भारत की AI दौड़ में पानी बना सबसे बड़ा सवाल, डेटा सेंटर बढ़े तो बिजली-जमीन-जल संकट भी बढ़ेगा

The CSR Journal Magazine

थाने से विशाखापत्तनम तक उठने लगी आवाजें, हजारों करोड़ की AI परियोजनाओं के बीच संसाधनों पर दबाव की चिंता; सरकार और कंपनियां बता रहीं आधुनिक कूलिंग तकनीक को समाधान

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को भारत की डिजिटल और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं का अगला बड़ा इंजन माना जा रहा है। देश में बड़े पैमाने पर AI मॉडल विकसित करने, क्लाउड कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने और वैश्विक कंपनियों को भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए आकर्षित करने की कोशिश तेज हो चुकी है। लेकिन AI की इस दौड़ के पीछे एक ऐसा बुनियादी सवाल खड़ा हो रहा है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज करना मुश्किल होगा—इन विशाल डेटा सेंटरों को चलाने के लिए पानी, बिजली और जमीन कहां से आएगी? AI जितना डिजिटल दिखाई देता है, उसके पीछे का बुनियादी ढांचा उतना ही भौतिक है। विशाल सर्वर, हजारों GPU, लगातार चलने वाली मशीनें, अत्यधिक बिजली की जरूरत और सर्वरों से निकलने वाली गर्मी को नियंत्रित करने के लिए कूलिंग सिस्टम—इन सबके लिए बड़े पैमाने पर संसाधनों की आवश्यकता होती है। भारत में डेटा सेंटर क्षमता तेजी से बढ़ रही है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार देश में डेटा सेंटर क्षमता वर्ष 2020 के लगभग 375 मेगावाट से बढ़कर 2025 में करीब 1,500 मेगावाट हो गई। सरकार का अनुमान है कि डेटा सेंटर क्षेत्र के विस्तार और AI की बढ़ती मांग के चलते वर्ष 2031-32 तक बिजली की मांग लगभग 13.56 गीगावाट तक पहुंच सकती है। यानी AI की कहानी केवल कंप्यूटर और इंटरनेट की कहानी नहीं है। यह आने वाले वर्षों में पानी और ऊर्जा की कहानी भी बनने जा रही है।

क्यों बढ़ रही है डेटा सेंटर की मांग?

AI मॉडल को प्रशिक्षित करने और उन्हें चलाने के लिए सामान्य कंप्यूटिंग की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली प्रोसेसर और GPU की जरूरत होती है। एक बड़े AI डेटा सेंटर में हजारों हाई-परफॉर्मेंस चिप्स लगातार काम कर सकते हैं। हर GPU बिजली खाता है और बिजली का बड़ा हिस्सा अंततः गर्मी में बदलता है। इस गर्मी को लगातार बाहर निकालना जरूरी होता है। यदि सर्वर का तापमान नियंत्रित नहीं किया गया तो उपकरणों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और महंगे हार्डवेयर को नुकसान भी हो सकता है। यही वजह है कि डेटा सेंटरों में कूलिंग सिस्टम सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में शामिल होता है। कूलिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक के आधार पर पानी की जरूरत काफी बदल सकती है। पारंपरिक evaporative या water-intensive cooling में पानी की खपत ज्यादा हो सकती है, जबकि direct-to-chip liquid cooling, immersion cooling और अन्य आधुनिक तकनीकें पानी की जरूरत को कम कर सकती हैं। केंद्र सरकार ने भी संसद में बताया है कि डेटा सेंटरों की पानी की जरूरत उनके इस्तेमाल किए जाने वाले cooling technology पर निर्भर करती है और उद्योग water consumption कम करने के लिए direct-to-chip liquid cooling, adiabatic cooling तथा immersion cooling जैसी तकनीकों को अपना रहा है।

विशाखापत्तनम बना सबसे बड़ा उदाहरण

भारत की AI महत्वाकांक्षा में विशाखापत्तनम यानी Vizag तेजी से एक बड़े डेटा सेंटर हब के रूप में उभर रहा है। Google ने AdaniConneX और Nxtra by Airtel के साथ मिलकर विशाखापत्तनम में gigawatt-scale AI infrastructure विकसित करने की योजना पर काम शुरू किया है। Google ने अप्रैल 2026 में इस परियोजना की आधारशिला रखी थी। इसके अलावा क्षेत्र में अन्य बड़े डेटा सेंटर प्रस्ताव भी सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश सरकार ने विशाखापत्तनम और आसपास के इलाके को AI और डेटा सेंटर हब के रूप में विकसित करने के लिए लगभग 6 GW क्षमता का लक्ष्य रखा है। लेकिन इसी लक्ष्य ने पानी और बिजली की उपलब्धता को लेकर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि विशाखापत्तनम और उसके आसपास के क्षेत्रों में पहले से ही जल संसाधनों पर दबाव मौजूद है। रिपोर्टों के अनुसार उत्तर तटीय आंध्र प्रदेश में प्रस्तावित डेटा सेंटर पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जितनी बड़ी bulk water supply infrastructure की जरूरत होगी, वह मौजूदा व्यवस्था में पर्याप्त नहीं मानी जा रही। अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में Polavaram Left Main Canal जैसी परियोजनाओं के जरिए पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है।

