तीन साल बाद भी सुलग रहा मणिपुर, जंतर-मंतर से उठी शांति की पुकार

The CSR Journal Magazine

जंतर-मंतर पर मणिपुर का पोस्टर लेकर पहुंचा युवक: बोला- तीन साल से हिंसा जारी, अब शांति होनी चाहिए

देश की राजधानी नई दिल्ली का ऐतिहासिक धरना स्थल जंतर-मंतर अमूमन कई तरह के विरोध प्रदर्शनों का गवाह बनता है। दिल्ली में चल रहे छात्र आंदोलनों के बीच अचानक एक युवक हाथों में मणिपुर का पोस्टर थामे भीड़ के बीच पहुंच गया। पोस्टर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- “तीन साल से हिंसा जारी, अब शांति होनी चाहिए।” युवक की इस एकल पुकार ने वहां मौजूद हर शख्स को ठहरकर सोचने पर मजबूर कर दिया। यह पोस्टर सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि पिछले तीन वर्षों से भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में चल रहे उस अंतहीन और दर्दनाक जातीय संघर्ष का आईना है, जिसने खूबसूरत वादियों को छावनी और बफर जोन में तब्दील कर दिया है।

कैसे सुलगना शुरू हुआ मणिपुर: विवाद की जड़ें

मणिपुर में जातीय हिंसा की शुरुआत 3 मई 2023 को हुई थी। इम्फाल घाटी में रहने वाले बहुसंख्यक मैतेई (Meitei) समुदाय और पहाड़ियों पर रहने वाले अल्पसंख्यक कुकी-जो (Kuki-Zo) आदिवासी समुदाय के बीच यह संघर्ष भड़का था।

हाई कोर्ट का वह फैसला

विवाद की मुख्य वजह मणिपुर हाई कोर्ट का एक सुझाव था, जिसमें राज्य सरकार से गैर-जनजाति मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने पर विचार करने को कहा गया था। मैतेई समुदाय का तर्क था कि अपनी संस्कृति और पैतृक भूमि की रक्षा के लिए उन्हें इस दर्जे की जरूरत है।

कुकी-जो समुदाय का विरोध

दूसरी तरफ, पहाड़ियों में रहने वाले कुकी-जो समुदायों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि यदि आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत मैतेई समुदाय को एसटी दर्जा मिल गया, तो आदिवासियों के नौकरियों, शिक्षा और पर्वतीय क्षेत्रों की जमीनों पर अधिकार खत्म हो जाएंगे। इसके विरोध में ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर (ATSUM) ने 3 मई 2023 को एक ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ निकाला, जिसके दौरान चूराचाँदपुर जिले में झड़पें शुरू हुईं और देखते ही देखते पूरी घाटी और पहाड़ियां आग की लपटों में घिर गई।

तीन साल का सफर: तबाही के आंकड़े और राजनीतिक उठापटक

मई 2023 से शुरू हुआ यह सिलसिला साल 2026 तक आते-आते एक अत्यंत गहरे घाव में बदल चुका है। सरकारी और स्वतंत्र आंकड़ों के अनुसार, इस हिंसा का मानवीय और सामाजिक प्रभाव बेहद भयावह रहा है। आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, इस हिंसा में अब तक 260 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 1,100 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं।

आशियाने हुए राख-शरणार्थी बने अपने ही लोग

दोनों तरफ से लगभग 4,700 से अधिक घरों को आग के हवाले कर दिया गया। करीब 400 चर्च और 130 से अधिक मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया। राज्य के 60,000 से अधिक नागरिक आंतरिक रूप से विस्थापित (IDPs) होकर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों पर बने ये शिविर अब लोगों के स्थायी पते बन गए हैं।

मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का इस्तीफा और नया नेतृत्व

इस भीषण मानवीय संकट के बीच राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठते रहे। विपक्ष और नागरिक संगठनों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह पर हालात को न संभाल पाने का आरोप लगाया। चौतरफा दबाव के बाद, 9 फरवरी 2025 को एन. बीरेन सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद राज्य की कमान युमनम खेमचंद सिंह को सौंपी गई। नए मुख्यमंत्री युमनम खेमचंद सिंह के सामने बिखरे हुए समुदायों के बीच दोबारा विश्वास बहाल करना सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

