Maharashtra MLC Election 2026: महायुति में सीटों का गणित सुलझा, अब किसने बढ़ाई मुश्किलें?
महाराष्ट्र विधान परिषद की 17 सीटों के लिए महायुति ने लंबे मंथन के बाद सीटों का बंटवारा तो तय कर लिया है, लेकिन भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर गठबंधन के भीतर उठ रही असहमति का समाधान नहीं हुआ, तो महायुति को अनावश्यक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। अब विशेषज्ञों की नजर इस बात पर है कि महायुति की रणनीति कितनी सफल होगी।
महायुति के भीतर असंतोष की लहर
महाराष्ट्र विधान परिषद की 17 सीटों पर आगामी 18 जून को होने वाले चुनावों के लिए महायुति (भाजपा, शिवसेना और एनसीपी) का सीट शेयरिंग फॉर्मूला तय हो चुका है, जिसके तहत भाजपा सबसे ज्यादा 11 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। लंबे मंथन और शुरुआती मतभेदों के बाद इस समझौते को अंतिम रूप दिया गया है, जिसमें शिवसेना (शिंदे गुट) को 4 और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजीत पवार गुट) को 2 सीटें मिली हैं। गठबंधन के शीर्ष नेताओं ने भले ही मतभेदों से इंकार किया हो, लेकिन जमीनी स्तर पर और छोटे दलों के भीतर सीटों की संख्या को लेकर असंतोष के स्वर उठ रहे हैं।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, महायुति की चुनावी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे आंतरिक असंतोष को कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से संभालते हैं।
सीटों का अंतिम विभाजन
गठबंधन के भीतर लंबे समय तक चली रस्साकशी के बाद सीटों का अंतिम बंटवारा इस प्रकार हुआ है-
भारतीय जनता पार्टी (BJP): 11 सीटें
शिवसेना (शिंदे गुट): 04 सीटें
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP): 02 सीटें
गठबंधन के सामने मुख्य चुनौतियाँ-आंतरिक असंतोष
शुरुआती दौर में शिवसेना 7 और एनसीपी कम से कम 3 सीटों की मांग कर रही थी। भाजपा द्वारा ‘शेर का हिस्सा’ (Lion’s Share) लेने के बाद क्षेत्रीय नेताओं और टिकट के दावेदारों के भीतर नाराजगी पनप रही है जो भविष्य में भितरघात का कारण बन सकती है।
विपक्षी महाविकास अघाड़ी (MVA) की घेराबंदी
एमवीए ने सभी 17 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है, जिसमें कांग्रेस 8, शिवसेना-यूबीटी 4 और शरद पवार की एनसीपी 3 सीटों पर दांव खेल रही है (शेष 2 पर बातचीत जारी है)। विपक्ष इस असंतोष का फायदा उठाने की कोशिश में है। चूंकि यह स्थानीय निकाय सदस्यों द्वारा चुना जाने वाला अप्रत्यक्ष चुनाव है, इसलिए हर एक वोट की कीमत अहम है। गठबंधन के बड़े नेताओं को अपने सभी विधायकों और स्थानीय प्रतिनिधियों को एकजुट रखना होगा।
शिवसेना की मांग पर विवाद
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना पार्टी ने 6 सीटों की मांग की थी, लेकिन उसे अंततः चार सीटों पर संतोष करना पड़ा। राजनीतिक गलियारों में अटकलें लगाई जा रही थीं कि शिवसेना को एक अतिरिक्त सीट मिल सकती थी, लेकिन भाजपा ने अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया। इस स्थिति से अंदरूनी असंतोष उभरने लगा है।
महायुति का रुख और रणनीति
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने स्पष्ट किया है कि गठबंधन के भीतर कोई मतभेद नहीं है और महायुति सभी 17 सीटों पर एकजुट होकर ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी। संख्या बल के लिहाज से वर्तमान में महायुति का पलड़ा भारी दिख रहा है, लेकिन क्रास वोटिंग के खतरे को टालने के लिए शीर्ष नेतृत्व को रूठे हुए नेताओं को समय रहते मनाना होगा।
राष्ट्रवादी कांग्रेस का लाभ
अजित पवार की नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को दो सीटें मिली हैं, जिनमें पुणे और रायगढ़ शामिल हैं। रायगढ़ सीट पर सुनील तटकरे के बेटे को उम्मीदवार बनाया गया है, जिससे शिवसेना में विरोध की आवाजें उठने लगी हैं। इस बीच, स्थानीय स्तर पर कुछ नेताओं की नाराजगी बरकरार है, जिससे स्थिति और भी जटिल हो गई है।
ठाणे और नासिक में खींचतान जारी
भाजपा ने धाराशिव-बीड़-लातूर सीट पर पूर्व विधायक बसवराज पाटिल को उम्मीदवार बनाया है। लेकिन इसके चलते स्थानीय कार्यकर्ताओं में असंतोष दिखाई देने लगा है। ठाणे और नासिक की सीटों पर भी खींचतान देखने को मिली है। भाजपा ने इन दोनों क्षेत्रों में अपने मजबूत चेहरे को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
अब्दुल सत्तार की चुनौती
वर्धा-चंद्रपुर-गड़चिरौली सीट से बीजेपी ने अरुण लखानी को उम्मीदवार बनाया है, जो सांसद सुप्रिया सुले के समधी हैं। वहीं, जालना-छत्रपति संभाजीनगर सीट पर खतरे की घंटी बजने लगी है। पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार ने अपने बेटे का नामांकन दाखिल कराकर स्थिति को और उलझा दिया है।
यवतमाल और शिवसेना के भीतर मतभेद
यवतमाल सीट पर भी शिवसेना की जगह विवाद सामने आया है। मंत्री संजय राठौड़ ने अपनी पत्नी के लिए टिकट मांग कर चर्चा को बढ़ा दिया, लेकिन पार्टी ने उनकी मांग को स्वीकार नहीं किया। इससे शिवसेना के भीतर और भी मतभेद उभरकर सामने आए हैं।
महायुति की चुनावी शक्ति
महायुति ने सभी 17 सीटों पर चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है, लेकिन स्थानीय स्तर की नाराजगी और संभावित बगावत एक चुनौती बनी हुई है। चुनावी गणित को देखते हुए महायुति की स्थिति मजबूत नजर आ रही है, लेकिन असंतोष का हल निकालना आवश्यक है।
बगावत से महायुति की राह होगी कठिन?
महायुति की राह में कांटे बिछे हुए हैं। कई क्षेत्रों में असंतोष और नाराजगी खुलकर सामने आई है। यदि नामांकन वापसी की अंतिम तिथि तक इन नाराज नेताओं को मनाने में महायुति सफल नहीं होती है, तो कुछ सीटों पर मुकाबला शायद अपेक्षा से अधिक कठिन हो सकता है।
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