तिरुपति से शिरडी तक, कैसे काम करता है भारत के शीर्ष धार्मिक स्थलों का डोनेशन सिस्टम

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राम मंदिर विवाद के बीच चर्चा: भारत के किस मंदिर का डोनेशन सिस्टम है सबसे फुलप्रूफ?

हाल ही में राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर विवाद ने एक बार फिर देशभर में चर्चाओं को जन्म दिया है। अब सवाल ये उठ रहा है कि भारत के प्रमुख मंदिरों में चंदा कैसे सुरक्षित रखा जाता है। हर साल श्रद्धालु करोड़ों रुपये, सोना, चांदी और अन्य कीमती चीजें दान करते हैं। लेकिन, इन दानों की प्रक्रिया और सुरक्षा को लेकर क्या व्यवस्था है, यह जानना आवश्यक है।

कैसे बचाए जाते हैं करोड़ों रुपये?

अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं (लगभग ₹7 से ₹7.5 करोड़ की हेराफेरी) को लेकर हुए हालिया विवाद के बाद भारत में मंदिरों के चंदा और वित्तीय प्रबंधन पर बड़ी बहस छिड़ गई है। इस विवाद के तहत अब तक SIT जांच में बैंक कर्मचारियों और मंदिर स्टाफ सहित 8 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और ट्रस्ट के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने इस्तीफा भी दिया है।भारत में कई ऐसे बड़े और प्रतिष्ठित मंदिर हैं, जिनका चंदा प्रबंधन अत्यधिक पारदर्शी, आधुनिक और फुलप्रूफ माना जाता है, जिससे राम मंदिर ट्रस्ट भी अब सीख लेने की तैयारी कर रहा है। इनमें से तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (तिरुपति बालाजी) और श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट (शिरडी) का चंदा सिस्टम सबसे बेहतरीन और सुरक्षित माना जाता है।

तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD), आंध्र प्रदेश

सबसे उन्नत और फुलप्रूफ सिस्टमतिरुपति बालाजी मंदिर को प्रबंधन के मामले में दुनिया का सबसे व्यवस्थित धार्मिक संस्थान माना जाता है।
परमपदम डिजिटल ट्रैकिंग: मंदिर में ‘परमपदम’ नाम का एक हाई-टेक मैकेनिज्म है। हुंडी (दान पात्र) से लेकर बैंक लॉकर तक की यात्रा पूरी तरह से ट्रैक होती है।
द्वि-स्तरीय प्रमाणीकरण (Dual Authentication): पैसे गिनने वाले कमरों (परकामनी) में केवल चुनिंदा अधिकृत बैंक कर्मचारी और TTD के राजपत्रित अधिकारी ही जा सकते हैं। किसी भी एक व्यक्ति को अकेले पैसे छूने की अनुमति नहीं होती।
सीसीटीवी और बायोमेट्रिक कवच: गिनती कक्ष 360-डिग्री हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरों से लैस होते हैं, जिनकी लाइव मॉनिटरिंग सीधे मुख्य प्रशासनिक भवन और सुरक्षा विंग द्वारा की जाती है। प्रवेश केवल बायोमेट्रिक सत्यापन के जरिए होता है।
विशेष सुरक्षात्मक पोशाक: पैसे गिनने वाले कर्मचारियों को विशेष जेब-रहित (Pocket-less) एप्रन पहनने होते हैं ताकि कोई भी व्यक्ति नकदी या कीमती सामान छिपाकर बाहर न ले जा सके।
डिजिटल और ई-हुंडी: TTD ने बड़े पैमाने पर ‘ई-हुंडी’ (ऑनलाइन ट्रांसफर) को बढ़ावा दिया है, जिससे नकदी का प्रबंधन और आसान हो जाता है।

श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट, शिरडी

पारदर्शी और आधुनिक ऑडिटिंग: शिरडी साईं बाबा मंदिर में सालाना ₹600 करोड़ से अधिक का भारी-भरकम चढ़ावा आता है। इसके बावजूद यहाँ वित्तीय गड़बड़ी की गुंजाइश न के बराबर होती है।
लाइव काउंटिंग ब्रॉडकास्ट: शिरडी में दान पात्रों से पैसे निकालने और उनकी गिनती की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होती है। सीसीटीवी कैमरों की कड़ी निगरानी में गिनती की जाती है, जिसका रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाता है।
त्रैमासिक और बाहरी ऑडिट (External Audit): ट्रस्ट के खातों का हर तिमाही (Quarterly) एक प्रतिष्ठित थर्ड-पार्टी चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्म द्वारा कड़ा वित्तीय ऑडिट किया जाता है।
राष्ट्रीयकृत बैंकों के साथ गठजोड़: दान पेटियों को खोलने और नकदी को छांटने के काम में सीधे राष्ट्रीयकृत बैंकों (जैसे SBI या बैंक ऑफ बड़ौदा) के अधिकारी शामिल होते हैं और गिनती समाप्त होते ही राशि तुरंत बैंक खाते में जमा कर दी जाती है।

माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (SMVDSB), जम्मू-कश्मीर

प्रशासनिक पारदर्शिता: जम्मू स्थित माता वैष्णो देवी मंदिर में सालाना ₹500 करोड़ से अधिक का दान आता है।
सरकारी और प्रशासनिक नियंत्रण: इस बोर्ड के अध्यक्ष राज्य के उपराज्यपाल (LG) होते हैं और इसमें वरिष्ठ आईएएस (IAS) अधिकारी मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप में काम करते हैं। प्रशासनिक ढांचा होने के कारण यहाँ कॉर्पोरेट स्तर की जवाबदेही होती है।
कम्प्यूटरीकृत रसीद प्रणाली: काउंटर पर मिलने वाले हर एक रुपये के दान के लिए तत्काल कम्प्यूटरीकृत बारकोडेड रसीद दी जाती है। सोने-चांदी के सिक्कों और आभूषणों को पिघलाने और उनकी शुद्धता जांचने के लिए एक बेहद पारदर्शी ‘इन-हाउस’ सरकारी टकसाल जैसी व्यवस्था है।

श्री सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट, मुंबई

पूर्ण डिजिटल मॉडल: मुंबई का यह ऐतिहासिक मंदिर वित्तीय पारदर्शिता के लिए तकनीक का बेहतरीन उपयोग करता है।
कैशलेस डोनेशन पर जोर: सिद्धिविनायक मंदिर ने क्यूआर कोड, पीओएस (POS) मशीनें, आधिकारिक ऐप और वेबसाइट के माध्यम से सीधे बैंक ट्रांसफर को प्राथमिकता दी है ताकि नकदी का भौतिक प्रबंधन कम से कम करना पड़े।
रियल-टाइम डैशबोर्ड: ट्रस्ट के पास एक आंतरिक रियल-टाइम डैशबोर्ड है, जो दिन भर के कुल डिजिटल और फिजिकल चढ़ावे को ट्रैक करता है, जिससे शाम को विसंगतियों का तुरंत पता चल जाता है।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी

ओपन-काउंटिंग’ और प्रशासनिक पारदर्शिता: काशी विश्वनाथ धाम में दान की पूरी प्रक्रिया को बेहद पारदर्शी और सार्वजनिक बनाया गया है। यहाँ का चंदा सिस्टम इस प्रकार काम करता है।
खुले में लाइव काउंटिंग (Open-Air Counting): काशी विश्वनाथ में दान पेटियों (हुंडियों) से निकले पैसे को किसी बंद कमरे के बजाय मंदिर परिसर के भीतर ही सत्यनारायण मंदिर के पास खुले प्रांगण में सबके सामने गिना जाता है। कोई भी आम श्रद्धालु वहाँ से गुजरते हुए इस प्रक्रिया को देख सकता है।
त्रि-स्तरीय प्रशासनिक निगरानी: मंदिर की दान पेटियों को सप्ताह में दो बार (नियमित रूप से मंगलवार और शुक्रवार) खोला जाता है। यह काम सीधे एक सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (SDM) / राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer), बैंक अधिकारियों और एक स्वतंत्र सेवानिवृत्त प्रथम श्रेणी अधिकारी की प्रत्यक्ष उपस्थिति में होता है।
सीसीटीवी और वीडियोग्राफी: पूरी छंटाई और गणना प्रक्रिया निरंतर हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरों के सीधे कवरेज में होती है।
वरिष्ठ नागरिक स्वयंसेवक: पैसे की छंटाई (सिक्के और नोट अलग करना) के काम में मंदिर न्यास के साथ ‘मुमुक्षु भवन’ और ‘काशी निवास’ में रहने वाली लगभग 20 से 25 सम्मानित बुजुर्ग महिलाएं स्वयंसेवक के रूप में मदद करती हैं, जिससे पारदर्शिता और सामाजिक सहभागिता बनी रहती है।
गहनों और सोने का मूल्यांकन: हुंडी से निकलने वाले सोने-चांदी या कीमती आभूषणों की शुद्धता को प्रमाणित मूल्यांकनकर्ताओं (Evaluators) द्वारा जांचा जाता है, जिसके बाद उन्हें सीधे सरकारी ट्रेजरी (सरकारी खजाने) में सुरक्षित रखवा दिया जाता है।
मजबूत डिजिटल ऑडिट: ऑनलाइन चंदा सीधे श्री काशी विश्वनाथ ऑफिशियल वेब पोर्टल के माध्यम से सीधे ट्रस्ट के बैंक खाते में जाता है। बैंक कर्मचारी मौके पर ही फिजिकल कैश को लेजर रजिस्टर में दर्ज कर तुरंत बैंक में जमा करते हैं और उसकी ऑडिट ट्रेल (Audit Trail) बनाई जाती है।

