लाल किले पर अभिज्ञान ऐप का डिजिटल पहरा, सेकंड्स में फिंगरप्रिंट से खुलेगा संदिग्ध का रिकॉर्ड

The CSR Journal Magazine

स्वतंत्रता दिवस पर हाईटेक सुरक्षा व्यवस्था, NCRB के Abhigyan ऐप से मौके पर होगी पहचान; हैंडहेल्ड बायोमेट्रिक डिवाइस से NAFIS डेटाबेस में होगा फिंगरप्रिंट मिलान

देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान ऐतिहासिक लाल किले की सुरक्षा व्यवस्था को इस बार अत्याधुनिक तकनीक से और मजबूत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन और स्वतंत्रता दिवस समारोह के मद्देनजर राजधानी में सुरक्षा एजेंसियां बहुस्तरीय सुरक्षा घेरा तैयार कर रही हैं। इस व्यवस्था में पारंपरिक पुलिस बल, सीसीटीवी निगरानी और एंटी-ड्रोन तकनीक के साथ-साथ डिजिटल बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी कड़ी में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) का ‘अभिज्ञान’ ऐप सुरक्षा और फील्ड पुलिसिंग के लिए खास तौर पर चर्चा में है। यह ऐसा मोबाइल एप्लिकेशन है, जिसके जरिए अधिकृत पुलिसकर्मी पोर्टेबल प्रमाणित फिंगरप्रिंट स्कैनर की मदद से किसी व्यक्ति के फिंगरप्रिंट को राष्ट्रीय फिंगरप्रिंट डेटाबेस से मिलान कर सकते हैं। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य फील्ड में पुलिस की पहचान प्रक्रिया को तेज, प्रभावी और तकनीक आधारित बनाना है।

क्या है ‘अभिज्ञान’ ऐप?

‘अभिज्ञान’ NCRB द्वारा विकसित मोबाइल एप्लिकेशन है, जिसे पुलिसकर्मियों को मौके पर ही बायोमेट्रिक पहचान की सुविधा देने के लिए तैयार किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 19 जून 2026 को इसे तीन अन्य डिजिटल पुलिसिंग एप्लिकेशन—CrPI, e-Prosecution 2.0 और e-Forensics 2.0—के साथ लॉन्च किया था।
सरकार के मुताबिक Abhigyan की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पुलिसकर्मी किसी संदिग्ध व्यक्ति के फिंगरप्रिंट को प्रमाणित पोर्टेबल फिंगरप्रिंट स्कैनर से स्कैन करके राष्ट्रीय फिंगरप्रिंट डेटाबेस में उसका मिलान कर सकते हैं। यानी किसी व्यक्ति की पहचान जांचने के लिए पुलिसकर्मी को जरूरी नहीं कि उसे थाने या किसी स्थायी कंप्यूटर टर्मिनल तक ले जाना पड़े। फील्ड में ही उपलब्ध तकनीकी उपकरणों के माध्यम से पहचान प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

फिंगरप्रिंट से खुलेगा आपराधिक रिकॉर्ड

अभिज्ञान ऐप की कार्यप्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा National Automated Fingerprint Identification System यानी NAFIS से इसका जुड़ाव है। NAFIS राष्ट्रीय स्तर पर फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण और पहचान में इस्तेमाल होने वाला सिस्टम है। गृह मंत्रालय के अनुसार देश में करोड़ों फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। जून 2026 में सरकार ने बताया था कि लगभग 1.29 करोड़ फिंगरप्रिंट रिकॉर्डको AI और मशीन लर्निंग के माध्यम से Actionable Intelligence में बदलने की दिशा में काम किया जा रहा है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति का फिंगरप्रिंट उपलब्ध रिकॉर्ड से मैच करता है, तो अधिकृत पुलिसकर्मी उसके संबंध में उपलब्ध आपराधिक जानकारी की जांच कर सकते हैं। इससे पुलिस को मौके पर संदिग्ध की पहचान और उसके आपराधिक इतिहास की जांच करने में मदद मिल सकती है।

कैसे काम करता है पूरा सिस्टम?

अभिज्ञान की कार्यप्रणाली को सामान्य तौर पर कुछ चरणों में समझा जा सकता है।
संदेह या आवश्यकता के आधार पर जांच- सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात अधिकृत पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति की पहचान सत्यापित करने की आवश्यकता महसूस होने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत बायोमेट्रिक जांच कर सकते हैं।
फिंगरप्रिंट स्कैन- हैंडहेल्ड प्रमाणित फिंगरप्रिंट स्कैनर के जरिए व्यक्ति की उंगली का निशान लिया जाता है।
डेटाबेस में मिलान- स्कैन किया गया फिंगरप्रिंट सुरक्षित डिजिटल माध्यम से संबंधित राष्ट्रीय डेटाबेस में उपलब्ध रिकॉर्ड से मैच किया जाता है।
पहचान की पुष्टि- यदि उपलब्ध रिकॉर्ड से मिलान होता है तो अधिकृत अधिकारी को सिस्टम से संबंधित जानकारी प्राप्त हो सकती है। इससे पुलिसकर्मी आगे की कार्रवाई तय करने में सक्षम होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य कागजी रिकॉर्ड या अलग-अलग सिस्टम पर निर्भरता कम करके फील्ड पुलिसिंग को अधिक तेज और तकनीक-सक्षम बनाना है।

लाल और हरे सिग्नल की चर्चा क्यों?

