भारतीय महिलाओं को चुनावी Promises नहीं, Justice चाहिए : झूठे राजनीतिक वादों के खिलाफ बढ़ रहा है गुस्सा

The CSR Journal Magazine
अब बस कीजिए। हमारी मांओं, बहनों और बेटियों के दर्द को चुनाव जीतने का हथियार बनाना बंद कीजिए। हर चुनाव में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। मंचों से कहा जाता है कि “हम बेटियों की रक्षा करेंगे”, “महिलाओं को सम्मान देंगे”, “हर बहन सुरक्षित रहेगी।” लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होता है और कुर्सी मिल जाती है, वैसे ही ये वादे भी खत्म हो जाते हैं।
सबसे हैरानी की बात यह है कि चुनाव के समय महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों पर बड़े-बड़े वादे करने वाले कई बड़े नेता, सत्ता में आने के बाद महिलाओं के खिलाफ हो रहे भयानक अपराधों पर चुप्पी साध लेते हैं। यह समझ से परे है कि जब देश की बेटियां रेप, दहेज हत्या, हिंसा और उत्पीड़न का शिकार हो रही हों, तब वही नेता एक मजबूत बयान तक देना जरूरी नहीं समझते जिन्होंने महिलाओं से वोट मांगते समय खुद को उनका सबसे बड़ा रक्षक बताया था। क्या देश की महिलाओं को सिर्फ चुनाव जीतने तक ही याद रखा जाएगा? क्या एक संवेदनशील बयान देना भी अब राजनीतिक नुकसान-फायदे से तय होगा? जब देश का सबसे बड़ा नेता किसी दर्दनाक घटना पर चुप रहता है, तो यह चुप्पी सिर्फ शब्दों की कमी नहीं होती, यह लाखों महिलाओं के टूटते भरोसे की आवाज बन जाती है।
महिलाएं अब सब समझ रही हैं। वे देख रही हैं कि चुनाव के समय उनके आंसुओं पर राजनीति होती है, लेकिन चुनाव के बाद उनकी चीखें सुनने वाला कोई नहीं होता। रेप की घटनाएं होती हैं, दहेज के लिए बेटियों को जला दिया जाता है, लड़कियों का शोषण होता है, महिलाएं डर में जीती हैं — लेकिन नेताओं की आवाज कुछ दिनों बाद शांत हो जाती है , टीवी की बहस बदल जाती है , सोशल मीडिया पर नए मुद्दे आ जाते हैं। लेकिन जिन परिवारों की बेटियां चली जाती हैं, उनका दर्द कभी खत्म नहीं होता।
भारत में हर चुनाव से पहले नेताओं को अचानक महिलाओं की याद आने लगती है। कोई मुफ्त योजना का वादा करता है, कोई पैसे देने की बात करता है, कोई सुरक्षा की गारंटी देता है। हर पार्टी महिलाओं को भरोसा दिलाती है कि वही उनकी सबसे बड़ी हितैषी है। करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च किए जाते हैं ताकि लोगों की भावनाओं को छुआ जा सके। लेकिन सच क्या है? सच यह है कि आज भी देश की लाखों महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं।
आज भी मां-बाप अपनी बेटी के घर लौटने तक डर में रहते हैं। आज भी दहेज के लिए बहुओं को प्रताड़ित किया जाता है। आज भी रेप पीड़िताओं को इंसाफ के लिए सालों तक भटकना पड़ता है। आज भी कई महिलाएं पुलिस स्टेशन जाने से डरती हैं क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं कि उनकी बात सुनी जाएगी। सबसे दर्दनाक बात यह है कि महिलाओं का दर्द भी राजनीति का हिस्सा बन चुका है। जब कोई बड़ी घटना होती है, नेता पहुंच जाते हैं , कैमरे आते हैं , बयान दिए जाते हैं। इंसाफ का वादा होता है लेकिन कुछ दिनों बाद सब शांत हो जाता है। नेता आगे बढ़ जाते हैं, राजनीति आगे बढ़ जाती है, लेकिन पीड़ित परिवार वहीं टूटकर रह जाता है।
एक मां जो अपनी बेटी को दहेज के कारण खो देती है, वह कभी नहीं भूलती , एक पिता जो अपनी बेटी का शव अस्पताल से लेकर आता है, वह कभी नहीं भूलता , एक लड़की जो रोज डर के साथ घर से निकलती है, वह कभी नहीं भूलती , लेकिन राजनीति भूल जाती है। यही इस देश की सबसे बड़ी दुखद सच्चाई बनती जा रही है।
यह समस्या सिर्फ एक पार्टी की नहीं है। सालों से लगभग हर राजनीतिक दल चुनाव के समय भावनाओं का इस्तेमाल करता आया है। जनता से बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद जनता से ज्यादा कुर्सी बचाने की चिंता होने लगती है। असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और राजनीति सिर्फ भाषण, प्रचार और वोटों के खेल में बदल जाती है। लेकिन अब देश की महिलाएं और युवा चुप नहीं हैं। वे सब देख रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि चुनाव के समय कैसे भावनाओं का इस्तेमाल किया जाता है। वे देख रहे हैं कि महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाती है।
देश को अब ऐसे नेताओं की जरूरत नहीं जो सिर्फ चुनाव के समय महिलाओं के आंसुओं की बात करें। देश को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो सच में महिलाओं की सुरक्षा के लिए लड़ें, जो रेप और दहेज हत्या को सिर्फ खबर नहीं बल्कि राष्ट्रीय संकट समझें। क्योंकि जिस देश में महिलाएं सुरक्षित नहीं होतीं, वह देश कभी सच में मजबूत नहीं बन सकता। और अगर राजनीतिक दल महिलाओं के दर्द का इस्तेमाल सिर्फ वोट लेने के लिए करते रहे, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हें इंसाफ, सुरक्षा और सम्मान नहीं दे पाए, तो एक दिन महिलाओं और युवाओं का गुस्सा इतना बड़ा हो जाएगा कि कोई भाषण, कोई नारा और कोई चुनावी वादा उसे शांत नहीं कर पाएगा।

Latest News

Popular Videos