अब दूध के साथ गोमूत्र से भी बंपर कमाई करेंगे किसान! यूपी के किसानों के लिए नई कमाई का रास्ता
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल में पारंपरिक खेती और पशुपालन के मोर्चे पर एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव आकार ले रहा है। राज्य के पशुपालक अब केवल गाय के दूध या गोबर से ही नहीं, बल्कि उसके मूत्र (गोमूत्र) से भी हर महीने बंपर कमाई करने की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नया संबल देने और किसानों को वित्तीय रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए राज्य में गोमूत्र खरीद का एक अनूठा पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इस महत्वाकांक्षी पहल के तहत पशुपालकों से ₹10 प्रति लीटर की दर से गोमूत्र की सीधी खरीद की जा रही है, जिसे आने वाले समय में बढ़ाकर ₹20 प्रति लीटर करने की तैयारी है। यह योजना न केवल किसानों की दैनिक आय को दोगुना करने का एक प्रभावी जरिया बन रही है, बल्कि इसने राज्य में छुट्टा गोवंश की गंभीर समस्या और ग्रामीण बेरोजगारी से निपटने की भी एक मजबूत उम्मीद जगाई है।
बुलंदशहर की स्याना तहसील से हुई ऐतिहासिक शुरुआत
इस अनूठी योजना की शुरुआत उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की स्याना तहसील के अंतर्गत आने वाले नरसेना गांव से की गई है। यहाँ एक स्थानीय किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ – Farmer Producer Organization) के माध्यम से इस पूरे पायलट प्रोजेक्ट का क्रियान्वयन किया जा रहा है। स्याना के डॉ. प्रवीण राणा, जो पिछले कई वर्षों से गोमूत्र और गौ-आधारित प्राकृतिक खेती पर गहन शोध और जमीनी काम कर रहे हैं, उनके नेतृत्व में इस डेयरी प्रोजेक्ट को पूरे प्रदेश के लिए एक रोल मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, इस पायलट प्रोजेक्ट के अंतर्गत स्याना और नरसेना के आस-पास के लगभग 15 गांवों को जोड़ा जा चुका है। इन सभी 15 गांवों से हर रोज औसतन 500 लीटर गोमूत्र का संग्रहण (कलेक्शन) किया जा रहा है। शुरुआती स्तर पर मिली इस शानदार सफलता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर प्रशासनिक अमला इसे पूरे उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी लागू करने की विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर रहा है।
₹10 से ₹20 लीटर का अर्थशास्त्र: कैसे बदलेगा किसानों की आय का गणित?
पशुपालन में अब तक केवल दूध देने वाली गायों को ही आय का मुख्य स्रोत माना जाता था। जैसे ही कोई गाय बूढ़ी हो जाती थी या दूध देना बंद कर देती थी, वह पशुपालक के लिए एक आर्थिक बोझ बन जाती थी। लेकिन इस नई योजना ने पूरे खेल को ही बदल कर रख दिया है।
सीधी और तत्काल कमाई: योजना के तहत पशुपालक अपने गोवंश से सुबह और शाम का गोमूत्र एकत्रित करके निर्धारित केंद्रों पर जमा कराते हैं, जहां उन्हें ₹10 प्रति लीटर की दर से तत्काल भुगतान सुनिश्चित किया जा रहा है।
भविष्य में दोगुनी दर की योजना: एफपीओ और सरकारी सूत्रों के अनुसार, जैसे-जैसे गोमूत्र से बनने वाले उत्पादों (जैसे जैविक कीटनाशक, अर्क और दवाएं) की बाजार में मांग और बिक्री बढ़ेगी, वैसे ही इस खरीद दर को बढ़ाकर ₹20 प्रति लीटर कर दिया जाएगा।
