उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार में स्थित मां दक्षिण काली का मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में माना जाता है। गंगा तट पर स्थित यह मंदिर अपनी पौराणिक मान्यताओं, तांत्रिक साधना और चमत्कारिक कथाओं के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इस सिद्धपीठ की स्थापना मां काली के आदेश पर 108 नरमुंडों के ऊपर की गई थी। इतना ही नहीं, इस धाम का संबंध समुद्र मंथन और भगवान शिव के विषपान की कथा से भी जोड़ा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना मां दक्षिण काली अवश्य पूरी करती हैं।
108 नरमुंडों पर स्थापित हुआ था मां काली का यह सिद्धपीठ
हरिद्वार में नील पर्वत और गंगा की तलहटी के बीच स्थित दक्षिण काली मंदिर को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि मां काली के परम भक्त और सिद्ध साधक गुरु कामराज को एक दिन देवी ने स्वप्न में दर्शन दिए और इस स्थान पर अपनी प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया। देवी की आज्ञा का पालन करते हुए गुरु कामराज ने यहां तपस्या की और 108 नरमुंडों के ऊपर इस शक्तिपीठ की स्थापना की। इसी कारण यह स्थान “कामराज पीठ” के नाम से भी प्रसिद्ध है। भक्तों का मानना है कि मां काली आज भी इस धाम में जागृत रूप में विराजमान हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। यही वजह है कि देशभर से श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

दक्षिणवाहिनी गंगा और महादेव के विषपान से जुड़ा है धाम का रहस्य
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां गंगा की धारा दक्षिण दिशा की ओर बहती है। इसी कारण इस शक्तिपीठ को “दक्षिण काली मंदिर” कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दक्षिण दिशा का संबंध शक्ति और तंत्र साधना से माना जाता है, इसलिए यह स्थान साधकों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस धाम का संबंध समुद्र मंथन की प्रसिद्ध कथा से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि जब समुद्र मंथन से कालकूट विष निकला तो भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उसे अपने कंठ में धारण कर लिया। विष की तीव्रता को शांत करने के लिए उन्होंने हरिद्वार क्षेत्र में गंगा के जल का सहारा लिया। कहा जाता है कि इसी घटना के कारण यहां की धारा को नीलधारा कहा जाता है और यह क्षेत्र विशेष रूप से पवित्र माना जाता है।
स्कंध पुराण में भी मिलता है मंदिर का उल्लेख
धार्मिक ग्रंथों में भी इस धाम का महत्व बताया गया है। मान्यता है कि स्कंध पुराण में दक्षिण काली पीठ का उल्लेख मिलता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस शक्तिपीठ की रक्षा स्वयं काल भैरव करते हैं। मंदिर से जुड़ी एक और रोचक मान्यता यह है कि यहां काले और सफेद नाग-नागिन का जोड़ा निवास करता है, जो विशेष रूप से सावन माह में दिखाई देता है। हालांकि, स्थानीय लोगों के अनुसार इन नागों ने कभी किसी श्रद्धालु को नुकसान नहीं पहुंचाया।
तांत्रिक साधना से जुड़े साधकों के बीच भी इस धाम का विशेष महत्व है। माना जाता है कि वाममार्गी और दक्षिणमार्गी साधकों की साधना तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक वे इस सिद्धपीठ में दर्शन और साधना न करें।

