गांधी से वांगचुक तक अनशन की परंपरा… मांगों को मनवाने का एक दिव्य अस्त्र

The CSR Journal Magazine
भारत में अनशन सिर्फ विरोध का तरीका नहीं, बल्कि यह अपनी जायज मांगों को मनवाने का एक शक्तिशाली अहिंसक अस्त्र रहा है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक, इस प्रणाली ने देश की दिशा बदलने का काम किया है। भूख हड़ताल और अनशन की परंपरा समय के साथ विकसित हुई है। इसकी शुरुआत आयरलैंड से हुई, जहां कैदी अपनी मांगें मनवाने के लिए भूख हड़ताल करते थे। भारत में इसे महात्मा गांधी ने अपनाया, जो एक अहिंसक प्रतिरोध का रूप था।

गांधी जी का अनशन का राजनीतिक प्रयोग

महात्मा गांधी ने अनशन का राजनीतिक प्रयोग 1913 में शुरू किया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के फ़ीनिक्स में सात दिनों की भूख हड़ताल की थी। उन्होंने इसे प्रायश्चित उपवास बताया। इसके बाद उन्होंने कई बार भूख हड़ताल की, जिनमें राजनीतिक विषयों को उठाया। उदाहरण के लिए 1918 में जब अहमदाबाद के कपड़ा मिल मज़दूरों ने हड़ताल की, गांधी जी के उपवास के बाद दोनों पक्ष सहमत हो गए।

हिंसा के खिलाफ अनशन

गांधी जी हर उस प्रयास के विरुद्ध अनशन करते थे जो हिंसा की ओर ले जाता। 1919 में नाडियाड में ट्रेन से संबंधित हिंसा के विरोध में उन्होंने 72 घंटे का उपवास किया। इसके फलस्वरूप हालात नियंत्रित हुए। गांधी जी ने अन्याय के विरुद्ध अनशन को एक महत्वपूर्ण साधन माना और इस दौरान कई बार उनकी बात सुनने के लिए सत्ता भी झुकी।

जनता की सहानुभूति को पाना

गांधी जी के बाद अनशन का यह अस्त्र लाखों लोगों ने समाज में सुधार के लिए अपनाया। भारत में इसे सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत भूख हड़ताल माना गया। सरकारें अक्सर जनता के दबाव में आकर झुक जाती हैं क्योंकि लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है। लेकिन कई बार अनशन करने वालों को अपनी जान भी गंवानी पड़ती है।

प्रमुख अनशनकर्ताओं की कहानियाँ

1952 में पोटी श्रीरामुलु ने आंध्र प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग के लिए अनशन किया, जो उनकी मृत्यु पर समाप्त हुआ। इसके बाद 1966 में संत फतह सिंह और दर्शन सिंह फ़ेरूमान ने हरियाणा विभाजन के खिलाफ अनशन किया। दर्शन सिंह की मृत्यु भी इसी अनशन के दौरान हुई। इस प्रकार, कई मामलों में अनशन ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मौजूदा समय में अनशन की आवश्यकता

हाल ही में, इरोम चानू शर्मिला ने 16 साल तक अनशन किया ताकि मणिपुर में एएफ़एसपीए को हटाने की मांग कर सकें। 2011 में अन्ना हज़ारे ने भी जंतर मंतर पर लोकपाल बिल लाने के लिए अनशन किया। 2026 में सोनम वांगचुक ने मेडिकल परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ आमरण अनशन किया। इन घटनाओं ने अनशन की शक्ति और इसकी प्रासंगिकता को दिखाया है।

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