सबरीमाला संग्राम: 7 दिन की बहस, 9 जज और एक ऐतिहासिक फैसला, क्या बदलेगी सदियों पुरानी प्रथा?

The CSR Journal Magazine

सबरीमाला केस: सुप्रीम कोर्ट में 7 दिन की सुनवाई, धार्मिक भेदभाव पर उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई अपने महत्वपूर्ण पड़ाव पर है। 22 अप्रैल, 2026 को सुनवाई का सातवां दिन रहा, जहाँ 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच के संतुलन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

महिलाओं की एंट्री पर सुनवाई का समय आया

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले में बुधवार को सुनवाई शुरू हो गई है। धार्मिक भेदभाव और महिलाओं की एंट्री पर ये केस काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। पहले छठे दिन की सुनवाई में कोर्ट ने ये कहा था कि अगर राज्य किसी धार्मिक प्रथा पर सामाजिक सुधार के नाम पर रोक लगाता है, तो उसकी जांच कोर्ट कर सकता है। इस दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके पास कुछ सीमाएं हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोर्ट को अधिकार नहीं है।

9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है

इन समय चर्चित इस मामले में आज सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक बेंच सुनवाई कर रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की समीक्षा कर रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य के पास सामाजिक कुरीतियों को सुधारने की व्यापक शक्ति है और वह इस मामले में “अजनबी” नहीं है। इस मामले में धार्मिक आस्था से जुड़े 66 सवाल भी उठाए गए हैं। उम्मीद की जा रही है कि आज कोई फैसला आ सकता है, हालांकि कोर्ट इसे रिजर्व भी कर सकता है। यह मामला तब से चर्चा में है जब केरल हाईकोर्ट ने 1991 में मासिक धर्म वाली महिलाओं की एंट्री पर रोक लगाई थी।

2018 में बैन हटाने के बाद स्थिति क्या रही?

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री पर लगे बैन को हटा दिया था। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर अब सुनवाई चल रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है। सबरीमाला का मामला कई धार्मिक और सामाजिक मुद्दों से जुड़ा हुआ है, जिससे इसका जटिलता बढ़ गई है।

केंद्र सरकार की दलीलें

सुनवाई के पहले तीन दिन में, केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के खिलाफ दलीलें रखीं। सरकार का कहना था कि कई देवी मंदिरों में भी पुरुषों की एंट्री पर बैन है। ऐसे में धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना जरूरी है। शुरुआत में ही केंद्र ने साफ किया कि इस मामले में संवैधानिक प्रावधानों का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसे लेकर कई धार्मिक और सामाजिक सक्रियताएँ चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

सुप्रीम कोर्ट के सवाल और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले रुख में कई अहम सवाल उठाए हैं। सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि क्या किसी भक्त को उसके जन्म या वंश के आधार पर देवता को छूने से रोकना संवैधानिक सुरक्षा के दायरे में आता है। कोर्ट ने इस पर भी चर्चा की कि क्या महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) के तहत देखा जा सकता है। केंद्र सरकार ने दलील दी कि सबरीमाला में प्रतिबंध केवल लिंग आधारित नहीं हैं, बल्कि यह सांप्रदायिक आस्था का विषय है और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने टिप्पणी की कि “सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म के मूल को खोखला नहीं किया जा सकता”। उन्होंने कहा कि अगर मंदिर में एंट्री पर रोक लगाई जाएगी तो इससे समाज में और ज्यादा बंटवारा होगा। कोर्ट ने आगे इस बात पर भी चर्चा की कि क्या छूने से देवता अपवित्र हो सकते हैं।

अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार) बनाम अनुच्छेद 26 (संस्थागत अधिकार)

यह बहस भारतीय संविधान के दो सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अधिकारों के बीच के टकराव पर आधारित है।
अनुच्छेद 25: यह हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने का अधिकार देता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह अधिकार सभी महिलाओं को मिलता है, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो, और उन्हें भगवान अयप्पा की पूजा करने से नहीं रोका जा सकता।
अनुच्छेद 26: यह धार्मिक संप्रदायों (जैसे सबरीमाला मंदिर का प्रबंधन) को अपने धार्मिक मामलों का खुद प्रबंधन करने का अधिकार देता है। मंदिर पक्ष का तर्क है कि उनकी “परंपरा” और “देवता के नैष्ठिक ब्रह्मचारी स्वरूप” की रक्षा करना अनुच्छेद 26 के तहत उनका अधिकार है।
मुख्य विवाद: क्या किसी संस्था का अधिकार (Art 26) किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार (Art 25) को छीन सकता है?

आवश्यक धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) का सिद्धांत

कोर्ट यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि क्या महिलाओं का प्रवेश वर्जित रखना इस धर्म का अनिवार्य हिस्सा है? अगर यह “अनिवार्य” है, तो कोर्ट इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा। लेकिन अगर यह केवल एक “परंपरा” है जो भेदभाव करती है, तो कोर्ट इसे रद्द कर सकता है।

 संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality)

कोर्ट में इस बात पर तीखी बहस चल रही है कि “नैतिकता” का मतलब क्या है? रूढ़िवादी पक्ष के मुताबिक नैतिकता का अर्थ समाज और धर्म की मान्यताओं से है। जबकि
कोर्ट के नजरिए से नैतिकता का अर्थ ‘संवैधानिक नैतिकता’ है, जिसमें समानता, स्वतंत्रता और गरिमा सबसे ऊपर है।

अस्पृश्यता (Article 17)

एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या मासिक धर्म (menstruation) के आधार पर महिलाओं को रोकना ‘अस्पृश्यता’ के समान है? अगर कोर्ट इसे अस्पृश्यता मानता है, तो यह पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगा। 9 जजों की यह पीठ यह तय करेगी कि क्या धर्म के नाम पर समानता के अधिकार (Article 14) का उल्लंघन किया जा सकता है या नहीं।

केरल सरकार का पक्ष

केरल सरकार का रुख पिछले कुछ वर्षों में काफी बदलता रहा है। 2018 में तत्कालीन राज्य सरकार ने महिलाओं के प्रवेश का पुरजोर समर्थन किया था और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने की कोशिश की थी। लेकिन अब केरल सरकार ने अपना रुख नरम कर लिया है। राज्य ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह इस मामले में विद्वानों और सुधारकों के विचारों को सुनने के बाद ही कोई निष्पक्ष निर्णय ले। राज्य सरकार अब उन पुनर्विचार याचिकाओं (Review Petitions) के साथ शामिल होना चाहती है जो 2018 के फैसले को बदलने की मांग कर रही 

आगे की सुनवाई की जानकारी

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू हुई थी और अब तक कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बहस हो चुकी है। इस मामले में सबरीमाला मंदिर प्रबंधन ने भी अपना पक्ष रखा है कि यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, ना कि कोई सामान्य स्थान जैसे रेस्टोरेंट। अब आगे की सुनवाई में यह देखना होगा कि कोर्ट इसके खिलाफ क्या फैसला लेता है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री से जुड़े मुद्दे पर कोर्ट का निर्णय भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

 

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