डिजिटल दौर में भी सिक्कों का ‘गोल्ड बिजनेस’! कांवड़ पथ पर ₹100 के नोट से हो रही दोगुनी कमाई

The CSR Journal Magazine
देशभर में डिजिटल भुगतान का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन बिहार के बांका जिले में सावन के दौरान कांवड़ यात्रा एक अलग ही आर्थिक तस्वीर पेश कर रही है। अजगैवीनाथ धाम से बाबाधाम तक जाने वाले कांवड़िया पथ पर इन दिनों सिक्कों की मांग इतनी बढ़ गई है कि इसे आधार बनाकर कई युवाओं ने अनोखा रोजगार शुरू कर दिया है। यहां नोट के बदले सिक्के बदलने का कारोबार न केवल तेजी से चल रहा है, बल्कि इससे अच्छी कमाई भी हो रही है।

दान की परंपरा से बनी सिक्कों की मांग

कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु रास्ते में बैठे जरूरतमंदों, दिव्यांगों, भिखारियों, साधु-संतों, सपेरों, बसहा बैल वाले कलाकारों और धार्मिक झांकियों के पास दान स्वरूप सिक्के चढ़ाते हैं। यही वजह है कि यात्रा शुरू करने से पहले अधिकांश कांवड़िए अपने साथ एक, दो, पांच और दस रुपये के सिक्कों का संग्रह रखते हैं, ताकि रास्ते में दान देने में किसी तरह की परेशानी न हो।
यात्रा मार्ग पर यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसका पालन करते हैं। इसी वजह से कांवड़िया पथ पर खुले सिक्कों की मांग लगातार बनी रहती है।

नोट के बदले सिक्के, फिर सिक्कों के बदले नोट

कांवड़ मार्ग पर कई स्थानों पर युवाओं ने अस्थायी टेबल लगाकर सिक्के बदलने की व्यवस्था की है। यहां कांवड़िए नोट देकर छोटे मूल्य के सिक्के लेते हैं। मांग अधिक होने के कारण कई बार 100 रुपये के बदले उन्हें केवल 90 से 95 रुपये मूल्य के सिक्के ही मिल पाते हैं।
दूसरी ओर, दिनभर दान में मिले यही सिक्के शाम तक भिखारी, पुजारी, सपेरे और अन्य लोग इन दुकानों पर वापस लाकर नोट में बदलवा लेते हैं। बताया जाता है कि दुकानदार इन सिक्कों के बदले 100 रुपये का नोट देने से पहले अपने हिसाब से राशि समायोजित करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया से एक ही सिक्का दिन में दो बार लेन-देन का माध्यम बनता है और दुकानदारों को प्रत्येक सौ रुपये पर अतिरिक्त कमाई का अवसर मिल जाता है।

सावन में कई युवाओं को मिल रहा मौसमी रोजगार

स्थानीय लोगों के अनुसार, सावन मेले के दौरान यह कारोबार कई युवाओं के लिए मौसमी रोजगार का साधन बन जाता है। कांवड़िया पथ पर जगह-जगह सिक्के बदलने वाले अस्थायी काउंटर दिखाई देते हैं, जहां पूरे दिन श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है।
डिजिटल भुगतान के इस दौर में जहां सामान्य बाजारों में सिक्कों का उपयोग लगातार घट रहा है, वहीं कांवड़ यात्रा की धार्मिक परंपरा ने इन्हें फिर से अहम बना दिया है। इससे यह साफ होता है कि आस्था और परंपरा से जुड़े आयोजनों में आज भी नकद और विशेष रूप से सिक्कों की अपनी अलग उपयोगिता बनी हुई है।

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