सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश: पैसे मांगने के लिए बहुओं को ‘निचोड़ना’ और मायके वालों को दुत्कारना अब बंद हो
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के एक दहेज हत्या मामले में आरोपी पति और उसके परिवार की सजा बरकरार रखते हुए सख्त टिप्पणी की है कि शादी के बाद किसी भी लड़के या उसके परिवार को बहू और उसके मायके वालों का अपमान करने या उन्हें ‘भिखारी’ कहने का कोई अधिकार नहीं है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने साफ संदेश दिया कि समाज में अब दुल्हन या उसके परिवार की बेइज्जती किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
दहेज प्रताड़ना से जुड़ी एक गंभीर सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सख्त संदेश दिया। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा कि बहू और उसके परिवार का अपमान करने वाले पहलुओं पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। उन्होंने इस मामले में स्पष्ट किया कि इस तरह का व्यवहार पूरी तरह अस्वीकार्य है। मामला छत्तीसगढ़ में 2010 में हुई एक महिला की दुखद मौत से जुड़ा है।
मामले की पृष्ठभूमि (छत्तीसगढ़, 2010)
यह मामला साल 2010 का है, जहां शादी के महज तीन साल के भीतर एक महिला ने ससुराल में प्रताड़ना से तंग आकर फांसी लगा ली थी।निचली अदालतों का फैसला: निचली अदालत और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आरोपी पति और उसके परिवार को धारा 304B (दहेज हत्या), 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 498A (क्रूरता) के तहत दोषी ठहराया था। आरोपी पक्ष ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
भिखारी कहकर अपमान की निंदनीय प्रथा
कोर्ट के अनुसार, महिला के परिवार को बार-बार भिखारी कहा जा रहा था, जो बहुत ही अपमानजनक था। जस्टिस नागरत्ना ने इस दौरान कहा, “लड़के और उसके परिवार की कोशिश होती है कि बहू और उसके परिवार से और पैसे निकाले जाएं।” उन्होंने मामले की गंभीरता को समझाते हुए बताया कि पति और उसके परिवार की दहेज की मांग ने महिला की मृत्यु में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रिकॉर्ड पर लगे आरोपों का जिक्र
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि जब लड़की के पिता ने 60 हजार रुपए देने का प्रस्ताव रखा, तो शायद सोचा गया कि वे भिखारी हैं। उन्होंने अपने शब्दों को फिर से दोहराते हुए कहा, “आपको चुप रहना चाहिए था। क्या आपने कभी सोचा है कि इस प्रकार का व्यवहार असंवेदनशील है?”
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां-“मकसद सिर्फ निचोड़ना होता है”
जस्टिस नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस तरह के मामलों में ससुराल वालों का असली मकसद सिर्फ दुल्हन और उसके परिवार को आर्थिक रूप से “निचोड़ना” होता है। कोर्ट में सामने आया कि लड़की का परिवार जब अपनी बेटी को बचाने की गुहार लगा रहा था और सामर्थ्य के अनुसार 60,000 रुपये देने की बात कह रहा था, तब लड़के वालों ने उन्हें दुत्कारते हुए ‘भिखारी’ कहा था। इस पर कोर्ट ने तीखी आपत्ति जताई।
शादी के बाद अपमान क्यों?
पीठ ने सवाल उठाया, “आखिर लड़के लड़कियों से शादी ही क्यों करते हैं, अगर उन्हें शादी के बाद लड़की और उसके परिवार का अपमान ही करना है?” पीठ में शामिल जस्टिस भुइयां ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि पढ़े-लिखे लोग भी इस तरह की घिनौनी और प्रताड़ित करने वाली हरकतें कर रहे हैं।
पति के छोटे भाई की याचिका का निराधार होना
कोर्ट पति के छोटे भाई द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसने IPC की धारा 498A के तहत दी गई सजा को चुनौती दी थी। हालांकि, कोर्ट ने उसकी अपील को खारिज करते हुए राहत देने से इनकार कर दिया। यही नहीं, कोर्ट ने यह भी माना कि दहेज की मांग का संबंध महिला की मृत्यु से सीधा है।
हाईकोर्ट ने भी किया ट्रायल कोर्ट का समर्थन
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कई परिवार के सदस्यों को दहेज हत्या, आत्महत्या के लिए उकसाने और क्रूरता के आरोपों में दोषी ठहराया गया था। याचिकाकर्ता ने FIR में देरी का मुद्दा उठाया, लेकिन कोर्ट ने इस बात को भी स्वीकार नहीं किया।
महिलाओं के प्रति व्यवहार पर गहरा सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस उज्जल भुइयां ने भी टिप्पणी की कि ये सभी पढ़े-लिखे लोग हैं, फिर भी इस प्रकार की घटनाएँ समाज में घटित हो रहीं हैं। यह दर्शाता है कि समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान की कमी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की घटनाओं को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण फैसले की पुष्टि
आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के निष्कर्षों को सही मानते हुए याचिका को खारिज कर दिया। यह मामला सुचित केशरी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य से संबंधित है, जो कि समाज में दहेज प्रथा के खिलाफ एक मजबूत संदेश देने जा रहा है।
समाज के लिए कड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ ने आरोपियों को कोई भी राहत देने या जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि अदालतों के ऐसे फैसलों से समाज में यह कड़ा संदेश जाना चाहिए कि दहेज के लिए बहुओं को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ना और उनके माता-पिता को अपमानित करना अब कानूनन बेहद भारी पड़ेगा।
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