World Rum Day: पद्मश्री कपिल मोहन और Old Monk की अमर दास्तान

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विश्व रम दिवस: ‘ओल्ड मोंक’ ने बनाई अनोखी विरासत बिना किसी प्रचार के

विश्व रम दिवस पर हम बात कर रहे हैं ‘ओल्ड मोंक’ की, जो भारत की सबसे प्रसिद्ध शराबों में से एक है। इसकी कहानी बेहद रोचक है, क्योंकि इसके संस्थापक कपिल मोहन ने अपनी जिंदगी में कभी शराब नहीं पी। यह एक ऐसा ब्रांड है जिसने बिना किसी विज्ञापन या सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट के अपनी पहचान बनाई। ‘ओल्ड मोंक’ की गिनती आज भी भारतीय युवाओं की पसंदीदा रम में होती है, और इसने कई लोगों का दिल जीता है।

ओल्ड मोंक (Old Monk) की अनूठी कहानी

विश्व रम दिवस के विशेष अवसर पर आज हम भारत की एक ऐसी अनूठी और ऐतिहासिक धरोहर की कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसने दुनिया भर के मदिरा प्रेमियों के दिलों पर दशकों तक राज किया है। यह कहानी है ‘ओल्ड मोंक’ (Old Monk) रम की। गहरी चॉकलेटी रंगत, वैनिला और मसालों की भीनी खुशबू, और गले से उतरता हुआ वह जाना-पहचाना अहसास- ओल्ड मोंक सिर्फ एक ब्रांड नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के लिए एक अहसास और पुरानी यादों का पिटारा है। लेकिन इस कालजयी ब्रांड की सफलता के पीछे जो सबसे बड़ा और हैरान कर देने वाला सच है, वह यह है कि इसे वैश्विक ऊंचाइयों पर पहुंचाने वाले इसके कर्णधार, कपिल मोहन ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी शराब की एक बूंद को हाथ तक नहीं लगाया। आइए, विश्व रम दिवस पर जानते हैं एक पक्के शाकाहारी और मदिरा से दूर रहने वाले व्यक्ति की दूरदर्शिता, और बिना किसी विज्ञापन के भारत के सबसे बड़े लिक्विड ब्रांड बनने वाले ओल्ड मोंक के सफरनामा की पूरी दास्तान।

मोहन मीकिन और ओल्ड मोंक का ऐतिहासिक उदय

ओल्ड मोंक की जड़ें भारत के इतिहास और यहां की पहाड़ियों से जुड़ी हैं। साल 1855 में एक स्कॉटिश उद्यमी एडवर्ड अब्राहम डायर ने हिमाचल प्रदेश के कसौली में एक शराब की भट्टी (डिस्टिलरी) स्थापित की थी। उनका मुख्य उद्देश्य भारत में रह रहे ब्रिटिश सैनिकों को सस्ती और अच्छी बीयर और वाइन उपलब्ध कराना था। बाद में इस डिस्टिलरी को सोलन स्थानांतरित कर दिया गया और इसका नाम ‘डायर मीकिन’ पड़ा।

कंपनी का आधुनिकीकरण

भारत की आजादी के बाद, साल 1949 में इस गिरती हुई कंपनी को दूरदर्शी व्यवसायी नरेंद्र नाथ मोहन (एन.एन. मोहन) ने खरीद लिया। नरेंद्र नाथ मोहन ने कंपनी की कमान संभाली और इसका आधुनिकीकरण शुरू किया। साल 1954 में, एन.एन. मोहन के नेतृत्व में ही कंपनी ने एक नई डार्क रम का इजाद किया, जिसे नाम दिया गया ‘ओल्ड मोंक’। शुरुआती दौर में ओल्ड मोंक ने बाजार में अपनी जगह बनानी शुरू ही की थी कि कंपनी की कमान नरेंद्र नाथ मोहन के बेटे कपिल मोहन के हाथों में आ गई। कपिल मोहन भारतीय सेना के चिकित्सा कोर (Army Medical Corps) में ब्रिगेडियर थे। जब वे व्यापार की दुनिया में आए, तो उन्होंने इस पारंपरिक व्यवसाय को एक नया विजन दिया। बाद में साल 1966 में इस कंपनी का नाम बदलकर ‘मोहन मीकिन लिमिटेड’ कर दिया गया।

