ना PF नंबर, ना ही सैलरी स्लिप… चमचमाते नोएडा का काला चेहरा
उत्तर प्रदेश का नोएडा (Noida) देश के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में से एक है, जहाँ हजारों छोटी-बड़ी कंपनियाँ और फैक्ट्रियाँ स्थित हैं। इन इकाइयों का पहिया घुमाने वाले लाखों मजदूर आज कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। विकास की चमक के पीछे इन श्रमिकों की बदहाली एक कड़वा सच है, जहाँ कम वेतन और अत्यधिक काम उनके जीवन का हिस्सा बन गया है।
नोएडा के मज़दूरों की दुर्दशा
नोएडा की फैक्ट्रियों में काम करने वाले हजारों मज़दूर आज कल मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। यहाँ मुख्यत: कम वेतन, लंबी ड्यूटी और श्रम कानूनों की अनदेखी हो रही है। 10-12 घंटे की काम के बदले इन मज़दूरों को मात्र 10 से 10.5 हजार रुपये मिलते हैं। ये रकम इतनी कम है कि इससे परिवार का गुज़ारा करना भी मुश्किल हो जाता है। पीएफ और ईएसआई जैसी सुविधाएं केवल कागज़ों में ही हैं, असल में किसी भी मज़दूर को इसका फायदा नहीं मिलता।
भटकते मज़दूरों की कहानी
सुबह-सवेरे नोएडा के खोड़ा चौक पर मज़दूरों की भीड़ देखने को मिलती है। लोग दिहाड़ी के काम की तलाश में खड़े होते हैं, और कुछ को ही काम मिलता है। इस भीड़ के पीछे कई ऐसी कहानियाँ छिपी हैं, जो तकलीफ और संघर्ष से भरी हुई हैं। यहाँ से लोग ममूरा चौक, सेक्टर 63, 64, 65 की फैक्ट्रियों की तरफ भागते हैं, जबकि कुछ निराश होकर लौटते हैं।
श्रम कानूनों की अनदेखी
कागज़ों पर मज़दूरों का पीएफ कटता है और ईएसआई की योजनाएं हैं, लेकिन मज़दूरों को असल में कोई पे स्लिप नहीं मिलती। कानून के अनुसार मिलनी वाली सुविधाएं कागज़ों में ही हैं। नोएडा में कई लेबर इंस्पेक्टर मौजूद हैं, लेकिन उनकी नजरें अक्सर मज़दूरों की समस्याओं पर नहीं पड़तीं। फैक्ट्री मालिक किसी भी श्रम कानून का पालन नहीं करते हैं। यहां तक कि वेतन वृद्धि का कोई प्रामाणिक डेटा भी उपलब्ध नहीं है। कई मजदूरों को बिना किसी औपचारिक अनुबंध (Contract) के रखा जाता है, जिससे उन्हें कभी भी काम से निकाला जा सकता है। कार्यस्थलों पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण अक्सर छोटी-बड़ी दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। साथ ही, पीने के साफ पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी मजदूरों को संघर्ष करना पड़ता है।
सैलरी में कमी और परिवार का बोझ
प्रताप मिश्रा नाम के एक मज़दूर ने 2008 में नोएडा आकर काम शुरू किया। अब उन्हें 10,500 रुपये सैलरी मिलती है, लेकिन परिवार के खर्चे अब बढ़ गए हैं। बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया तथा राशन समेत हर चीज़ के लिए उनके पास पैसे कम पड़ते हैं। प्रताप की पत्नी भी काम करती हैं, ताकि घर चल सके। अधिकांश श्रमिकों को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन भी नहीं मिल पा रहा है। बढ़ती महंगाई के दौर में ₹10,000 से ₹12,000 की मासिक आय में परिवार का गुजारा करना लगभग असंभव हो गया है।
महंगे गैस सिलेंडर बने मुसीबत
मुहम्मद शमीम नाम के एक मज़दूर ने बताया कि उनकी सैलरी 12,500 रुपये है, लेकिन उन्हें कुशल मज़दूर का दर्जा नहीं मिलता। उनका परिवार खाना बनाने के लिए महंगी कुकिंग गैस का इस्तेमाल करता है जो अब 2500 रुपये में काला बाज़ार में मिलती है। गरीबी में गुजर-बसर करना बेहद कठिन हो गया है।
स्वास्थ्य की समस्याएं
नियम के अनुसार, औद्योगिक श्रमिकों का ‘कर्मचारी राज्य बीमा’ (ESI) कटना चाहिए, लेकिन कई कंपनियां रिकॉर्ड में हेराफेरी कर मजदूरों का पंजीकरण नहीं करातीं। जिन्हें कार्ड मिलता भी है, उन्हें अस्पतालों में लंबी कतारों, डॉक्टरों की कमी और दवाओं के अभाव का सामना करना पड़ता है। कम वेतन पाने वाले मजदूर नोएडा के महंगे प्राइवेट अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते। सरकारी अस्पतालों (जैसे जिला अस्पताल) पर दबाव इतना अधिक है कि गंभीर स्थिति में भी समय पर इलाज मिलना मुश्किल होता है। फैक्ट्रियों में धूल, रसायनों और खराब वेंटिलेशन के कारण मजदूरों को फेफड़ों की बीमारी, त्वचा रोग और कम उम्र में दृष्टि दोष जैसी समस्याएं हो रही हैं। सुरक्षा उपकरणों (Masks, Gloves) की कमी स्थिति को और बिगाड़ देती है। कई छोटी औद्योगिक इकाइयों में ‘फर्स्ट एड किट’ या प्राथमिक चिकित्सा की कोई व्यवस्था नहीं होती, जिससे मामूली चोट भी गंभीर संक्रमण का रूप ले लेती है।
सरकारी सुविधाओं के लिए भटकना
खोड़ा का क्षेत्र गाजियाबाद के अधीन है, जिससे यहाँ रहने वाले मज़दूरों को सरकारी सुविधाओं के लिए गाजियाबाद जाना पड़ता है। वहाँ की कलेक्ट्रेट तक पहुँचने में कम से कम 17 किमी की दूरी तय करनी होती है। यह स्थिति मज़दूरों के लिए बेहद कठिनाई भरी है, क्योंकि एक दिन की दिहाड़ी गंवानी पड़ती है। फैक्ट्रियों में मजदूरों से अक्सर 12-12 घंटे काम लिया जाता है। श्रम कानूनों के अनुसार 8 घंटे की ड्यूटी तय है, लेकिन इसका पालन कागजों तक ही सीमित है।
प्रदर्शन में दिखा मजदूरों का असंतोष
नोएडा के खोड़ा क्षेत्र में मज़दूरों की दुर्दशा एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। यहाँ काम करने वाले लोग बेहतर जीवन की तलाश में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन फिर भी उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। नोएडा के औद्योगिक विकास में मजदूरों का खून-पसीना शामिल है, लेकिन उनकी वर्तमान स्थिति चिंताजनक है। श्रम कानूनों की इस अनदेखी ने श्रमिकों में भारी असंतोष पैदा किया है, जो हाल के दिनों में विरोध प्रदर्शनों के रूप में भी सामने आया है। प्रशासन और सरकार को चाहिए कि वे श्रम कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें और मजदूरों के लिए न्यायसंगत वेतन व सुरक्षित कार्य वातावरण तैयार करें, ताकि विकास का लाभ समाज के निचले तबके तक पहुँच सके।
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