क्या ‘सुपर अल नीनो’ बनेगा दुनिया के लिए खतरे की घंटी? भारत पर मंडरा रहा सूखा, गर्मी और जल संकट का बड़ा खतरा

The CSR Journal Magazine
धरती के लगातार बढ़ते तापमान और बदलते मौसम के बीच वैज्ञानिक अब ‘सुपर अल नीनो’ को लेकर गंभीर चेतावनी दे रहे हैं।
माना जा रहा है कि 2026-27 में बनने वाला सुपर अल नीनो भारत समेत पूरी दुनिया के मौसम पर बड़ा असर डाल सकता है।
इससे मानसून कमजोर पड़ने, भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़ और खाद्य संकट जैसी स्थितियां पैदा होने की आशंका जताई जा रही है।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति मजबूत हुई तो आने वाले साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और चरम मौसम घटनाओं के गवाह बन सकते हैं।

45 डिग्री पार तापमान के बीच बढ़ी चिंता

देश के कई हिस्सों में तापमान लगातार 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना हुआ है। इसी बीच मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस साल का मानसून 2002 जैसे कमजोर मानसून की याद दिला सकता है। मौसम विभाग और निजी एजेंसियों के मुताबिक अल नीनो की सक्रियता मानसून को कमजोर कर सकती है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि जून में सामान्य बारिश हो सकती है, लेकिन जुलाई, अगस्त और सितंबर में वर्षा कम रहने की आशंका है। अगर ऐसा हुआ तो खेती, जल स्रोत और बिजली उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है।

आखिर क्या है सुपर अल नीनो?

अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। जब महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है, तब इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर दिखाई देता है।
सामान्य तौर पर यह प्रक्रिया हर 2 से 7 साल में होती है, लेकिन जब समुद्र का तापमान बेहद ज्यादा बढ़ जाए और उसके प्रभाव दुनिया भर में चरम स्तर पर महसूस हों, तब उसे ‘सुपर अल नीनो’ कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार अक्टूबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से करीब 2 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा हो सकता है, जो सुपर अल नीनो की स्थिति मानी जाती है।

भारत के लिए क्यों है सबसे बड़ा खतरा?

भारत की अर्थव्यवस्था और खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। ऐसे में सुपर अल नीनो का सबसे बड़ा असर भारत पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके कारण मानसून कमजोर हो सकता है, जिससे सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
कम बारिश का सीधा असर धान, गेहूं, दाल और गन्ने जैसी फसलों पर पड़ेगा। भूजल स्तर तेजी से नीचे जा सकता है और गांवों से लेकर शहरों तक पानी का संकट गहरा सकता है। इसके अलावा अल नीनो के वर्षों में हीटवेव भी ज्यादा खतरनाक हो जाती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि ऐसे समय में तापमान सामान्य से काफी ऊपर चला जाता है, जिससे जनजीवन प्रभावित होता है और स्वास्थ्य संकट बढ़ सकता है।

इतिहास में तबाही मचा चुके हैं बड़े अल नीनो

इतिहास में कई बार सुपर अल नीनो ने दुनिया भर में तबाही मचाई है।
1877-78 के सुपर अल नीनो को सबसे विनाशकारी माना जाता है। इसके कारण भारत, चीन और ब्राजील में भीषण अकाल पड़ा था और करोड़ों लोगों की मौत हुई थी। 1997-98 के अल नीनो के दौरान इंडोनेशिया में जंगलों में भयंकर आग लगी, जबकि पेरू और इक्वाडोर में भारी बाढ़ आई थी।
2015-16 में आए अल नीनो के दौरान पृथ्वी ने रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया और भारत समेत कई देशों में भीषण गर्मी पड़ी।
2023-24 का अल नीनो भी दुनिया के सबसे गर्म वर्षों में शामिल रहा। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर 2026 का सुपर अल नीनो और ज्यादा शक्तिशाली हुआ तो 2027 अब तक का सबसे गर्म साल बन सकता है।

क्या यह प्रकृति की चेतावनी है?

विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार बढ़ती चरम मौसमी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि पृथ्वी का जलवायु संतुलन बिगड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन के कारण महासागर तेजी से गर्म हो रहे हैं।
वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया गया, तो भविष्य में सुपर अल नीनो जैसी घटनाएं और ज्यादा खतरनाक रूप ले सकती हैं। इसका असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और इंसानी जीवन पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।

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