एक अनोखा विरोधाभास

ओल्ड मोंक की सफलता की कहानी का सबसे दिलचस्प और जादुई पहलू खुद ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) कपिल मोहन थे। एक ऐसी कंपनी का नेतृत्व करना जिसका मुख्य उत्पाद शराब हो, और खुद उससे पूरी तरह दूर रहना, यह अपने आप में एक मिसाल है। कपिल मोहन व्यक्तिगत जीवन में बेहद धार्मिक, कड़े सिद्धांतों वाले और पूरी तरह से शाकाहारी व्यक्ति थे। वे नियमित रूप से पूजा-पाठ करते थे और उन्होंने जीवन भर कभी भी किसी भी तरह की शराब का सेवन नहीं किया। कई साक्षात्कारों और पारिवारिक संस्मरणों में यह बात सामने आई कि जब भी ओल्ड मोंक के नए बैच या स्वाद के परीक्षण (Tasting) की बात आती थी, तो कपिल मोहन खुद उसे चखने के बजाय अपने सबसे भरोसेमंद विशेषज्ञों और ब्लेंडर्स की टीम पर निर्भर रहते थे।

उपभोक्ताओं के प्रति प्रतिबद्धता

कपिल मोहन कहते थे कि किसी उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी सफलता के लिए आपका उसे पीना जरूरी नहीं है, बल्कि उसके पीछे की ईमानदारी, शुद्धता और उपभोक्ताओं के प्रति आपकी प्रतिबद्धता मायने रखती है। कपिल मोहन का यह विरोधाभास ही ओल्ड मोंक को अन्य सभी ब्रांड्स से अलग और मानवीय बनाता है। उनके इसी अप्रतिम योगदान और व्यापारिक सूझबूझ के लिए भारत सरकार ने साल 2010 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा था।

बिना विज्ञापन के बनी ‘जनता की रम’

मार्केटिंग और ब्रांडिंग की दुनिया में एक स्थापित नियम है कि बिना विज्ञापन के कोई भी ब्रांड बड़ा नहीं बन सकता। लेकिन ओल्ड मोंक ने इस नियम को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। मोहन मीकिन कंपनी ने ओल्ड मोंक रम के प्रचार के लिए कभी भी अखबारों, पत्रिकाओं या टेलीविजन पर कोई विज्ञापन नहीं दिया। कपिल मोहन का मानना था कि अगर उत्पाद की गुणवत्ता में दम है, तो उपभोक्ता खुद ही उसके सबसे बड़े विज्ञापनदाता बन जाएंगे, और हुआ भी यही। ओल्ड मोंक की लोकप्रियता ‘माउथ पब्लिसिटी’ (एक से दूसरे व्यक्ति तक तारीफ पहुंचना) के दम पर बढ़ी। कॉलेज के हॉस्टल के कमरों से लेकर सेना के मेस तक, और आम आदमी के ढाबों से लेकर आलीशान क्लबों तक, ओल्ड मोंक हर जगह अपनी जगह बनाने में कामयाब रही। इसकी सफलता के पीछे कुछ मुख्य कारक थे।

किफायती दाम और बेजोड़ स्वाद

ओल्ड मोंक ने हमेशा अपनी गुणवत्ता को बनाए रखा, जबकि इसकी कीमतें आम भारतीय की जेब के अनुकूल रहीं। इसकी सूजी हुई, चौकोर और खुरदरी सतह वाली कांच की बोतल (स्क्वाट बोतल) इतनी मशहूर हुई कि लोग दूर से ही देखकर पहचान जाते थे कि यह ओल्ड मोंक है। भारतीय सेना के जवानों और अधिकारियों के बीच ओल्ड मोंक का एक अलग ही क्रेज रहा है। सेना की कैंटीन (CSD) के जरिए इसकी पहुंच देश के कोने-कोने तक हुई।