श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन

नो-पॉकेट’ ड्रेस और सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल: उज्जैन के महाकाल मंदिर में महाकाल लोक बनने के बाद से चढ़ावा रिकॉर्ड स्तर (सालाना ₹140 करोड़ से अधिक) पर पहुंच गया है। यहाँ सुरक्षा और हेराफेरी रोकने के लिए बेहद सख्त नियम हैं।
पॉकेटलेस एप्रन (बिना जेब के कपड़े) नियम: साल 2018 में हुई एक छोटी घटना के बाद मंदिर प्रशासन ने कड़ा नियम बनाया था। दान पेटियों से नकदी गिनने वाले कमरे (Counting Room) में प्रवेश करने वाले प्रत्येक कर्मचारी को बिना जेब वाले विशेष कपड़े पहनने होते हैं या उनकी जेबों को पूरी तरह सिलकर बंद कर दिया जाता है।
अग्रणी राष्ट्रीयकृत बैंकों का रोटेशन: महाकाल मंदिर की 40 से अधिक दान पेटियों को खाली करने और नकदी गिनने की जिम्मेदारी रोटेशन के आधार पर देश के बड़े राष्ट्रीयकृत व निजी बैंकों (जैसे SBI, HDFC, और Bank of India) के प्रबंधकों और स्टाफ को सौंपी गई है।
कंट्रोल रूम से लाइव निगरानी: गिनती कक्ष पूरी तरह से अभेद्य सुरक्षा घेरे में होता है। 360-डिग्री कैमरों से इसकी लाइव वीडियोग्राफी सीधे मंदिर के मुख्य कंट्रोल रूम और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा मॉनिटर की जाती है।
डिजिटल रसीद और सरकारी एक्ट: श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति ‘मध्य प्रदेश श्री महाकालेश्वर मंदिर अधिनियम 1982’ के तहत काम करती है। इसका पूरा नेतृत्व कलेक्टर और प्रशासनिक अधिकारी करते हैं। काउंटर पर मिलने वाले हर नकद दान की तत्काल कम्प्यूटरीकृत रसीद कटती है और ऑनलाइन चंदा सीधे सरकारी समिति के अधिकृत खाते में लॉक होता है।

राम मंदिर सिस्टम में क्या बदलाव होने जा रहे हैं?

हालिया विवाद (चोरी के खुलासे के बाद जहां अब प्रतिदिन का चढ़ावा बढ़कर ₹22-24 लाख हो गया है) को देखते हुए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अपने पूरे प्रबंधन मॉडल में अमूलचूल परिवर्तन करने जा रहा है-
सीईओ (CEO) की नियुक्ति: मंदिर के वित्तीय और दैनिक कार्यों को संभालने के लिए एक पेशेवर प्रशासनिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किया जाएगा।
पॉकेटलेस एप्रन व्यवस्था: तिरुपति की तर्ज पर अब राम मंदिर में भी दानपेटियों की गिनती करने वाली 14 लोगों की टीम (जिसमें बैंक कर्मचारी शामिल हैं) के लिए जेब-रहित पोशाक और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल अनिवार्य किए जा रहे हैं।

ज़रूरत है सुरक्षा और पारदर्शिता की

इन सभी मंदिरों के चढ़ावे के प्रबंधन में पारदर्शिता और सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है। चाहे तिरुपति बालाजी हो या शिरडी साईं बाबा, हर मंदिर ने अपनी व्यवस्था को बेहतर बनाने की कोशिश की है। अब सबकी नजर उन उपायों पर है, जो श्रद्धालुओं के चढ़ावे को सुरक्षित रखने में मदद करेंगे।

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