40 साल बाद बोफोर्स केस का अंत: सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम याचिका खारिज की

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बोफोर्स तोप घोटाला केस 40 साल बाद पूरी तरह बंद: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की आखिरी बची याचिका, चार दशक पुराने मुकदमे पर लगा हमेशा के लिए पूर्ण विराम!

भारतीय राजनीति के इतिहास को बदलने वाले और करीब चार दशकों तक देश की न्यायिक व्यवस्था व सियासी गलियारों में भूचाल मचाने वाले बोफोर्स तोप सौदा घोटाले का कानूनी अध्याय अब हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट, ने इस संवेदनशील मामले से जुड़ी अंतिम जीवित याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के साल 2005 के फैसले को चुनौती देने वाली अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल की अंतिम अपील पर आगे सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया। इस अंतिम याचिका के निपटारे के साथ ही, रक्षा सौदे में दलाली और घूसखोरी के आरोपों से घिरे इस ऐतिहासिक मुकदमे पर कानूनी तौर पर अंतिम ‘फुल स्टॉप’ लग गया है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: ‘अब और नहीं खींचा जा सकता मामला’

गुरुवार को हुई इस ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अजय अग्रवाल ने पीठ से दिवंगत आरोपियों श्रीचंद पी. हिंदुजा और गोपीचंद पी. हिंदुजा के नाम याचिका से हटाने के लिए चार सप्ताह की मोहलत मांगी थी, क्योंकि दोनों भाइयों का निधन हो चुका है। हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने इस मांग को सिरे से ठुकरा दिया। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “यह मामला साल 2018 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और इसे अब और लंबा नहीं खींचा जा सकता। जब दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही 2005 में सभी आरोप रद्द कर चुका है और मुख्य जांच एजेंसी CBI की मुख्य अर्जी भी पूर्व में खारिज हो चुकी है, तो इस मामले को आगे जारी रखने की कोई कानूनी वजह या सार्थकता नहीं बचती।”न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब मुख्य जांच एजेंसी के पास आगे बढ़ने का आधार नहीं रहा, तो किसी निजी याचिका के बल पर इस बंद हो चुके अध्याय को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।

दिल्ली हाईकोर्ट का 2005 का ऐतिहासिक फैसला

बोफोर्स केस के ताश के पत्तों की तरह बिखरने की मुख्य नींव 31 मई 2005 को ही रख दी गई थी, जब दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस आर.एस. सोढ़ी ने हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) और स्वीडिश हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के खिलाफ सभी आपराधिक आरोपों को निरस्त करते हुए उन्हें बरी कर दिया था। हाईकोर्ट के उस फैसले में CBI की जांच पर बेहद तीखी टिप्पणियां की गई थीं।

साक्ष्यों की अप्रामाणिकता

अदालत ने पाया था कि सीबीआई को स्वीडन की सरकार या अधिकारियों से जो भी दस्तावेजी सबूत मिले थे, वे महज फोटोकॉपी या अनएथेंटिकेटेड (अप्रामाणिक) प्रतियां थीं, न कि मूल दस्तावेज।

संदेह और सबूत में अंतर

अदालत ने माना था कि जांच एजेंसी केवल संदेह के आधार पर केस लड़ रही थी। आरोपों और कथित तौर पर ट्रांसफर हुए पैसों के बीच कोई सीधा संबंध (लिंक) स्थापित नहीं किया जा सका। हाईकोर्ट ने कहा था कि बिना किसी ठोस आधार के आरोपियों को 14 साल तक अदालती कार्यवाही में घसीटना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग और सरकारी खजाने की बर्बादी है।

250 करोड़ का खर्च और सीबीआई की ‘4,522 दिनों’ की भारी चूक

एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि इस पूरे मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया पर सरकारी खजाने से लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च हुए। इस भारी-भरकम राशि को खर्च करने के बावजूद सीबीआई देश की अदालतों में कोई अचूक सबूत पेश नहीं कर सकी। इसके अलावा, जांच एजेंसी के ढीले रवैये का सबसे बड़ा उदाहरण तब सामने आया जब उसने दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ अपील करने में पूरे 4,522 दिनों (करीब 12 साल) की देरी कर दी। नवंबर 2018 में जब सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो तत्कालीन पीठ ने इस अत्यधिक देरी का कोई ठोस और संतोषजनक कारण न मिलने पर सीबीआई की याचिका को खारिज कर दिया था।

क्या था बोफोर्स घोटाला? (इतिहास के झरोखे से)

इस विवाद की शुरुआत आज से करीब 40 साल पहले 24 मार्च 1986 को हुई थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी ‘एबी बोफोर्स’ के साथ 1,437 करोड़ रुपये का रक्षा सौदा किया था। इस ऐतिहासिक सौदे के तहत भारतीय सेना के लिए 400 आधुनिक 155mm हॉवित्जर (Howitzer) तोपें खरीदी जानी थीं।

