योगी सरकार ने बदली शहीद ठाकुर रोशन सिंह के गांव की तस्वीर

The CSR Journal Magazine
क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अमर है। उनका जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर के नवादा गांव में हुआ था। शहीद ने देश के लिए अपना बलिदान दिया, लेकिन उनके गांव ने दशकों तक उपेक्षा का दर्द झेला। काकोरी कांड में गिरफ्तारी के बाद उनका नाम इतिहास में रह गया, परंतु उनके पैतृक गांव की समस्याएँ जस की तस रहीं। पिछले 70 सालों से विकास की मुख्यधारा से कटा यह गांव हर वर्ष बारिश में चार से पांच महीने तक दुनिया से कट जाता था।

सीएम योगी का मानवीय कदम

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जब इस गांव की पीड़ा सुनी, तो उन्होंने त्वरित कार्रवाई की। खन्नौत नदी पर पक्के पुल का निर्माण करने का आदेश दिया, जिससे गांव की हालत में सुधार आया। यह फैसला केवल एक पुल का निर्माण नहीं था, बल्कि शहीद के प्रति सम्मान का प्रतीक था। मुख्यमंत्री ने ना सिर्फ पुल का उद्घाटन किया, बल्कि शहीद के परिवार से भी मिले। वहां मौजूद ग्रामीणों की आंखों में आंसू थे, जो उनके प्रति कृतज्ञता की भावना दर्शा रहे थे।

गांव के विकास की नई शुरुआत

नवादा गांव में मुख्यमंत्री के आने का दिन एक ऐतिहासिक पल था। उन्होंने 30 दिसंबर 2018 को खन्नौत नदी पर बने पक्के पुल का उद्घाटन किया। इस पुल के बनने से अब मरीजों को अस्पताल पहुंचने में दिक्कत नहीं होती और बच्चों की पढ़ाई में रुकावटें दूर हो गई हैं। किसानों की उपज अब समय पर बाजार पहुंच रही है। सीएम योगी के इस विकास कार्य ने गांव के लोगों के जीवन में नई रोशनी भरी है।

शहीद की याद में बनाई गई सुविधाएँ

गांव में अब एक डिग्री कॉलेज और शहीद ठाकुर रोशन सिंह का स्मारक भी बनाया गया है। इससे नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों का बलिदान याद रहेगा और वह हमेशा देशभक्ति के विचारों से प्रेरित होंगी। कैंपस में स्टूडेंट्स अब अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त हैं। यह सब शहीद के संघर्ष और बलिदान की कहानी को भी जीवित रखेगा।

खन्नौत पुल: नई जिंदगी का प्रतीक

खन्नौत नदी पर बना यह पक्का पुल अब नवादा और अन्य आसपास के गांवों के लिए जीवन रेखा बन चुका है। यह पुल न केवल यातायात में सहुलियत लाता है, बल्कि गांववालों के लिए एक नई उम्मीद का संदेश देता है। अब एम्बुलेंस समय पर पहुँच रही हैं और छात्र स्कूल-कॉलेज आसानी से जा रहे हैं। यह गांव की विकास यात्रा का एक सुखद मोड़ है।

तीन पीढ़ियों का संघर्ष खत्म

यह कहानी केवल एक पुल बनने तक सीमित नहीं है। यह दशकों की उपेक्षा और शहीद के प्रति सम्मान का प्रतीक है। नवादा की यह धरती अब इतिहास की नई कहानी बुन रही है, जो देशभक्ति और बलिदान के प्रतीक के रूप में जीवित रहेगी। गांववासियों का अब यह सपना पूरा हुआ है कि उनका गाँव अब विकास की मुख्यधारा में शामिल हो गया है।

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