कई बार इंसान अपने जीवन से नहीं, बल्कि अपने जाने के बाद किए गए काम से हमेशा के लिए याद किया जाता है। मध्य प्रदेश के इंदौर निवासी 25 वर्षीय गौरव दवे ने भी कुछ ऐसा ही कर दिखाया। उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले परिवार के सामने अंगदान की इच्छा जताई थी और उनके निधन के बाद उसी इच्छा ने छह लोगों के जीवन में नई उम्मीद जगा दी। 13 जुलाई को गौरव दवे को अचानक ब्रेन हेमरेज हुआ, जिसके बाद उन्हें इंदौर के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने कई दिनों तक उनका इलाज किया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। आखिरकार 26 जुलाई को चिकित्सकों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया।
मां को याद आई बेटे की दो महीने पुरानी बात
गौरव के पिता सतीश दवे के अनुसार, करीब दो महीने पहले पूरा परिवार एक साथ भोजन कर रहा था। उसी दौरान गौरव ने सहज अंदाज में अपनी मां कविता दवे से कहा था कि यदि कभी उसके साथ कोई अनहोनी हो जाए तो उसके अंग जरूरतमंद लोगों को दान कर दिए जाएं। उस समय किसी ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन जब डॉक्टरों ने गौरव को ब्रेन डेड घोषित किया, तब मां को बेटे की वही बात याद आई। इकलौते बेटे को खोने का दुख असहनीय था, फिर भी परिवार ने उसकी अंतिम इच्छा पूरी करने का साहसिक फैसला लिया।
एक फैसले ने छह परिवारों की जिंदगी बदल दी
अंगदान के लिए कार्य करने वाली सामाजिक संस्था ‘मुस्कान’ ने परिवार को पूरी प्रक्रिया समझाई। इसके बाद दवे परिवार ने अंगदान की सहमति दे दी। अस्पताल ने राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण प्रोटोकॉल के तहत गौरव के अंग विभिन्न मरीजों को आवंटित किए। गौरव का हृदय अहमदाबाद के एक मरीज में प्रत्यारोपित किया गया। उनका लिवर इंदौर के एक मरीज को लगाया गया, जबकि दोनों किडनियां इंदौर के दो अलग-अलग मरीजों को मिलीं। उनकी दोनों आंखों से भी दो लोगों को नई रोशनी मिलने की उम्मीद है। हालांकि फेफड़े चेन्नई भेजे जाने थे, लेकिन लॉजिस्टिक कारणों से उनका प्रत्यारोपण नहीं हो सका।
गार्ड ऑफ ऑनर के साथ दी गई अंतिम विदाई
गौरव दवे के अंगदान के सम्मान में मुख्यमंत्री के निर्देश पर उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर के साथ अंतिम विदाई दी गई। यह सम्मान न केवल उनके परिवार के लिए गर्व और भावुकता का पल था, बल्कि पूरे समाज के लिए अंगदान के महत्व का प्रेरक संदेश भी बन गया।
फिल्म इंडस्ट्री में बना रहे थे अपनी पहचान
खजूरी बाजार निवासी गौरव दवे पेशे से फिल्म कास्टिंग डायरेक्टर थे। वह इंदौर के साथ-साथ मुंबई में भी काम कर रहे थे और मनोरंजन जगत में अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे थे। उनके मित्र तनय जोशी बताते हैं कि गौरव बेहद मिलनसार, सकारात्मक सोच वाले और बड़े सपने देखने वाले इंसान थे। उनके अनुसार, गौरव हमेशा कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे लोग उन्हें याद रखें। शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि उनका सबसे बड़ा योगदान उनकी मृत्यु के बाद सामने आएगा।
निष्कर्ष
गौरव दवे अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका दिल आज भी किसी के सीने में धड़क रहा है, उनकी आंखें किसी की दुनिया रोशन करेंगी और उनके अंग कई परिवारों की उम्मीद बन चुके हैं। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक व्यक्ति का अंतिम निर्णय कई लोगों के लिए नई शुरुआत बन सकता है। अंगदान केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवता की सबसे बड़ी सेवा है।