1 GW डेटा सेंटर का मतलब कितना बड़ा ढांचा?

यह समझना जरूरी है कि 1 GW कोई छोटा डेटा सेंटर नहीं है। यह एक विशाल computing campus के स्तर की क्षमता है। AI डेटा सेंटरों में बिजली की मांग केवल सर्वरों तक सीमित नहीं होती। कूलिंग सिस्टम, power backup, networking, pumps और अन्य infrastructure भी ऊर्जा लेते हैं। यही कारण है कि एक बड़ा डेटा सेंटर किसी शहर की बिजली व्यवस्था में सामान्य commercial building की तुलना में बहुत बड़ा नया load जोड़ सकता है। आंध्र प्रदेश ने इस चुनौती से निपटने के लिए एक अलग रास्ता भी अपनाया है। राज्य ने बड़े डेटा सेंटरों को ‘deemed power distributor’ का दर्जा देकर उन्हें सीधे बिजली खरीदने और वितरण की व्यवस्था करने की अनुमति देने की नीति बनाई है। इसका उद्देश्य बड़े डेटा सेंटरों की बिजली जरूरत को अधिक कुशल तरीके से पूरा करना और स्थानीय वितरण व्यवस्था पर दबाव कम करना है।

पानी की चिंता क्यों गंभीर है?

डेटा सेंटर को पानी की आवश्यकता मुख्यतः cooling के लिए होती है। सर्वर लगातार काम करते हैं और बड़ी मात्रा में गर्मी पैदा करते हैं। इस गर्मी को बाहर निकालने के लिए अलग-अलग cooling systems काम करते हैं। यदि किसी क्षेत्र में evaporative cooling का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है तो पानी की खपत महत्वपूर्ण हो सकती है। यही कारण है कि डेटा सेंटर स्थापित करने से पहले केवल जमीन और बिजली की उपलब्धता देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि उस क्षेत्र में पानी का स्रोत क्या है और स्थानीय आबादी, उद्योग, कृषि तथा पर्यावरण की जरूरतों के बाद कितने जल संसाधन बचते हैं।विशाखापत्तनम में यही सवाल सबसे अधिक उठ रहा है। हाल की रिपोर्टों में पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय समूहों ने बड़े डेटा सेंटरों से पानी की मांग, बिजली की खपत, गर्मी और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। वहीं सरकार का कहना है कि परियोजनाओं के लिए पर्याप्त पानी और बिजली उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।

Google परियोजना को लेकर भी पर्यावरणीय सवाल

विशाखापत्तनम में Google की प्रस्तावित AI डेटा सेंटर परियोजना ने निवेश और रोजगार की उम्मीदों के साथ-साथ पर्यावरणीय बहस भी तेज की है।रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना को पानी और स्थानीय wildlife पर संभावित प्रभाव को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षेत्र पहले से ही पानी की कमी का सामना कर रहा है और कार्यकर्ताओं ने परियोजना से जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका जताई है। Google का कहना है कि परियोजना में advanced air-cooling जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि पानी की जरूरत को कम किया जा सके। कंपनी ने यह भी कहा है कि वह परियोजना में environmental impact को कम करने के लिए आधुनिक तकनीक अपनाएगी। यानी विवाद केवल यह नहीं है कि डेटा सेंटर पानी इस्तेमाल करेगा या नहीं। असली सवाल है कि कितना पानी इस्तेमाल होगा, वह पानी कहां से आएगा और स्थानीय जल सुरक्षा पर उसका प्रभाव कितना होगा।

