सुप्रीम कोर्ट ने 70 साल पुराने भूमि विवाद में शराफत अली के परिवार को किया न्याय, सेल डीड को वैध घोषित किया

The CSR Journal Magazine
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जो न केवल कानूनी दृष्टिकोण से बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह मामला 1957 के एक भूमि विवाद से जुड़ा है, जहां शराफत अली के परिवार ने 70 साल तक न्याय की तलाश की। यह मुकदमा इतना लंबा चला कि खुद शराफत अली भी अपने परिवार के साथ इस प्रक्रिया में चलते-चलते दुनिया से चले गए। अब उनकी चार पीढ़ियों की कड़ी लड़ाई के बाद, कोर्ट ने इस मामले में अंतिम निर्णय सुना दिया।

कैसे शुरू हुआ यह चकबंदी का मामला?

यह विवाद 4 जून 1957 को हरिद्वार के नसीरपुर कलां गांव में सुरुआत हुआ, जब शराफत अली के पिता ने 15.5 बीघा जमीन खरीदी। उस समय शराफत अली नाबालिग थे, इसलिए जमीन का दस्तावेज उनके पिता के नाम पर बनाया गया। प्रारंभ में यह मामला कोर्ट में दाखिल खारिज और म्यूटेशन के रूप में आया, लेकिन धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ता गया। इससे युपी जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 से जुड़ गया।

क्या हुआ कोर्ट में?

इस मामले की सुनवाई के दौरान, शराफत अली के परिवार को निचली अदालत और हाईकोर्ट से लगातार असफलता मिली। दोनों अब तक के कोर्ट के फैसले ने अपीलकर्ता के खिलाफ निर्णय सुनाए थे, जिसमें कहा गया था कि वह सेल डीड के निष्पादन को साबित नहीं कर सके। इसके बाद, शराफत अली का परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने मामले की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के निष्कर्षों को खारिज करते हुए सेल डीड को वैध घोषित कर दिया।

जमीन के इस विवाद में चकबंदी का क्या स्थान था?

जमीन की खरीद के बाद, जब म्यूटेशन का कार्य शुरू हुआ, तब बेचने वाले ने आपत्ति जताई। कुछ समय बाद यह आपत्ति वापस ले ली गई, जिससे म्यूटेशन पर कोई असर नहीं पड़ा। लेकिन चकबंदी के समय, जब खरीदी गई जमीन के मालिक के रूप में शराफत अली के परिवार का नाम गायब हो गया, तो स्थिति और भी गंभीर हो गई। चकबंदी अधिकारी ने दस्तावेजों के आधार पर अपीलकर्ताओं का नाम जोड़ दिया, लेकिन बेची जाने वाली जमीन के पक्ष से फिर से आपत्ति आई।

क्या देर से मिला न्याय, न्याय है?

इस मामले में पेश आई दिक्कत ने एक गंभीर सवाल खड़ा किया है। 70 साल तक कानूनी पचड़ों में उलझे रहना क्या सही है? भले ही शराफत अली के परिवार को अब सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिला हो, लेकिन यह सोचने वाली बात है कि इतना लंबा समय लगना न्याय प्रणाली की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान छोड़ता है। देश के कानूनी सिस्टम में सुधार की जरूरत महसूस होती है, ताकि ऐसे मामलों का शीघ्र निपटारा हो सके।

Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

App Store –  https://apps.apple.com/in/app/newspin/id6746449540 

Google Play Store – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.inventifweb.newspin&pcampaignid=web_share

Latest News

Popular Videos