ईरान-अमेरिका MoU पर बोले खामेनेई: राष्ट्रपति ट्रंप की बेकरारी के कारण हुआ समझौता, शर्तों का उल्लंघन हुआ तो डील होगी रद्द

The CSR Journal Magazine

ईरान के खामेनेई का बड़ा बयान, ट्रंप ने अमेरिका की मजबूरी से किया समझौता

अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर होने के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई का पहला बड़ा बयान सामने आया है। खामेनेई ने साफ शब्दों में कहा है कि यह समझौता ईरान की किसी आंतरिक इच्छा या उत्सुकता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बनाए गए भारी दबाव और उनकी बेकरारी का नतीजा है।

यह हमारी इच्छा नहीं, अमेरिका की बेकरारी का नतीजा’- अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर बोले सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई

अमेरिका और ईरान के बीच खाड़ी क्षेत्र में चल रहे 110 दिनों के भीषण संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक ऐतिहासिक ‘इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ (MoU) पर डिजिटल हस्ताक्षर किए गए हैं। इस बेहद संवेदनशील और बड़े समझौते के लागू होते ही ईरान के सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने देश के नाम एक लिखित संदेश जारी किया है। इस संदेश में उन्होंने साफ किया कि वे इस समझौते के पक्ष में नहीं थे और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील को अमली जामा पहनाने के लिए हर तरह के हथकंडों और दबाव का इस्तेमाल किया।

‘राष्ट्रपति पेजेश्कियान के आश्वासन पर दी मंजूरी’

ईरानी सरकारी टेलीविजन पर पढ़े गए अपने संदेश में सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने खुलासा किया कि इस समझौते को लेकर उनका सैद्धांतिक दृष्टिकोण बिल्कुल अलग था। उन्होंने कहा:”सैद्धांतिक रूप से इस समझौता ज्ञापन (MoU) को लेकर मेरा अलग मत था। लेकिन ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान (जो सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष भी हैं) और परिषद के अन्य सदस्यों ने मुझे देश के अधिकारों व ‘प्रतिरोध के मोर्चे’ (Resistance Front) के हितों की रक्षा करने का पूरा आश्वासन दिया। उनके इस दायित्व को स्वीकार करने के बाद ही मैंने समझौते को अपनी अनुमति दी है।”

ट्रंप का बेताब रवैया

खामेनेई ने आरोप लगाया कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान डील के लिए बेकरारी दिखाई है। खामेनेई ने अमेरिकी प्रशासन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अत्यधिक बेचैनी और हताशा में थे, जिसके कारण उन्होंने ईरान को वार्ता की मेज पर लाने के लिए हर तरह के दबाव (leverage) का सहारा लिया। उनका कहना है कि अमेरिका ने कई रणनीतियाँ अपनाई हैं ताकि वह ईरान के साथ एक सफल समझौता कर सके। ऐसी स्थिति में ईरान ने अपने हितों की सुरक्षा के लिए सक्रिय कदम उठाने का निर्णय लिया।

समझौते का महत्व

इस समझौते की पुष्टि के साथ ही खामेनेई ने यह भी बताया कि यह कदम ईरान की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक था। उन्होंने कहा कि ईरान ने अपनी अखंडता और संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए ही यह फैसला लिया है। इससे ईरान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति में सुधार होने की संभावना है।

नौसैनिक नाकेबंदी हटी, 60 दिनों का ‘डिस्कशन पीरियड’ शुरू

समझौते की शर्तों के जमीन पर उतरने के साथ ही अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर लगाई गई अपनी सख्त नौसैनिक नाकेबंदी (Naval Blockade) को पूरी तरह से हटा लिया है। इस शांति समझौते के साथ ही दोनों देशों के बीच औपचारिक रूप से 60 दिनों का एक ‘डिस्कशन पीरियड’ (चर्चा का दौर) शुरू हो चुका है। इस 60 दिनों की समयावधि के भीतर दो सबसे बड़े और संवेदनशील मुद्दों पर अंतिम फैसला होना है- ईरान पर लगे आर्थिक और कड़े प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना, और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादित मामलों का स्थायी हल निकालना। ईरान के विदेश मंत्रालय ने संकेत दिया है कि यदि यह वार्ता 60 दिन के बजाय 30 दिनों में ही किसी ठोस नतीजे पर पहुंच जाती है, तो यह दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और वैश्विक बाजार के लिए बेहद फायदेमंद होगा।

‘भविष्य की वार्ता का मतलब आत्मसमर्पण नहीं’

सुप्रीम लीडर खामेनेई ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि आने वाले दिनों में होने वाली आमने-सामने की वार्ताओं का मतलब यह कतई नहीं है कि ईरान दुश्मन के दृष्टिकोण या उसकी नाजायज मांगों के आगे झुक गया है। उन्होंने साफ किया कि यदि अमेरिकी पक्ष ने अपनी लालची फितरत दिखाई या समझौते से इतर अत्यधिक मांगें (Excessive Demands) रखने की कोशिश की, तो ईरान इस समझौते को तुरंत खारिज कर देगा और इसे आगे स्वीकार नहीं किया जाएगा।

वैश्विक प्रभाव और इजरायल की प्रतिक्रिया

इस समझौते को फ्रांस के वर्साय पैलेस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के समापन के बाद एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश किया गया। जहां एक तरफ ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघर गालिबाफ इसे ईरान की कूटनीतिक जीत और अमेरिकी ‘मैक्सिमम प्रेशर’ रणनीति की विफलता बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इजरायल इस पूरी डील से बेहद नाराज और असहज नजर आ रहा है। इजरायल को इस समझौते की शर्तों पर बिल्कुल भरोसा नहीं है और कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि इस समझौते की टेबल से इजरायल को पूरी तरह दूर रखा गया था।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं

ईरान के इस कदम के बाद विभिन्न देशों द्वारा प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गई हैं। जबकि कुछ देशों ने ईरान के निर्णय का स्वागत किया है, वहीं कुछ ने इसे अमेरिका के सामने झुकाव के रूप में देखा है। इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया मोड़ आने के आसार हैं। खामेनेई ने अपने बयान में यह भी कहा कि ईरान हमेशा बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन उनकी प्राथमिकता अपने देश के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि किसी भी समझौते में ईरान की संप्रभुता को खतरा नहीं होना चाहिए।

आगे का रास्ता

इस समझौते के पश्चात, विश्व की निगाहें ईरान के अगले कदमों पर होंगी। आंतरिक और बाह्य दोनों ही मोर्चों पर ईरान की प्रदर्शन क्षमता देखी जाएगी। खामेनेई का यह बयान बताता है कि भविष्य में ईरान अपने निर्णयों में और अधिक सावधानी बरतेगा और सभी संभावनाओं पर विचार करेगा। फिलहाल, इस समझौते ने पूरी दुनिया को बड़ी आर्थिक राहत दी है, विशेष रूप से ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) के दोबारा सुरक्षित खुलने से वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापारिक जहाजों का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन खामेनेई के इस कड़े बयान ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले 60 दिन अमेरिका और ईरान के रिश्तों के लिए बेहद नाजुक होने वाले हैं।

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