थाने में भी डेटा सेंटर को लेकर विरोध

AI डेटा सेंटर का संसाधन विवाद केवल आंध्र प्रदेश तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र के ठाणे में भी बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट को लेकर स्थानीय स्तर पर चिंता सामने आई है। माजीवाड़ा जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में डेटा सेंटर परियोजना को लेकर स्थानीय लोगों ने बिजली, पानी, गर्मी और noise pollution जैसे मुद्दे उठाए हैं। स्थानीय ऑनलाइन चर्चाओं में परियोजना के आकार और रिहायशी क्षेत्र के नजदीक उसके प्रभाव को लेकर विरोध दर्ज किया गया। ठाणे का मामला इस बहस को एक अलग दिशा देता है। विशाखापत्तनम में सवाल मुख्यतः बड़े नए औद्योगिक क्षेत्र में संसाधनों की उपलब्धता का है, जबकि ठाणे जैसे घने शहरी क्षेत्र में सवाल यह है कि क्या इतने बड़े डेटा सेंटरों को आबादी वाले इलाकों के बीच स्थापित करना उचित है? यहां पानी और बिजली के साथ noise, heat, traffic, backup generators और land-use जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

AI की कीमत सिर्फ बिजली के बिल में नहीं होगी

AI के पर्यावरणीय प्रभाव को केवल बिजली की खपत से मापना आसान है, लेकिन वास्तविक तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। एक डेटा सेंटर के लिए जरूरी है—
  • बड़ी मात्रा में जमीन
  • लगातार और विश्वसनीय बिजली
  • backup power infrastructure
  • cooling system
  • पानी या alternative cooling व्यवस्था
  • high-capacity internet connectivity
  • transmission और distribution infrastructure
  • construction material
  • भारी सुरक्षा और monitoring व्यवस्था
इसलिए किसी शहर में बड़ा AI campus स्थापित होने का अर्थ है कि वहां एक पूरा नया industrial-digital ecosystem विकसित होगा। भारत के लिए चुनौती यह है कि ऐसी परियोजनाएं अक्सर उन क्षेत्रों में लगती हैं जहां जमीन, बिजली और connectivity आसानी से उपलब्ध होती है। लेकिन जरूरी नहीं कि उन्हीं क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता भी पर्याप्त हो।

सरकार का पक्ष: तकनीक से कम किया जा सकता है पानी का इस्तेमाल

केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि डेटा सेंटरों की पानी की जरूरत cooling technology पर निर्भर करती है। सरकार के मुताबिक उद्योग पानी की खपत कम करने के लिए नई तकनीकों को तेजी से अपना रहा है। Direct-to-chip liquid cooling में heat को सीधे चिप के पास से हटाने की कोशिश की जाती है। Immersion cooling में computing components को विशेष dielectric fluid में डुबोकर heat management किया जाता है। ऐसी तकनीकें पारंपरिक cooling systems की तुलना में पानी और ऊर्जा के इस्तेमाल को कम करने में मदद कर सकती हैं। सरकार ने groundwater extraction को लेकर केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की guidelines का भी उल्लेख किया है। इसका मतलब यह है कि औद्योगिक उपयोग के लिए भूजल निकालना पूरी तरह अनियंत्रित गतिविधि नहीं है और संबंधित नियम लागू होते हैं।

भारत के लिए AI जरूरी, लेकिन संसाधनों का संतुलन भी जरूरी

भारत AI की वैश्विक दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता। सरकार India AI Mission के जरिए Compute Capacity बढ़ा रही है। मार्च 2026 में सरकार ने बताया था कि AI compute capacity framework के तहत 14 empanelled service providers/data centres के जरिए लगभग 38,231 GPUs उपलब्ध कराए जा चुके हैं। AI का उपयोग स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, रक्षा, वित्त, उद्योग और सरकारी सेवाओं में बढ़ रहा है। ऐसे में भारत के लिए computing infrastructure तैयार करना रणनीतिक जरूरत भी है। लेकिन AI infrastructure की लागत का सवाल केवल निवेश और रोजगार तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि कोई डेटा सेंटर हजारों करोड़ रुपये का निवेश लाता है, तो यह देखना भी जरूरी है कि उसके लिए पानी और बिजली की व्यवस्था किस कीमत पर हो रही है। यदि स्थानीय नागरिकों को भविष्य में पानी की कमी, महंगी बिजली या पर्यावरणीय नुकसान का सामना करना पड़े, तो परियोजना के आर्थिक लाभ का सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है।

रोजगार बनाम संसाधन—बहस का असली केंद्र

बड़े डेटा सेंटर निवेश के साथ रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के अवसर भी आते हैं। निर्माण के दौरान बड़े पैमाने पर काम मिलता है और बाद में IT, security, maintenance, engineering, networking और अन्य सेवाओं में रोजगार पैदा हो सकता है। विशाखापत्तनम जैसे शहरों के लिए यह निवेश डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का अवसर है। लेकिन डेटा सेंटर अत्यधिक automated infrastructure भी होते हैं। इसलिए यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की खपत के मुकाबले स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार कितना पैदा होगा। यही कारण है कि भविष्य की नीति में केवल “कितना निवेश आया” को सफलता का पैमाना बनाने के बजाय यह भी देखा जाना चाहिए कि कितना रोजगार, कितनी tax revenue, कितनी स्थानीय आर्थिक गतिविधि और कितनी resource efficiency हासिल हुई।

क्या डेटा सेंटर पानी के बिना चल सकते हैं?

