बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के लिए यह समय मुश्किल भरा है। उनके करीबी सहयोगी ऋतब्रत बनर्जी ने पार्टी से बगावत कर दी है और अपने साथ 58 विधायकों को लेकर विपक्ष के नेता बन गए हैं। इस घटनाक्रम ने टीएमसी के अस्तित्व पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। ममता के लिए यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि उनके कई प्रमुख चेहरे अब पार्टी को छोड़ रहे हैं।
बागी ऋतब्रत का राजनीतिक सफर
ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक करियर वक्त के साथ बदलता रहा है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत सीपीएम के छात्र नेता के रूप में की थी। 2000 में, मात्र 21 साल की उम्र में वह सीपीएम की छात्र संगठन एसएफआई के महासचिव बने। उनके तेज़ी से बढ़ते करियर का एक प्रमुख कारण उनके संबंध सीताराम येचुरी के करीबी रहना था। इसने उन्हें पार्टी के भीतर एक मजबूत स्थिति दिलाई।
राज्यसभा में पहुंचे ऋतब्रत
ऋतब्रत 34 साल की उम्र में राज्यसभा सांसद बने। यह उस समय की बात है जब सीपीएम युवा नेताओं को आगे बढ़ाने में कतराती थी। लेकिन उनकी करीबी दोस्ती येचुरी के साथ उन्हें सुविधाजनक स्थिति में ले गई। हालांकि, 2017 में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। फिर भी, यह उनके लिए एक नया अध्याय था।
टीएमसी में नए कदम
2018 में, ऋतब्रत ने टीएमसी में शामिल होने का फैसला किया। उनके अनुसार, ममता बनर्जी ही असली वामपंथी नेता हैं। पार्टी में शामिल होने के बाद, उन्हें ट्रेड यूनियन शाखा का प्रमुख बनाया गया। उनके इस कदम ने उनकी राजनीतिक छवि को और मजबूत किया।
2024 में, उन्हें टीएमसी द्वारा फिर से राज्यसभा के लिए नियुक्त किया गया।
निष्कासन और बगावत का कारण
1 जून को तृणमूल कांग्रेस ने ऋतब्रत को पार्टी से निष्कासित कर दिया, जिसके बाद ऋतब्रत ने 58 विधायकों के समूह के साथ विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में अपनी मांग रखी। यह तब हुआ जब पार्टी ने उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोपों के तहत इस्तीफा देने का दबाव बनाया। इस स्थिति ने ममता के लिए और भी नकारात्मक परिणाम उत्पन्न किए।
दिल्ली की साजिश का आरोप
ममता ने मीडिया के सामने कहा कि जो व्यक्ति पहले सीपीएम में था, वही अब टीएमसी में विद्रोह कर रहा है। उन्होंने ऋतब्रत पर आरोप लगाया कि उनके खिलाफ दिल्ली से साजिश रची गई है, जिससे पार्टी की स्थिति कमजोर हो रही है। हालांकि, ऋतब्रत का कहना है कि वे ममता के प्रति वफादार हैं लेकिन उनके भतीजे अभिषेक से उन्हें दिक्कत है।
आगे का रास्ता
इस हालात में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए खुद को फिर से खड़ा करना आसान नहीं होगा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, यह देखने की बात होगी कि आने वाले समय में टीएमसी किस तरह से इस संकट का सामना करती है।
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