उतार-चढ़ाव और वफादार उपभोक्ताओं का ‘मोंक लव’

साल 1970 और 1980 के दशक में ओल्ड मोंक का भारतीय डार्क रम बाजार पर लगभग एकछत्र राज था। एक समय ऐसा भी था जब भारत में बिकने वाली कुल रम में ओल्ड मोंक की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक थी। यह भारत का सबसे बड़ा वाइन और स्पिरिट ब्रांड बन चुका था। हालांकि, साल 2000 के बाद के दशक में विदेशी ब्रांड्स के आगमन, बदलते लाइफस्टाइल और आक्रामक मार्केटिंग के कारण ओल्ड मोंक की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई। नए दौर के युवाओं को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च किए।

अफवाह से बढ़ी लोकप्रियता

साल 2015 के आसपास ऐसी अफवाहें भी उड़ीं कि ओल्ड मोंक को बंद किया जा रहा है। लेकिन जैसे ही यह खबर फैली, सोशल मीडिया पर ‘ओल्ड मोंक लवर्स’ का एक सैलाब आ गया। दुनिया भर के प्रशंसकों ने इस ब्रांड के प्रति अपनी वफादारी जाहिर की। लोगों ने अपनी पुरानी यादें साझा कीं और कंपनी को संदेश दिया कि वे ओल्ड मोंक को कभी नहीं छोड़ेंगे। उपभोक्ताओं के इसी अटूट प्यार ने ओल्ड मोंक को एक नया जीवन दिया। मोहन मीकिन ने भी साफ किया कि ओल्ड मोंक कभी बंद नहीं होगी। कंपनी ने बाद में बदलते वक्त के साथ ओल्ड मोंक के प्रीमियम संस्करण और वाइट रम भी बाजार में उतारे।

वैश्विक मंच पर भारतीय पहचान

आज ओल्ड मोंक सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अफ्रीका सहित दुनिया के 50 से अधिक देशों में ओल्ड मोंक को बड़े चाव से निर्यात किया जाता है। विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों के लिए यह बोतल भारत की यादों और जड़ों से जुड़ने का एक जरिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ओल्ड मोंक को इसके बेजोड़ स्वाद के लिए कई स्वर्ण पदक और पुरस्कार मिल चुके हैं। मदिरा विशेषज्ञ मानते हैं कि ओल्ड मोंक को कम से कम 7 साल तक ओक के पीपों (Casks) में परिपक्व (Ageing) किया जाता है, जिससे इसे वह खास चॉकलेटी और वैनिला का फ्लेवर मिलता है, जो दुनिया की महंगी से महंगी रम में भी दुर्लभ है।

ओल्ड मोंक-एक अमर विरासत

जनवरी 2018 में 88 वर्ष की आयु में कपिल मोहन इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन वे अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गए जो आज भी उतनी ही जीवंत है। विश्व रम दिवस के मौके पर ओल्ड मोंक की कहानी हमें याद दिलाती है कि एक बेहतरीन उत्पाद बनाने के लिए केवल व्यावसायिक बुद्धि नहीं, बल्कि एक निष्ठा और विजन की जरूरत होती है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने खुद कभी मदिरा का स्वाद नहीं चखा, उसने देश की सबसे बड़ी मदिरा क्रांति की पटकथा लिखी। ओल्ड मोंक आज भी भारतीय पॉप-कल्चर का एक अभिन्न हिस्सा है। यह सर्दियों की रातों में गुनगुने पानी के साथ, दोस्तों की महफिलों में कोला के साथ, और पुरानी यादों के दौर में बीते दिनों के साथ हमेशा मौजूद रहती है। कपिल मोहन और उनकी ओल्ड मंक की यह दास्तान भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के पन्नों में हमेशा सुनहरे अक्षरों में दर्ज रहेगी।

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