कचरे से कमाल! प्लास्टिक वेस्ट से बनेंगे 3D प्रिंटेड कृत्रिम अंग और एयरोस्पेस पार्ट्स, NIT राउरकेला की बड़ी खोज

The CSR Journal Magazine
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक कचरे को रिसाइकिल करके 3D प्रिंटिंग के लिए उपयोगी फिलामेंट बनाने वाला एक खास एक्सट्रूडर सिस्टम विकसित किया है। खास बात यह है कि यह सिस्टम पोर्टेबल होने के साथ-साथ कम लागत में तैयार किया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस सिस्टम को तैयार करने में करीब 45 हजार रुपये खर्च हुए हैं। इसमें एक्सट्रूडर के साथ आधुनिक कूलिंग सिस्टम और तापमान को नियंत्रित करने की व्यवस्था भी है। इसका उद्देश्य प्लास्टिक कचरे से ऐसा फिलामेंट तैयार करना है, जिससे मजबूत और टिकाऊ 3D प्रिंटेड उत्पाद बनाए जा सकें।

30 जुलाई को मिला पेटेंट

NIT राउरकेला की इस तकनीक को अब आधिकारिक पहचान भी मिल चुकी है। शोध टीम को 30 जुलाई 2026 को इसका पेटेंट मिला है। इसका पेटेंट नंबर 202431068691 है। इस प्रोजेक्ट के पीछे मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संध्यारानी बिस्वास, केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर सुजीत सेन और उनकी रिसर्च टीम का योगदान है। टीम में जगदीश उदय खाटू, हिमांशु सिंह और किरण सुना शामिल हैं।

कृत्रिम अंग से लेकर एयरोस्पेस तक होगा इस्तेमाल

इस तकनीक से तैयार मजबूत फिलामेंट का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। ऑटोमोबाइल और एयरोस्पेस सेक्टर में जरूरत के हिसाब से अलग-अलग पार्ट्स तैयार करने में यह तकनीक उपयोगी हो सकती है। इलेक्ट्रॉनिक्स और रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले उत्पादों के निर्माण में भी इसका इस्तेमाल संभव है। मेडिकल क्षेत्र में भी इसका बड़ा फायदा हो सकता है। इससे मरीजों की जरूरत के अनुसार कृत्रिम अंग (प्रोस्थेटिक्स), ऑर्थोटिक्स, डेंटल मॉडल और मेडिकल स्कैफोल्ड्स जैसे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। 3D प्रिंटिंग की मदद से किसी व्यक्ति की जरूरत के हिसाब से डिजाइन तैयार करना भी आसान हो सकता है।

कम लागत और प्लास्टिक कचरे का दोबारा इस्तेमाल

इस खोज की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत और प्लास्टिक कचरे का दोबारा इस्तेमाल है। आम तौर पर अच्छी गुणवत्ता वाले 3D प्रिंटिंग फिलामेंट के लिए नए प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में रिसाइकिल किए गए प्लास्टिक से मजबूत फिलामेंट तैयार करने की तकनीक लागत कम करने के साथ कचरा प्रबंधन में भी मदद कर सकती है। डॉ. संध्यारानी बिस्वास के अनुसार, इस सिस्टम से तैयार फिलामेंट से बनने वाले उत्पादों में अच्छी यांत्रिक मजबूती हासिल की जा सकती है। वहीं प्रोफेसर सुजीत सेन का कहना है कि यह तकनीक प्लास्टिक कचरे को दोबारा उपयोगी उत्पाद बनाने में मदद करेगी और चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकती है।

प्लास्टिक कचरे का बदलेगा भविष्य

NIT राउरकेला की यह खोज सिर्फ 3D प्रिंटिंग को सस्ता बनाने की कोशिश नहीं है, बल्कि प्लास्टिक कचरे के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में भी अहम कदम है। अगर तकनीक को बड़े स्तर पर सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जाता है, तो आने वाले समय में कचरे से मेडिकल मॉडल, ऑटो पार्ट्स और कई तरह के 3D प्रिंटेड उत्पाद तैयार करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि एयरोस्पेस और मेडिकल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इस्तेमाल से पहले जरूरी गुणवत्ता और सुरक्षा परीक्षण बेहद अहम होंगे।

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