भारतीय सेना को मिलेंगे ‘स्मार्ट माइन हंटर’, ड्यूल टेक्नोलॉजी डिटेक्टर्स के लिए ₹290 करोड़ का टेंडर जारी

The CSR Journal Magazine

भारतीय सेना के लिए स्मार्ट माइन हंटर: बड़ा रक्षा टेंडर जारी

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने थल सेना के लिए ₹290 करोड़ के टेंडर के तहत 386 अत्याधुनिक ड्यूल-टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर्स (Next-Generation Mine Detectors) खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। यह रक्षा सौदा दुश्मन और आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे आधुनिक नॉन-मेटेलिक (बिना धातु वाले) विस्फोटकों और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (IEDs) के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए किया जा रहा है।

आधुनिक तकनीक का सामना नॉन-मेटेलिक माइंस से

दुनिया भर में युद्ध क्षेत्रों में नॉन-मेटेलिक माइंस ने भारत समेत कई देशों की सेनाओं के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इस खतरे के मद्देनजर, भारतीय सेना ने अत्याधुनिक तकनीक अपनाने का निर्णय लिया है। रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए 386 नई पीढ़ी के ड्यूल टेक्नोलॉजी माइन डिटेक्टर्स खरीदने के लिए लगभग 290 करोड़ रुपये का बड़ा टेंडर जारी किया है। यह निर्णय ऐसे समय पर लिया गया है जब आतंकवादी और दुश्मन देश पारंपरिक धातु आधारित बारूदी सुरंगों के स्थान पर नॉन-मेटेलिक IEDs और माइंस का तेजी से उपयोग कर रहे हैं।

मेटल डिटेक्टर्स की सीमाएं

भारतीय सेना फिलहाल Schiebel और Metex जैसे पारंपरिक मेटल डिटेक्टर्स का उपयोग कर रही है। ये सिस्टम केवल मेटल से बनी चीजों का पता लगाने में सक्षम हैं, जबकि प्लास्टिक या अन्य गैर-धातु सामग्री से बने विस्फोटकों का पता लगाना इन्हें कठिनाई में डाल देता है। जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में आतंकवाद-रोधी अभियानों के दौरान सुरक्षा बलों को बार-बार ऐसे IEDs का सामना करना पड़ा है, जिससे खतरा लगातार बना रहता है। लेकिन नई तकनीक प्लास्टिक, लकड़ी, और सिरेमिक से बने उन विस्फोटकों और सुरंगों को भी खोज निकालेगी जिन्हें पकड़ने में मौजूदा मेटल डिटेक्टर्स नाकाम रहते हैं।

ड्यूल टेक्नोलॉजी का प्रभाव

नई प्रणाली में पारंपरिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक मेटल डिटेक्शन तकनीक के साथ Ground Penetrating Radar (GPR) या Infrared (IR) तकनीक को जोड़ा जाएगा। इससे सिस्टम को मेटल और नॉन-मेटल दोनों विस्फोटकों का पता लगाने में सहायता मिलेगी। ये नए डिटेक्टर्स पारंपरिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक मेटल डिटेक्शन के साथ ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) या इन्फ्रारेड (IR) तकनीक से लैस हैं। यह उपकरण मौसम के अनुसार दोनों तकनीकों का इस्तेमाल कर सकेगा, जिससे बर्फ, रेगिस्तान, दलदली और पहाड़ी इलाकों में भी बेहतर डिटेक्शन संभव होगा।

विशेष मानक और कार्यक्षमता

रक्षा मंत्रालय के तकनीकी मानकों के अनुसार, नया सिस्टम 6 सेंटीमीटर तक की छोटी वस्तुओं और 4 सेंटीमीटर ऊँचे विस्फोटकों को पहचान सकेगा। सूखी मिट्टी या रेत में यह करीब 12 सेंटीमीटर गहराई तक डिटेक्शन कर सकेगा। ये आधुनिक हंटर रेगिस्तान, बर्फ के मैदानों और पानी से भरे दलदली इलाकों में भी आसानी से काम करेंगे। इन्हें मुख्य रूप से पाकिस्तान से लगती नियंत्रण रेखा (LoC) और चीन से लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तैनात लड़ाकू इंजीनियरिंग इकाइयों (Combat Engineering Units) को सौंपा जाएगा। वहीं, बर्फ, दलदली या खारे इलाकों में यह 10 सेंटीमीटर तक विस्फोटकों को पकड़ सकेगा। यह सिस्टम -10°C से +42°C तक के तापमान में कार्य करने में सक्षम होगा।

आसान इस्तेमाल के लिए डिजाइन

इस हाईटेक सिस्टम का वजन 8 किलोग्राम से कम रखा गया है, जिससे सैनिक इसे खड़े होकर, घुटनों के बल या लेट कर भी इस्तेमाल कर सकें। इसमें ऑडियो और विजुअल अलार्म भी होंगे, जो खतरे की पहचान को तुरंत संभव बनाएंगे। रक्षा मंत्रालय ने चयनित कंपनी को आदेश मिलने के 540 दिनों के भीतर 386 यूनिट सेना को सौंपने का लक्ष्य रखा है। इस टेंडर के तहत चुनी जाने वाली कंपनी को ऑर्डर मिलने के 540 दिनों के भीतर सभी 386 यूनिट्स की डिलीवरी करनी होगी। इसकी बोली (Bid) जमा करने की अंतिम तिथि 5 जून तय की गई है।

सुरक्षा के लिहाज से अहम कदम

यह खरीद भारतीय सेना की कॉम्बैट इंजीनियरिंग यूनिट्स की क्षमता में महत्वपूर्ण बदलाव लाएगी। IEDs से होने वाले खतरे को कम कर, सैनिकों को रूट-क्लियरेंस ऑपरेशन के दौरान अधिक सुरक्षा मिलेगी। चीनी सीमा, पाकिस्तानी सीमा और आंतरिक सुरक्षा अभियानों में यह नई तकनीक एक सुरक्षा कवच साबित हो सकती है।

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