पंजाब 95 से सतलुज तक: दिलजीत दोसांझ की विवादित फिल्म का ZEE5 पर अनकट सफर

The CSR Journal Magazine

दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’: OTT पर फिल्म का नया नाम और रोमांचक रिलीज

अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की बहुचर्चित फिल्म जिसे पहले ‘पंजाब ’95’ (और उससे पहले ‘ग़लूघरा’) नाम दिया गया था, अब ‘सतलुज’ नाम से ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर चुपचाप रिलीज़ हो गई है। सेंसर बोर्ड (CBFC) के साथ करीब तीन साल तक चली लंबी कानूनी और सेंसरशिप की जंग के बाद, यह फिल्म बिना किसी कट (Uncut Version) के दर्शकों के सामने आई है।

ओटीटी पर रिलीज का इंतजार खत्म

दिलजीत दोसांझ की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘पंजाब ’95’ अब ‘सतलुज’ के नाम से ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज हो गई है। इस फिल्म के विषय में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी को दिखाया गया है। इसे सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) से सर्टिफिकेट पाने के लिए काफी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, जिसके बाद फिल्म के प्रशंसकों की खुशियों की कोई सीमा नहीं रही।

खालरा की कहानी पर आधारित फिल्म

यह फिल्म पंजाब के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता (Human Rights Activist) जसवंत सिंह खालरा की वास्तविक जिंदगी और उनके संघर्षों को दर्शाती है। फिल्म में जसवंत सिंह खालरा का मुख्य किरदार दिलजीत दोसांझ ने निभाया है। फिल्म 1990 के दशक के दौरान पंजाब में हुए उग्रवाद के दौर में कथित तौर पर गायब हुए और मारे गए हजारों लोगों के सच को सामने लाने की खालरा की बहादुरी और उनके अभूतपूर्व शोध की कहानी कहती है।

जसवंत सिंह खालरा का इतिहास

जसवंत सिंह खालरा पंजाब के इतिहास के एक ऐसे नायक हैं, जिन्होंने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। खालरा का जन्म 1952 में अमृतसर के खालरा गांव में हुआ था। उनके दादा, हरनाम सिंह, भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले गदर आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे और ऐतिहासिक कोमागाटा मारू जहाज के यात्रियों में शामिल थे। सामाजिक कार्यकर्ता बनने से पहले जसवंत सिंह खालरा अमृतसर में एक केंद्रीय सहकारी बैंक के निदेशक (Director) के रूप में कार्यरत थे।

खोज की शुरुआत (The Investigation)

1980 और 1990 के दशक में जब पंजाब में उग्रवाद चरम पर था, तब कई युवा अचानक गायब होने लगे थे। खालरा ने अपने कुछ लापता साथियों की तलाश शुरू की। इस दौरान उन्हें अमृतसर के श्मशान घाटों (पट्टी, तरनतारन और दुर्गियाना मंदिर) के नगरपालिका रिकॉर्ड और लकड़ी खरीद की रसीदें मिलीं। उन्होंने दस्तावेजों के जरिए साबित किया कि पंजाब पुलिस ने हजारों सिखों को ‘लावारिस या अज्ञात’ बताकर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के उनका अवैध रूप से अंतिम संस्कार कर दिया था। खालरा के शोध के मुताबिक, ऐसे 25,000 से अधिक लोग थे। 1995 में खालरा कनाडा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गए, जहां उन्होंने इस डेटा को सार्वजनिक किया और दुनिया को पंजाब के इस सच से रूबरू कराया।

अपहरण और शहादत

अंतरराष्ट्रीय दौरों से लौटने के बाद उन्हें लगातार धमकियां मिल रही थीं। 6 सितंबर 1995 को, जब वे अमृतसर में अपने घर के बाहर कार धो रहे थे, पंजाब पुलिस के अधिकारियों ने कथित तौर पर उनका अपहरण कर लिया। हिरासत में प्रताड़ना के बाद उनकी हत्या कर दी गई और उनका शव व्यास नदी में फेंक दिया गया। बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने इस मामले की जांच की, जिसने खालरा के दावों को सही पाया। साल 2005 में भारत की अदालतों ने खालरा के अपहरण और हत्या के आरोप में छह पुलिस अधिकारियों को दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।