स्वतंत्रता दिवस की सुरक्षा से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों में अभिज्ञान को संदिग्धों की पहचान के लिए इस्तेमाल किए जाने और स्क्रीन पर संकेत मिलने की बात सामने आई है। हालांकि, सरकारी आधिकारिक विवरण में Abhigyan की मुख्य पुष्टि फिंगरप्रिंट स्कैनिंग और NAFIS से मिलान के रूप में की गई है। इसलिए इसे सीधे Facial Recognition System वाला ऐप कहना सही नहीं होगा। यानी लाल किले पर इस्तेमाल होने वाली पूरी हाईटेक सुरक्षा व्यवस्था को एक ही ऐप का काम समझना उचित नहीं है। यहां अलग-अलग तकनीकों और प्रणालियों का इस्तेमाल अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

Facial Recognition और Abhigyan में अंतर

Abhigyan: मुख्य रूप से फिंगरप्रिंट आधारित पहचान के लिए बनाया गया है। अधिकृत पुलिसकर्मी प्रमाणित स्कैनर के जरिए फिंगरप्रिंट लेकर राष्ट्रीय फिंगरप्रिंट डेटाबेस में उसका मिलान कर सकते हैं।
CrPI: सरकार द्वारा लॉन्च किए गए Criminal Procedure Identification ऐप में facial recognition, iris matching और DNA matching जैसी मल्टी-मोडल बायोमेट्रिक क्षमताएं शामिल हैं। इसका इस्तेमाल repeat offenders की पहचान और CCTV आधारित suspect identification जैसे कार्यों में किया जा सकता है।

Facial Recognition System यानी FRS

यह कैमरे के जरिए चेहरे की पहचान और उपलब्ध डेटाबेस से तुलना करने वाली तकनीक है। दिल्ली पुलिस ने जुलाई 2026 में जंतर-मंतर के आसपास भी ऐसे FRS यूनिट लगाए थे, जिनका उद्देश्य पुलिस के अनुसार wanted criminals, absconders और history-sheeters की पहचान करना था। इसलिए लाल किले की सुरक्षा में यदि FRS कैमरे, Abhigyan और अन्य डिजिटल प्रणालियां साथ इस्तेमाल की जाती हैं, तो वे एक व्यापक हाईटेक सुरक्षा नेटवर्क के अलग-अलग हिस्से होंगे।

लाल किले की सुरक्षा में तकनीक की भूमिका

स्वतंत्रता दिवस समारोह देश के सबसे संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल सुरक्षा आयोजनों में शामिल है। लाल किला ऐतिहासिक स्थल होने के साथ राष्ट्रीय समारोह का मुख्य केंद्र भी है। प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन यहां से होता है और बड़ी संख्या में सुरक्षा एजेंसियां कार्यक्रम की निगरानी करती हैं।ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों के सामने केवल भीड़ नियंत्रण की चुनौती नहीं होती, बल्कि संदिग्ध गतिविधियों, प्रतिबंधित वस्तुओं, ड्रोन, संभावित घुसपैठ और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की पहचान जैसी कई चुनौतियां होती हैं। यही वजह है कि इस तरह के आयोजनों में अब केवल मैनुअल तलाशी पर निर्भर रहने के बजाय CCTV, डिजिटल कमांड सेंटर, बायोमेट्रिक पहचान, चेहरे की पहचान और एंटी-ड्रोन तकनीक जैसी प्रणालियों को एक साथ इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक लाल किले और उसके आसपास करीब 1,000 CCTV कैमरों की साइबर सुरक्षा ऑडिटिंग भी की जा रही है, ताकि निगरानी प्रणाली को साइबर खतरों से सुरक्षित रखा जा सके।

स्मार्ट पुलिसिंग की दिशा में बड़ा कदम

अभिज्ञान ऐप को केवल स्वतंत्रता दिवस की सुरक्षा तक सीमित तकनीक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका मूल उद्देश्य देशभर में फील्ड पुलिसिंग को अधिक वैज्ञानिक और डिजिटल बनाना है। गृह मंत्रालय के अनुसार NCRB, NAFIS, CCTNS और दूसरी डिजिटल प्रणालियों को जोड़कर अपराध की जांच और अपराधियों की पहचान को अधिक डेटा-आधारित बनाने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार ने यह भी बताया है कि CCTNS देश के 17,840 पुलिस स्टेशनों तक पहुंच चुका है और करोड़ों डिजिटल रिकॉर्ड का AI आधारित विश्लेषण भविष्य में अपराध की रोकथाम और जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसका अर्थ यह है कि पुलिसिंग का पारंपरिक मॉडल, घटना होने के बाद जांच शुरू करना धीरे-धीरे डेटा और तकनीक आधारित मॉडल की ओर बढ़ रहा है।

35 सेकंड में पहचान का दावा कितना सही?