लागत में कमी और बचत: एक सामान्य गाय प्रतिदिन लगभग 5 से 8 लीटर तक मूत्र देती है। अगर न्यूनतम 5 लीटर का भी आकलन किया जाए, तो पशुपालक को केवल एक गाय से बिना किसी अतिरिक्त खर्च के प्रतिदिन ₹50 से ₹80 (और भविष्य में ₹100 से ₹160) की अतिरिक्त आय आसानी से हो रही है। यह राशि पशुओं के चारे और रखरखाव के खर्च को पूरी तरह निकाल देती है, जिससे दूध से होने वाली कमाई विशुद्ध मुनाफे में बदल जाती है।
अत्याधुनिक संग्रहण प्रणाली: गांवों में लगाए गए विशेष टैंक
गोमूत्र की गुणवत्ता को बनाए रखने और उसके सुरक्षित भंडारण के लिए प्रोजेक्ट के तहत बेहद व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया गया है। गांवों में पशुपालकों को गोमूत्र एकत्र करने की विशेष ट्रेनिंग दी गई है ताकि उसमें किसी प्रकार की मिट्टी या गंदगी न मिले। इसके साथ ही, संग्रहण को सुगम बनाने के लिए चिन्हित गांवों में 200 लीटर की क्षमता वाले विशेष स्टोरेज टैंक स्थापित किए गए हैं। पशुपालक अपने घरों से कंटेनरों में गोमूत्र लाकर इन टैंकों में सुरक्षित जमा करते हैं। यहाँ से एफपीओ के विशेष वाहन रोजाना इस संग्रहित गोमूत्र को प्रोसेसिंग यूनिट तक पहुंचाते हैं। इस विकेंद्रीकृत व्यवस्था के कारण किसानों को अपना उत्पाद बेचने के लिए दूर की मंडियों या शहरों के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण रोजगार का अनूठा मॉडल
यह पायलट प्रोजेक्ट केवल किसानों की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण परिवेश में महिला सशक्तिकरण का एक बहुत बड़ा माध्यम बनकर उभरा है। इस पूरे संग्रहण नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने के लिए ग्रामीण महिलाओं को सबसे आगे रखा गया है। परियोजना के तहत लगभग 300 ग्रामीण महिलाओं को इस एफपीओ में शेयरहोल्डर (साझेदार) के रूप में जोड़ा गया है। ये महिलाएं न केवल इस प्रोजेक्ट की व्यावसायिक हिस्सेदार हैं, बल्कि उन्हें गांवों में गोमूत्र के संग्रहण, उसकी शुद्धता की जांच और प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस कार्य के बदले इन महिलाओं को ₹2 प्रति लीटर की दर से सीधा कमीशन भी प्रदान किया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को घर बैठे एक सम्मानजनक और स्वतंत्र रोजगार की प्राप्ति हुई है, जिससे वे आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं।
छुट्टा गोवंश और आवारा पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में ‘छुट्टा गोवंश’ (सड़क और खेतों में घूमने वाले आवारा पशु) एक बहुत बड़ी कृषि और सामाजिक समस्या बने हुए हैं। दूध न देने वाले बैल या बूढ़ी गायों को अक्सर लोग खुला छोड़ देते हैं, जिससे वे किसानों की खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इस योजना के जमीन पर उतरने से इस समस्या का एक बेहद व्यावहारिक और स्थायी समाधान मिलता दिख रहा है। चूंकि अब दूध न देने वाली, बूढ़ी या बीमार गायों का गोमूत्र भी ₹10 से ₹20 लीटर की दर से बिक रहा है, इसलिए कोई भी पशुपालक अपने पशु को बेसहारा छोड़ने की गलती नहीं करेगा। अब हर एक गोवंश किसानों के लिए दैनिक आय का एक सक्रिय साधन बन चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों से आ रही रिपोर्टों के अनुसार, जिन गांवों में यह पायलट प्रोजेक्ट चल रहा है, वहां लोगों ने अपने अनुत्पादक गोवंश की देखभाल और अधिक मुस्तैदी से करनी शुरू कर दी है।
मूल्य संवर्धन (Value Addition): गोमूत्र से बन रही हैं जैविक खाद और दवाएं