भौगोलिक विभाजन और बफर जोन का नया सच

आज का मणिपुर भौगोलिक और मानसिक रूप से दो हिस्सों में पूरी तरह बंट चुका है। इम्फाल घाटी, जहां मैतेई समुदाय का दबदबा है, वहां अब कुकी समुदाय का कोई व्यक्ति दिखाई नहीं देता। वहीं चूराचाँदपुर और कांगपोकपी जैसी पहाड़ियों से मैतेई समुदाय के लोग पूरी तरह पलायन कर चुके हैं। घाटी और पहाड़ियों के मिलन बिंदुओं पर केंद्रीय सुरक्षा बलों (जैसे असम राइफल्स और सीआरपीएफ) द्वारा बफर जोन और चेकपोस्ट बनाए गए हैं, ताकि दोनों पक्षों के सशस्त्र उग्रवादियों को एक-दूसरे पर हमला करने से रोका जा सके। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल हाईवे-2 पर कटीले तारों की बाड़ और हथियारबंद चौकियों के कारण आम नागरिकों का आवागमन पूरी तरह प्रतिबंधित है, जिससे दवाइयों और आवश्यक वस्तुओं की किल्लत बनी रहती है।

हालिया तनाव: जिरीबाम और बिष्णुपुर की घटनाएं

यद्यपि सरकार का दावा है कि हिंसा की तीव्रता 2023 के शुरुआती हफ्तों के मुकाबले कम हुई है, लेकिन रह-रह कर भड़कने वाली चिंगारी ने शांति प्रयासों को लगातार झटका दिया है।

अप्रैल 2026 का बम धमाका

7 अप्रैल 2026 को बिष्णुपुर जिले के त्रोंगलाओबी (Tronglaobi) गांव में एक नागरिक के घर पर आधी रात को भयानक बम हमला हुआ। इस धमाके में एक 5 वर्षीय बच्चे और एक मासूम बच्ची की मौत हो गई, जबकि उनकी मां गंभीर रूप से घायल हो गई। इस घटना के बाद गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों के शिविरों पर हमला कर दिया, जिससे पूरी घाटी में एक बार फिर आंसू गैस के गोले और कर्फ्यू का दौर लौट आया।

आर्थिक नाकेबंदी और नया जातीय समीकरण

इसके अलावा, हाल के महीनों में नागा समुदाय भी इस तनाव के प्रभाव से अछूता नहीं रहा है। जून 2026 में छह नागा नागरिकों की संदिग्ध मौत के बाद ऑल नागा स्टूडेंट्स एसोसिएशन मणिपुर (ANSAM) ने इम्फाल में न्याय की मांग को लेकर बड़ा मार्च निकाला। इसके बाद पहाड़ी रास्तों पर जवाबी आर्थिक नाकेबंदी (Economic Blockades) शुरू हो गई, जिससे आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।

शांति के प्रयास और निहित स्वार्थों का रोड़ा

मुख्यमंत्री युमनम खेमचंद सिंह ने हाल ही में इंफाल के सिटी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान स्वीकार किया कि पिछले तीन वर्षों के अनवरत संकट ने आम जनता की कमर तोड़ दी है और उन्हें गंभीर वित्तीय व मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि सरकार जिरीबाम जैसे संवेदनशील जिलों में दोनों समुदायों (मैतेई और हमार/कुकी) के विस्थापितों से मिलकर आपसी बातचीत का रास्ता तैयार कर रही है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट रूप से आरोप लगाया कि:”कुछ ऐसे निहित स्वार्थ वाले समूह (Vested Interests) सक्रिय हैं, जो नहीं चाहते कि राज्य में शांति वापस आए। वे सरकार की सुलह पहलों को लगातार पटरी से उतारने का प्रयास कर रहे हैं।” विशेषज्ञों का भी मानना है कि म्यांमार सीमा से होने वाली हथियारों की तस्करी, ड्रग्स माफिया और कुछ प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों के पुनर्जीवित होने से शांति वार्ता की प्रक्रिया बेहद जटिल हो गई है।

अब और कितना इंतजार?

जंतर-मंतर पर पोस्टर लेकर खड़े उस युवक की आंखें और उसकी खामोश पुकार दरअसल मणिपुर के उन हजारों बच्चों और माताओं की आवाज है जो पिछले 36 महीनों से राहत शिविरों के तिरपाल के नीचे जिंदगी काट रहे हैं। बंद स्कूल, गोलियों की गूंज, इंटरनेट पर पाबंदियां और अपनों को खोने का कभी न खत्म होने वाला दर्द अब मणिपुर की नियति बन चुका है। राजनीतिक इच्छाशक्ति, नागरिक समाज की संवेदनशीलता और दोनों समुदायों के बीच बिना किसी पूर्व शर्त के होने वाला संवाद ही इस पूर्वोत्तर के राज्य को वापस मुख्यधारा में ला सकता है। दिल्ली के राजपथ से लेकर इम्फाल की घाटियों तक आज सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा है- मणिपुर को स्थायी अमन और इंसाफ के लिए आखिर और कितना इंतजार करना होगा?

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