रेडियो का धमाका और वी.पी. सिंह का इस्तीफा

सौदा होने के एक साल बाद, 16 अप्रैल 1987 को ‘स्वीडिश रेडियो’ ने एक सनसनीखेज खोजी रिपोर्ट प्रसारित की। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए एबी बोफोर्स कंपनी ने भारत के शीर्ष राजनेताओं, रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों और बिचौलियों को 60 करोड़ रुपये की घूस (कमीशन) दी थी। इस खबर के आते ही देश की राजनीति में भूचाल आ गया। राजीव गांधी की सरकार में रक्षा मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप (वी.पी.) सिंह ने मतभेदों के चलते पद से इस्तीफा दे दिया और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

1989 के चुनाव पर असर

बोफोर्स घूसकांड भारतीय राजनीतिक इतिहास का पहला ऐसा रक्षा घोटाला बना, जिसने सीधे लोकसभा चुनाव के नतीजों को पलट दिया। 1984 के चुनाव में रिकॉर्ड 404 सीटें जीतने वाले राजीव गांधी ‘बोफोर्स’ के आरोपों के कारण 1989 का आम चुनाव हार गए और वी.पी. सिंह देश के नए प्रधानमंत्री बने।

मुख्य आरोपी और वक्त के साथ बिखरता मुकदमा

जनवरी 1990 में सीबीआई ने इस मामले में पहली एफआईआर (FIR) दर्ज की थी। सालों की जांच के बाद अक्टूबर 1999 में पहला आरोप पत्र दाखिल किया गया, जिसमें कथित बिचौलिए विन चड्ढा, इतालवी व्यवसायी ओटावियो क्वात्रोची, तत्कालीन रक्षा सचिव एस.के. भटनागर और बोफोर्स कंपनी के तत्कालीन प्रमुख मार्टिन अर्दबो को नामजद किया गया। अक्टूबर 2000 में पूरक चार्जशीट के जरिए लंदन के उद्योगपति हिंदुजा भाइयों को भी इसमें शामिल किया गया। हालांकि, समय बीतने के साथ ही यह मुकदमा कमजोर होता गया क्योंकि इसके कई मुख्य किरदारों की कानूनी फैसले से पहले ही मृत्यु हो गई।

राजीव गांधी की हत्या

फरवरी 2004 में दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस जे.डी. कपूर ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मरणोपरांत इस मामले में भ्रष्टाचार के सभी आरोपों से पूरी तरह क्लीन चिट दे दी थी। कथित बिचौलिए विन चड्ढा, रक्षा सचिव एस.के. भटनागर और मार्टिन अर्दबो की भी सुनवाई के दौरान ही मृत्यु हो गई। गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले इतालवी कारोबारी क्वात्रोची को साल 2011 में दिल्ली की एक विशेष सीबीआई अदालत ने बरी (डिस्चार्ज) कर दिया था। अदालत ने तब कहा था कि देश क्वात्रोची के प्रत्यर्पण पर और ज्यादा जनता का पैसा बर्बाद नहीं कर सकता। साल 2013 में क्वात्रोची का भी निधन हो गया।

राजनीति में बदनाम, लेकिन कारगिल युद्ध की महानायक

बोफोर्स तोपों को लेकर भले ही दशकों तक देश में सियासी जंग चलती रही, लेकिन सैन्य मोर्चे पर इन तोपों ने अपनी मारक क्षमता का लोहा मनवाया। साल 1999 में जब पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध छिड़ा, तो भारतीय सेना के लिए यही बोफोर्स (हॉवित्जर) तोपें सबसे बड़ी संकटमोचक बनकर उभरीं। ऊंचे पहाड़ी इलाकों और बंकरों में छिपे पाकिस्तानी घुसपैठियों पर बोफोर्स तोपों ने -3 डिग्री से लेकर 70 डिग्री के कोण तक अचूक और विनाशकारी गोलाबारी की। इसकी लंबी रेंज और सटीक गोलाबारी ने दुश्मन की सप्लाई लाइन को ध्वस्त कर दिया, जिससे भारतीय सेना को रणनीतिक बढ़त मिली और भारत ने कारगिल पर दोबारा तिरंगा फहराया।

‘बोफोर्स गाथा’ का पूर्ण विराम

भारतीय न्यायपालिका और राजनीति के गलियारों में चार दशकों तक गूंजने वाली बोफोर्स की गूंज अब शांत हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम फैसले ने यह साफ कर दिया है कि बिना पुख्ता, प्रामाणिक और कानूनी रूप से स्वीकार्य दस्तावेजों के किसी भी मुकदमे को अनंत काल तक नहीं चलाया जा सकता। 250 करोड़ रुपये के सरकारी खर्च, कई सरकारों के बदलने, और लगभग सभी मुख्य आरोपियों व गवाहों के दुनिया से चले जाने के बाद, अब इस केस की फाइलें राष्ट्रीय अभिलेखागार और इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दफन हो गई हैं।

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