सेंसरशिप का विवाद

सेंसर बोर्ड ने शुरू में फिल्म पर आपत्ति जताते हुए इसमें 120 से अधिक कट्स लगाने, शीर्षक बदलने और संवादों में बदलाव करने के निर्देश दिए थे, जिसके कारण फिल्म की थियेट्रिकल रिलीज बार-बार टलती रही। मेकर्स ने बिना किसी समझौते के फिल्म को मूल रूप (Uncut) में दर्शकों तक पहुंचाने के लिए इसे सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर स्ट्रीम करने का फैसला किया।

फिल्म की जीत और चुनौतियाँ

फिल्म को ओटीटी प्लेटफार्म पर लाने के लिए बहुत से अधिकारिक फॉर्मलिटीज पार करनी पड़ीं। फिल्म निर्माताओं ने कई महीनों तक इस परियोजना पर काम किया और विभिन्न न्यायालयों में भी गुहार लगाई। ये सभी प्रयास अब रंग लाए हैं और ‘सतलुज’ अब दर्शकों के समक्ष है।

फिल्म के मुख्य कलाकार

यह फिल्म अपने दमदार अभिनय और गंभीर कलाकारों के लिए चर्चा में है। जसवंत सिंह खालरा के रूप में दिलजीत ने इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है। उन्होंने खालरा के लुक, उनकी सादगी और उनके शांत लेकिन दृढ़ स्वभाव को पर्दे पर उतारा है। अर्जुन रामपाल फिल्म में एक पुलिस अधिकारी (एसपी) की महत्वपूर्ण भूमिका में हैं, जो खालरा के मिशन के इर्द-गिर्द की कानूनी और व्यवस्था संबंधी जटिलताओं को दिखाता है। ‘कोहरा’ (Kohrra) और ‘पाताल लोक’ जैसी वेब सीरीज से मशहूर हुए राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता सुविंदर विक्की भी फिल्म में एक मुख्य भूमिका में हैं।

हनी त्रेहान का कुशल निर्देशन

गीतिका विद्या ओहल्यान ने जसवंत सिंह खालरा की पत्नी, परमजीत कौर खालरा का सशक्त किरदार निभाया है, जिन्होंने अपने पति के लापता होने के बाद भी इंसाफ की लड़ाई को जारी रखा। कंवलजीत सिंह फिल्म में एक वरिष्ठ और अनुभवी किरदार के रूप में नजर आए हैं। फिल्म का निर्देशन मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर और फिल्म मेकर हनी त्रेहान ने किया है (जिन्होंने इससे पहले ‘रात अकेली है’ बनाई थी)।

दर्शकों की प्रतिक्रियाएँ

जैसे ही फिल्म का ट्रेलर जारी हुआ, दर्शकों की प्रतिक्रियाएँ भी आनी शुरू हो गईं। लोग फिल्म के कंटेंट और दिलजीत के अभिनय की सराहना कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि यह फिल्म सोशल मुद्दों को उठाने में सफल रहेगी। कलाकारों के प्रदर्शन और कहानी ने कई लोगों का ध्यान खींचा है।

फिल्म का महत्व

सतलुज की कहानी मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है। इससे न सिर्फ पंजाब के हालात का पता चलेगा, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज के रूप में भी काम कर सकती है। फिल्म को देखकर युवा पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी और वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे।

अगले कदम

अब जब ‘सतलुज’ ओटीटी पर उपलब्ध है, दर्शक इसे आसानी से देख सकते हैं। फिल्म की पहुँच को देखते हुए इसके निर्माता अब इसके प्रचार के कई अन्य माध्यमों पर विचार कर रहे हैं। यह फिल्म भारत के अलावा विदेशों में भी देखने के लिए सुर्खियाँ बटोर सकती है।

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