इकट्ठा किए गए इस भारी-भरकम गोमूत्र का आखिर उपयोग कहाँ हो रहा है? डॉ. प्रवीण राणा और उनके एफपीओ की प्रोसेसिंग यूनिट में इस कच्चे गोमूत्र का बड़े पैमाने पर प्रसंस्करण (Processing) किया जा रहा है। गोमूत्र अपने आप में कई औषधीय और रासायनिक गुणों से भरपूर होता है, जिसके कारण इसका उपयोग मुख्य रूप से तीन बड़े क्षेत्रों में किया जा रहा है।
प्राकृतिक एवं जैविक कीटनाशक (Bio-Pesticides)
रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से खेतों की मिट्टी बंजर हो रही है और फसलें जहरीली हो रही हैं। गोमूत्र में नीम, धतूरा और अन्य स्थानीय वनस्पतियों को मिलाकर अत्यंत प्रभावशाली और पूरी तरह सुरक्षित प्राकृतिक कीटनाशक तैयार किए जा रहे हैं। ये कीटनाशक बाजार में मिलने वाले महंगे रसायनों की तुलना में बेहद सस्ते हैं और मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाते हैं।
तरल जैविक खाद (Liquid Bio-Fertilizers)
गोमूत्र को प्रसंस्कृत करके नाइट्रोजन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर तरल खाद बनाई जा रही है। किसान इसका छिड़काव सीधे फसलों पर कर रहे हैं, जिससे फसलों की पैदावार में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है।
आयुर्वेदिक औषधियाँ और अर्क (Ayurvedic Medicines)
आयुर्वेद में गोमूत्र अर्क को स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी माना गया है। परिष्कृत और शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजरने के बाद इस गोमूत्र से उच्च गुणवत्ता वाला ‘गोमूत्र अर्क’ और कई तरह की जीवन रक्षक आयुर्वेदिक दवाएं बनाई जा रही हैं, जिनकी बाजार में अच्छी-खासी कीमत और मांग है।
आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
नरसेना गांव के पशुपालक रामनिवास का कहना है, “शुरुआत में हमें विश्वास नहीं हुआ था कि कोई गोमूत्र भी खरीदेगा। लेकिन जब से हमने हर हफ्ते एफपीओ से सीधे पैसे पाने शुरू किए हैं, हमारी सोच बदल गई है। अब हमारी बूढ़ी गाय भी हमें उतना ही कमा कर दे रही है, जितना कभी वह दूध देकर देती थी।” वहीं इस प्रोजेक्ट के प्रणेता डॉ. प्रवीण राणा का मानना है कि गो-आधारित शून्य लागत प्राकृतिक खेती ही भारतीय कृषि का भविष्य है। यदि सरकार के सहयोग से इस मॉडल को उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में और सभी विकास खंडों (ब्लॉक्स) में बड़े पैमाने पर विस्तारित कर दिया जाए, तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तर प्रदेश का किसान कर्ज के दलदल से पूरी तरह बाहर निकलकर देश की प्रगति का मुख्य इंजन बनेगा।
गोमूत्र खरीद एवं प्रसंस्करण नीति
प्रशासनिक स्तर पर भी इस योजना की प्रगति पर पैनी नजर रखी जा रही है। सरकार का मुख्य लक्ष्य इस पायलट प्रोजेक्ट के व्यावहारिक अनुभवों और डेटा के आधार पर एक विस्तृत राज्य-स्तरीय ‘गोमूत्र खरीद एवं प्रसंस्करण नीति’ का मसौदा तैयार करना है, ताकि भविष्य में इसे डेयरी सहकारी समितियों (जैसे पराग) के साथ एकीकृत करके एक संगठित उद्योग का रूप दिया जा सके।ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने वाली यह अनूठी पहल निश्चित रूप से देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण पेश करती है। दूध की सफ़ेद क्रांति के बाद अब गोमूत्र की यह नई ‘पीली क्रांति’ उत्तर प्रदेश के गांवों की तस्वीर बदलने के लिए पूरी तरह तैयार है।
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