‘वे 3-4 लाख कमाते हैं, हमारी सैलरी क्यों नहीं बढ़ा सकते?’ मजदूरों के बाद अब नोएडा में मेड्स का प्रदर्शन

The CSR Journal Magazine

 

नोएडा और ग्रेटर नोएडा जैसे शहरी क्षेत्रों में घरेलू कामगार (साफ-सफाई, खाना बनाने और बच्चों की देखभाल करने वाले) अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पिछले कुछ समय से बढ़ती महंगाई और कम वेतन के कारण इन कामगारों में असंतोष पनप रहा था। अप्रैल 2026 में, यह असंतोष एक बड़े आंदोलन के रूप में सामने आया, जिसमें सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने सड़कों पर उतरकर अपनी मांगों को बुलंद किया।

मेड्स का बढ़ा प्रदर्शन, सैलरी बढ़ाने की मांग

नोएडा में पिछले कुछ दिनों से बढ़ती महंगाई ने लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। घरेलू कामगारों का प्रदर्शन अब शहर के सेक्टर 121 में क्लियो काउंटी के बाहर भी देखने को मिला। ये घरेलू कामगार अपनी सैलरी में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। हाल में हुए मजदूरों के प्रदर्शन के बाद, अब ये मेड्स भी अपनी आवाज उठाने लगी हैं। औद्योगिक श्रमिकों के लिए सरकार द्वारा घोषित 21% वेतन वृद्धि की तर्ज पर घरेलू कामगार भी अपने लिए सम्मानजनक वेतन की मांग कर रहे हैं।

महंगाई से परेशान, सैलरी बढ़ाने की है आवश्यकता

घर के कामकाज में काम करने वाली मेड्स ने कहा है कि आज के समय में जीने के लिए जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में उनकी वर्तमान सैलरी उनके लिए पर्याप्त नहीं है। एक मेड ने कहा, ‘यदि लोग ₹3-4 लाख कमाते हैं, तो हमारी सैलरी क्यों नहीं बढ़ाई जा सकती?’ यह सवाल सभी के मन में घूम रहा है। कामगारों का कहना है कि वर्तमान में प्रति घर मिलने वाला ₹2,500–₹3,500 का रेट बहुत कम है। वे इसे बढ़ाकर ₹5,000 प्रति कार्य करने की मांग कर रहे हैं।  गैस सिलेंडर, राशन और कमरे के किराए में भारी बढ़ोतरी के कारण वर्तमान सैलरी में घर चलाना मुश्किल हो गया है। अधिकांश हाउसिंग सोसायटियों में घरेलू कामगारों को कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं मिलती। उनकी मांग है कि महीने में कम से कम 4 छुट्टियां अनिवार्य की जाएं।

सड़कों पर सैकड़ों का जमावड़ा

प्रदर्शन का मुख्य केंद्र सेक्टर 121 स्थित क्लियो काउंटी (Cleo County) और आसपास की बड़ी सोसायटियां रहीं। प्रदर्शनकारियों ने सोसायटियों के गेट जाम किए और काम का बहिष्कार किया। कई जगहों पर पुलिस को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। इस आंदोलन को स्थानीय श्रमिक संगठनों और यूनियनों का भी समर्थन प्राप्त हुआ है। उन्होंने अपनी मांग को लेकर नारेबाजी की और अपनी समस्याओं को सरकार और स्थानीय अधिकारियों के सामने रखने की कोशिश की। उनका स्पष्ट कहना था कि वे अपने काम के लिए उचित पारिश्रमिक की हकदार हैं। प्रदर्शन करने वाले कामगारों में गुस्सा और आक्रोश नजर आ रहा था, और वे अपनी मांगों पर अडिग हैं।

मौजूदा स्थिति में एसी की जरूरत

घरेलू कामकाजी लौटने के बाद उनकी स्थिति और भी मुश्किल हो गई है। बढ़ती महंगाई के कारण उन्हें अपने दैनिक खर्चों को चलाना मुश्किल हो रहा है। कई कामकाजी महिलाएं इस बात पर जोर दे रही हैं कि यदि उनके काम की सराहना नहीं की गई, तो वे और भी ज्यादा संघर्ष करेंगी। इसलिए, कामकाजी लोगों ने मौजूदा सैलरी को देखते हुए उसमें सुधार की मांग की है।

सरकार पर बढ़ा दबाव

कई रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों का तर्क है कि वेतन का निर्धारण व्यक्तिगत स्तर पर होता है और सामूहिक रूप से इसे बढ़ाना कठिन है। पुलिस और जिला प्रशासन ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों (कामगार और सोसाइटी प्रबंधन) के बीच मध्यस्थता की कोशिश की है। सैलरी में वृद्धि की मांग ने न केवल घरेलू कामगारों को प्रभावित किया है, बल्कि यह एक सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा और प्रभावी कदम उठाने होंगे। अगर स्थानीय प्रशासन या सरकार ने इस समस्या का समाधान नहीं किया, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।

कामकाजी लोग एकजुट

सभी कामकाजी लोगों ने मिलकर यह तय किया है कि वे अपनी मांगों के लिए एकजुट रहेंगे। उनके इस प्रदर्शन का उद्देश्य न केवल अपनी सैलरी में बढ़ोतरी कराना है, बल्कि समाज में कामकाजीों के हक के प्रति जागरूकता फैलाना भी है। उन्होंने अपील की है कि उनके हक के लिए सबको आवाज उठानी चाहिए।

आगे की कार्रवाई का खाका

इस प्रदर्शन के बाद, घरेलू कामगारों ने यह भी तय किया है कि वे सरकार और स्थानीय प्रशासन के साथ एक मीटिंग का आयोजन करेंगे। इस मीटिंग में अपनी समस्याओं को उठाने के साथ-साथ सैलरी में बढ़ोतरी की मांग को भी मजबूती से पेश करेंगे। यह बैठक कब होगी, इस पर काम चल रहा है। नोएडा का यह प्रदर्शन दर्शाता है कि असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों में अब अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। घरेलू कामगारों की मांगें जायज होते हुए भी एक जटिल कानूनी ढांचे (Labour Laws) की कमी का सामना कर रही हैं, क्योंकि वे औपचारिक रूप से किसी कंपनी के कर्मचारी नहीं होते। इस समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है जब सरकार घरेलू कामगारों के लिए भी स्पष्ट न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा के नियम लागू करे।

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