पूरी तरह पानी से मुक्त डेटा सेंटर की अवधारणा तकनीकी रूप से संभव दिशा है, लेकिन हर परिस्थिति में एक ही cooling technology लागू नहीं की जा सकती। Air cooling, liquid cooling, immersion cooling और hybrid systems के अपने-अपने फायदे और सीमाएं हैं। Climate, server density, electricity cost, humidity, land availability और operational requirements के आधार पर cooling architecture तय होता है। इसलिए नीति का उद्देश्य केवल “डेटा सेंटर पानी न इस्तेमाल करें” होना व्यावहारिक नहीं होगा। बेहतर रास्ता यह है कि water-stressed क्षेत्रों में water-efficient cooling अनिवार्य की जाए और freshwater की जगह recycled water या अन्य सुरक्षित विकल्पों को प्राथमिकता दी जाए।

अब ‘Water Positive’ और ‘Energy Positive’ मॉडल की जरूरत

भारत में डेटा सेंटरों की अगली पीढ़ी के लिए sustainability को केवल CSR गतिविधि नहीं, बल्कि परियोजना की मूल डिजाइन का हिस्सा बनाना होगा। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं—
Water Usage Effectiveness की अनिवार्य रिपोर्टिंग- हर बड़े डेटा सेंटर को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि प्रति यूनिट computing capacity कितने पानी का इस्तेमाल हो रहा है।
Freshwater पर निर्भरता कम करना- जहां संभव हो, Treated Wastewater और Recycled Water का इस्तेमाल बढ़ाया जाना चाहिए।
जल संकट वाले क्षेत्रों में कठोर Siting Rrules- जहां पहले से गंभीर Water Stress है, वहां अत्यधिक Water-Intensive Cooling वाले डेटा सेंटरों को अनुमति देने से पहले विस्तृत Impact Assessment होना चाहिए।
Renewable energy से जोड़ना- AI डेटा सेंटरों की बढ़ती बिजली मांग को Renewable Generation और Storage Infrastructure के साथ जोड़ना जरूरी होगा।
स्थानीय समुदाय की भागीदारी- किसी बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट से पहले स्थानीय आबादी को पानी, बिजली, भूमि और पर्यावरण पर संभावित प्रभाव की स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए।

भारत के सामने अब ‘Resource Reckoning’

भारत AI को विकास और डिजिटल संप्रभुता का अगला आधार बनाना चाहता है। लेकिन AI की यह दौड़ अब उस मोड़ पर पहुंच रही है जहां केवल GPU और server capacity बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को यह तय करना होगा कि उसके AI डेटा सेंटर कहां बनेंगे, किस पानी से चलेंगे, किस बिजली से चलेंगे और उनकी कीमत कौन चुकाएगा। विशाखापत्तनम में 6 GW के संभावित डेटा सेंटर ecosystem को लेकर उठ रहे सवाल और ठाणे में स्थानीय चिंताएं इस बड़े राष्ट्रीय प्रश्न के अलग-अलग उदाहरण हैं। एक ओर देश को वैश्विक AI निवेश और computing capacity की जरूरत है, दूसरी ओर पानी, जमीन और बिजली जैसे संसाधनों की वास्तविक सीमाएं भी हैं। सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि डेटा सेंटर क्षमता पहले ही 2020 के 375 MW से बढ़कर 2025 में लगभग 1,500 MW हो चुकी है और 2031-32 तक बिजली की मांग 13.56 GW तक पहुंचने का अनुमान है। यानी आने वाले वर्षों में AI infrastructure का विस्तार बहुत तेज होने वाला है।

ताकि तकनीकी दौड़ में पीछे न रह जाए सस्टैनेबिलिटी

भारत की AI कहानी तभी वास्तव में सफल मानी जाएगी, जब डिजिटल विकास और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन कायम हो। AI के लिए भारत को अधिक computing power चाहिए, लेकिन उस computing power को चलाने के लिए पानी और बिजली भी चाहिए। इसलिए अगली बड़ी बहस शायद यह नहीं होगी कि भारत AI की दौड़ में कितना आगे निकला, बल्कि यह होगी कि भारत ने AI की दौड़ कितने टिकाऊ तरीके से पूरी की।

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