अभिज्ञान को लेकर सामने आई कुछ रिपोर्टों में राष्ट्रीय फिंगरप्रिंट डेटाबेस से मिलान की प्रक्रिया को लगभग 35 सेकंड में पूरा करने की बात कही गई है। हालांकि, इसे यह समझना जरूरी है कि 35 सेकंड का आंकड़ा हर परिस्थिति में हर व्यक्ति की पहचान की गारंटी नहीं है। वास्तविक समय नेटवर्क, स्कैन की गुणवत्ता, फिंगरप्रिंट की स्थिति, डेटाबेस में रिकॉर्ड की उपलब्धता और सिस्टम की प्रतिक्रिया जैसे कई कारक परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए तकनीक पुलिस की जांच प्रक्रिया को तेज करने वाला उपकरण है, लेकिन किसी व्यक्ति के खिलाफ अंतिम कानूनी निष्कर्ष केवल किसी डिजिटल मैच के आधार पर निकालना अलग कानूनी और जांच प्रक्रिया का विषय है।

सुरक्षा और निजता—दोनों पर नजर जरूरी

बायोमेट्रिक तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सुरक्षा के साथ-साथ नागरिक निजता का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है। फिंगरप्रिंट किसी व्यक्ति की विशिष्ट जैविक पहचान से जुड़ा डेटा है। इसलिए इसके इस्तेमाल में अधिकृत पहुंच, डेटा सुरक्षा, उद्देश्य-सीमा और उचित कानूनी प्रक्रिया जैसी व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण हैं। सरकार का पक्ष है कि ऐसी तकनीक का उद्देश्य अपराधियों की पहचान, जांच को तेज करना और पुलिसिंग को अधिक वैज्ञानिक बनाना है। वहीं नागरिक अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों ने मोबाइल बायोमेट्रिक पहचान के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर निगरानी, डेटा सुरक्षा और गलत पहचान जैसे सवाल उठाए हैं। इसलिए भविष्य में ऐसी तकनीकों की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि पुलिस कितनी तेजी से किसी व्यक्ति की पहचान कर सकती है, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि पहचान प्रक्रिया कितनी सटीक, सुरक्षित, जवाबदेह और कानूनी रूप से नियंत्रित है।

चार नए डिजिटल ऐप से बदल रही आपराधिक जांच की तस्वीर

अभिज्ञान को सरकार ने अकेले लॉन्च नहीं किया था। इसके साथ CrPI, e-Prosecution 2.0 और e-Forensics 2.0 भी शुरू किए गए। इन चारों प्रणालियों का उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रक्रिया के अलग-अलग हिस्सों को तकनीक से जोड़ना है। जहां Abhigyan फिंगरप्रिंट आधारित फील्ड पहचान में मदद करता है, वहीं CrPI मल्टी-मोडल बायोमेट्रिक पहचान, e-Forensics 2.0 फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और जांच एजेंसियों के डिजिटल समन्वय तथा e-Prosecution 2.0 अभियोजन प्रक्रिया को तकनीकी रूप से मजबूत करने की दिशा में काम करता है।

लाल किले पर हाईटेक सुरक्षा का नया दौर

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की सुरक्षा में तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल यह संकेत देता है कि भारत में हाई-प्रोफाइल आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था तेजी से डिजिटल और डेटा आधारित हो रही है। एक तरफ कैमरे भीड़ पर नजर रखेंगे, Facial Recognition System संभावित संदिग्धों की पहचान में मदद करेगा, एंटी-ड्रोन सिस्टम आसमान से आने वाले खतरे पर नजर रखेगा और दूसरी तरफ Abhigyan जैसे सिस्टम फिंगरप्रिंट के जरिए संदिग्ध की पहचान को डेटाबेस से जोड़ने में पुलिस की मदद करेंगे। इस पूरी व्यवस्था का लक्ष्य एक ही है—खतरे की पहचान जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी प्रतिक्रिया दी जा सके। हालांकि, हाईटेक सुरक्षा का असली प्रभाव तभी दिखाई देगा जब तकनीक के साथ प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मी, मजबूत साइबर सुरक्षा, स्पष्ट संचालन प्रोटोकॉल और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए। लाल किले जैसे राष्ट्रीय महत्व के स्थल पर आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल सुरक्षा के नए मानक स्थापित कर सकता है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता और स्वीकार्यता तकनीकी क्षमता के साथ-साथ पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी निर्भर करेगी।

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