तीन दिन, 28 घंटे और सत्ता का नया समीकर क्या बदल जाएगा भारतीय लोकतंत्र का डिजाइन?

The CSR Journal Magazine
संसद के विशेष सत्र की गतिविधियों ने राजनीतिक हवा में हलचल मचा दी है। तीन दिन (16-18 अप्रैल) के इस सत्र का असर देश की राजनीति पर गहरा होने वाला है। यहाँ तक कि सरकार द्वारा लाया जाने वाला महिला आरक्षण बिल केवल महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सत्ता के संतुलन का भी मामला है। इस महत्वपूर्ण बहस में लगभग 25 से 28 घंटे का समय लगेगा, जिसमें महिलाएं और पावर बैलेंस दोनों का भविष्य तय होगा।

महिला आरक्षण का सपना, पर रास्ते में कई रोड़े

केंद्र सरकार ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को 2029 तक लागू करने की योजना बना रही है, लेकिन इसके लिए परिसीमन और सीटों का नया गणित सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। महिला आरक्षण का उद्देश्य 33% महिलाओं को प्रतिनिधित्व देना है, लेकिन यह दावा करने वाले मुद्दे का एक बड़ा हिस्सा सीटों के पुनर्विभाजन और राज्यों के बीच संतुलन है। इस बार की बहस न केवल सीटों के लिए, बल्कि पूरे लोकतंत्र के डिजाइन के लिए अहम होगी।

विधान मंडल को नया रूप देने का समय

इस विधेयक में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 850 करने का प्रस्ताव है, जिसमें करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। इसका मतलब साफ है कि इस बिल से न केवल संसद का नक्शा बदलेगा, बल्कि राजनीतिक परिदृश्य भी आमूलचूल बदल जाएगा। सरकार की योजना 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने की है, ताकि 2029 से आरक्षण लागू किया जा सके।

संख्याओं का खेल: सरकार की चुनौती

NDA के पास लोकसभा में करीब 292-293 सांसद हैं, जबकि संविधान संशोधन के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता है। पूर्ण सदन की उपस्थिति में लगभग 362 वोट की जरूरत है, यानि सरकार को लगभग 70 अतिरिक्त वोट की तलाश है। राज्यसभा में स्थिति और भी जटिल है, जहां NDA के पास लगभग 141 सीटें हैं लेकिन 164 के आंकड़े से दूर है, जिससे बाहर के दलों का समर्थन आवश्यक हो जाता है।

दक्षिण भारत की चिंता, उत्तर का फायदा?

दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु, तेलंगाना, और कर्नाटक में विधानसभा और लोकसभा सीटों को लेकर चिंता बढ़ रही है। इन राज्यों का तर्क है कि उनकी जनसंख्या नियंत्रण की मेहनत अब नुकसान में ढल जाएगी। नई सीटों का आवंटन उत्तर भारत को मजबूत करेगा और दक्षिण के राजनीतिक वजन को कम करेगा। विरोध की आहट सुनाई दे रही है, और सभी दलों के बीच स्पष्ट सलाह दी जा रही है कि सहमति के बिना आगे बढ़ने का प्रयास न किया जाए।

क्या बनेगा सहमति या टकराव?

आने वाले 16-17 अप्रैल को लोकसभा में चर्चा और 18 अप्रैल को राज्यसभा में इस मामले पर विचार होगा। महिला आरक्षण का भविष्य और सियासत का नया गणित इस बहस में तय होगा। इस केस में सरकार का फोकस ‘नारी शक्ति’ पर है, जबकि विपक्ष इसे ‘परिसीमन’ और फेडरल बैलेंस की लड़ाई मानता है। प्रश्न यह है कि क्या सहमति होगी या आंतरिक टकराव ही सुर्खियों में रहेगा, क्योंकि यह मामला केवल सीटों का नहीं बल्कि सत्ता के संतुलन और लोकतंत्र के डिजाइन का है।

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