नौतपा की आग बुझाएगा समय से पहले आया मानसून, ग्लोबल वार्मिंग ने बदला मौसम का मिजाज

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नौतपा की आग को बुझाने वाला मानसून! ग्लोबल वार्मिंग ने बदला मौसम का मिजाज

ग्लोबल वार्मिंग और अल नीनो के संयुक्त प्रभाव के कारण साल 2026 में मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है, जिससे देश के कई हिस्से ‘ओपन एयर फर्नेस’ में तब्दील हो गए हैं। इस बार नौतपा 25 मई से 2 जून 2026 तक रहेगा, जिसमें उत्तर और मध्य भारत का तापमान 45°C से 52°C के रिकॉर्ड स्तर को छूने की आशंका है। हालांकि, इस भीषण आग को बुझाने के लिए मानसून समय से पहले दस्तक दे रहा है, जो केरल के तट पर सामान्य तिथि (1 जून) से पहले 25 मई के आसपास पहुंच सकता है।यह पारंपरिक मान्यताओं, वैज्ञानिक तंत्र और जलवायु परिवर्तन के बदलते पैटर्न का एक जटिल मिश्रण है।

नौतपा का प्रकोप और मौसम के बदलते स्वरूप

मई का महीना भारत में नौतपा के लिए जाना जाता है, जब भयंकर गर्मी का सामना करना पड़ता है। यह 9 दिन, 25 मई से 2 जून तक, भारतीय कृषि के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। परंतु जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ने इस बात को उलट दिया है। वनों की कटाई और प्रदूषण ने धरती के तापमान को बढ़ा दिया है। जब सूर्य कर्क रेखा के ऊपर होता है, तब तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। नौ राज्यों गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम में इन दिनों की गर्मी का असर सबसे ज्यादा होता है।

ग्लोबल वार्मिंग और सुपर अल नीनो ने बदला मौसम का मिजाज

इस बार नौतपा 25 मई से 2 जून 2026 तक रहेगा, जिसमें उत्तर और मध्य भारत का तापमान 45°C से 52°C के रिकॉर्ड स्तर को छूने की आशंका है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य का रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश नौतपा की शुरुआत करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से जब इस दौरान मैदानी इलाके अत्यधिक तपते हैं, तो वहां एक शक्तिशाली कम वायुदाब (Low Pressure) का क्षेत्र बनता है। इस कम दबाव को भरने के लिए हिंद महासागर और अरब सागर से नमी से भरी ठंडी मानसूनी हवाएं तेजी से भारत की तरफ खिंची चली आती हैं, जिसके कारण इस बार मानसून समय से पहले यानी 25 मई के आसपास ही केरल के तट पर दस्तक दे सकता है।

किसानों की उम्मीदें और गर्मी का संकेत

किसानी के लिहाज से, नौतपा की गर्मी को सुखदायी माना जाता है। किसानों का मानना है कि यदि इन 9 दिनों में तापमान अधिक हो, तो बारिश भी अच्छे से होगी। इस साल, अप्रैल से ही गर्मी ने जोर पकड़ा है। दिल्ली सहित उत्तर भारत में तापमान पिछले एक हफ्ते से 43 से 45 के बीच बना हुआ है। यदि लू नहीं चली, तो बारिश की अच्छी संभावना होती है।

पुरानी मान्यताएं और भौतिक बदलाव

नौतपा के बारे में भारतीय साहित्यों में कई बातें मिलती हैं। जैसे, यह गर्मी प्रेमिका की बिछोह की तरह या हनुमान द्वारा लंका जलाने के समान बताई जाती है। लेकिन अब इन मान्यताओं का आधार बदल रहा है। आजकल, औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। गर्मी की तुलना में बरसात की पूर्वानुमानितता कम होती जा रही है।

ग्लोबल वार्मिंग का दुष्परिणाम

ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। ग्रीनहाउस गैसों की अधिकता से वातावरण में एक घेरा बन गया है जो गर्मी को रोकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह स्थिति बनी रही, तो भारत में मौसम का मिजाज और भी बदलेगा। कई बार अल नीनो जैसे प्रभाव भी इसके लिए जिम्मेदार रहते हैं, जो मानसून को प्रभावित करते हैं।

मानसून की उम्मीदें और अल नीनो का खतरा

इस साल, मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि मानसून 26 मई तक आ सकता है, जो ग्रामीण इलाकों में राहत लेकर आएगा। लेकिन अल नीनो का असर बड़ा खतरा बन सकता है। इसकी सक्रियता की संभावना 92 प्रतिशत है, और इससे खरीफ फसल पर बुरा असर पड़ सकता है। यदि यह बाहर से गर्म हवाएं ला रहा हो, तो भारत में सूखा और अकाल का खतरा बढ़ सकता है।

मॉनसून के बीच हीटवेव की चेतावनी

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जहां एक तरफ रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ प्री-मानसून आंधी और अचानक होने वाली बेमौसम बारिश से मौसम में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं। इस भीषण गर्मी और हीटवेव (लू) के खतरे से बचने के लिए विशेषज्ञों ने दोपहर 12 से 4 बजे के बीच सीधे धूप में निकलने से बचने की सलाह दी है। इसके साथ ही खुद को पूरी तरह हाइड्रेटेड रखने के लिए भरपूर पानी, नींबू पानी, छाछ और ओआरएस (ORS) का घोल पीते रहें, हल्के रंग के सूती कपड़े पहनें और ज्यादा मसालेदार भोजन से परहेज करें।

सावधानी की आवश्यकता

भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण बदलाव के लिए सरकारों को सजग रहना होगा। सही समय पर उपाय करने पर ही किसानों और नागरिकों को अपेक्षित सुरक्षा मिलेगी। अल नीनो और ला नीना दोनों के प्रभाव का अध्ययन और तैयारी जरूरी है, ताकि मौसम के उतार-चढ़ाव का सामना किया जा सके। भारत की कृषि प्रणाली और जलवायु के संबंध में वैज्ञानिकों का आकलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, देश की उर्वरता एवं विकास का आधार ठोस होगा।

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