के लिए जो ‘सहमति पत्र’ (Consent Form) अनिवार्य होता है, उस पर परिवार के सदस्यों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे। जब उन्होंने इस फर्जीवाड़े पर अस्पताल प्रबंधन का घेराव किया, तो आरोप है कि डॉक्टरों और प्रबंधन ने अपनी गलती मानने के बजाय परिजनों को ही डराना और धमकाना शुरू कर दिया। परिजनों के अनुसार, अस्पताल प्रबंधन ने बेहद अहंकार में कहा कि “तुम्हें जो करना है कर लो, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”

अस्पताल प्रशासन की सफाई और दावे

इस पूरे मामले पर चौतरफा घिरने के बाद पार्क अस्पताल की सीईओ सपना और चिकित्सा प्रबंधन ने अपना पक्ष रखा है। अस्पताल प्रशासन ने चिकित्सा लापरवाही के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इस पूरी प्रक्रिया को ‘लाइफ-सेविंग’ करार दिया है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि पैर के ऑपरेशन से पहले मरीज की रुटीन कार्डियक फिटनेस जांच (Pre-Anaesthetic Check-up) की गई थी। जांच के दौरान महिला के दिल की धड़कन और ECG में कुछ गड़बड़ी पाई गई, जिसके बाद कार्डियोलॉजिस्ट ने उनकी एंजियोग्राफी की। एंजियोग्राफी में पता चला कि महिला के दिल की दो मुख्य नसें (Arteries) पूरी तरह ब्लॉक थीं। ऐसी गंभीर स्थिति में पैर की सर्जरी के लिए एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) देना मरीज की जान के लिए बेहद जोखिम भरा हो सकता था।

अस्पताल प्रशासन का दावा

अस्पताल की सीईओ का दावा है कि उन्होंने परिजनों को इस खतरे से अवगत कराया था और आयुष्मान भारत योजना के आधिकारिक पोर्टल से बकायदा मंजूरी मिलने के बाद ही कैथ लैब में स्टेंट डाला गया था। अस्पताल के मुताबिक, ऑपरेशन तो सफल रहा था, लेकिन बाद में गंभीर स्थिति के कारण मरीज को बचाया नहीं जा सका।

पुलिस की सख्त कार्रवाई: डॉक्टरों पर केस दर्ज

परिजनों के भारी हंगामे और लिखित शिकायत के बाद पानीपत की सेक्टर-29 थाना पुलिस तुरंत हरकत में आई। मामले की गंभीरता और प्रथम दृष्टया लापरवाही को देखते हुए पुलिस ने संबंधित डॉक्टरों और अस्पताल स्टाफ के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106 (लापरवाही से मौत का कारण बनना), धारा 318(4) (धोखाधड़ी) और धारा 351(2) (धमकी देना) के तहत मुकदमा (FIR) दर्ज कर लिया है।

 पोस्टमॉर्टम और मेडिकल बोर्ड पर टिकी नजरें

थाना प्रभारी (SHO) के अनुसार, पुलिस ने महिला के शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भिजवा दिया है। पुलिस अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि मौत के असली कारणों का खुलासा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से ही हो पाएगा।इसके साथ ही, पुलिस अस्पताल के सभी मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन की सीसीटीवी फुटेज, सहमति पत्र पर किए गए हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच और आयुष्मान कार्ड के ट्रांजैक्शन की गहनता से पड़ताल कर रही है। पुलिस इस मामले में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सिविल सर्जन के नेतृत्व में एक विशेष मेडिकल बोर्ड का गठन भी करवा सकती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या पैर के फ्रैक्चर के मरीज को तुरंत स्टेंट लगाना अनिवार्य था या यह केवल एक मेडिकल घोटाला था।

जनता में भारी आक्रोश

इस घटना ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और व्यापारिक मानसिकता पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों और नागरिक समाज ने सरकार से मांग की है कि आयुष्मान योजना के नाम पर मरीजों का शोषण करने वाले अस्पतालों के लाइसेंस तुरंत रद्द किए जाएं और दोषी डॉक्टरों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाए। फिलहाल, पूरा शहर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और पुलिस की अंतिम जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है ताकि पीड़ित परिवार को इंसाफ मिल सके।

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